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दान अर्थात् क्या? उसका महत्त्व क्या है?

दान यानी औरों को अपना खुद का कुछ भी देकर उन्हें सुख देना वह।

charity
किसी भी दूसरे जीव को, चाहे वो मनुष्य हो या दूसरे कोई प्राणी, उन्हें सुख देना वह दान कहलाता है। हमारे पास जो भी है, उसे दूसरों के लिए, अच्छे कामों के लिए लुटा देना, वही सच्चा दान है।

ज़रूरतमंद लोगों को पैसे, खाना, कपड़े, दवा वगैरह देकर दुःख के समय में राहत पहुँचाना; मंदिर के निर्माण और रखरखाव, बेजुबान पशुओं की रक्षा करना, धर्म के प्रचार जैसे कामों का खर्च उठाना; स्कूल या अस्पताल बनवाकर गरीबों की मदद करना वगैरह दान में आता है। संक्षेप में, अपने घर या परिवार के अलावा, दूसरों के सुख के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वो सब दान है।

दान का फल सुख और शांति

दूसरों को सुख दिया हो, तो उसके ‘रिएक्शन’ में हमें सुख ही मिलता है, वह भी तुरंत, घर बैठे! दान देने से, यानी अपनी वस्तु, अपना पैसा, किसी दूसरे को देने से भीतर सुख उत्पन्न होता है, क्योंकि हमने अच्छा काम किया है। नियम यह है कि हम जो देते हैं, वही हमें मिलता है। दूसरी तरफ, यदि किसी का हड़प लें, तो हमारा भी चला जाता है। अच्छा काम करें तो सुख होता है और बुरा काम करें तो दुःख होता है। इसलिए, सुख और दुःख से ही हमें पता चलता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा।

अधिकतर दान लक्ष्मी से ही होता है। औरों के लिए या धर्म के कार्यों के लिए लक्ष्मी का उपयोग हो, तो वह सदुपयोग कहलाता है। दान यानी खेत में पुण्य बोना और फिर उस पुण्य का फल काटना। अपना धन दूसरों के लिए खर्च करने से हमें अभी तो सुख मिलता ही है, साथ ही साथ अगले जन्म की सेफसाइड भी हो जाती है।

दान वह मानसिक शांति प्राप्त करने का अनोखा रास्ता है। परम पूज्य दादाश्री इसके लिए दान का महत्त्व समझाते हैं।

प्रश्नकर्ता: मानसिक शांति पाने के लिए व्यक्ति को, किसी गरीब की या किसी कमज़ोर की सेवा करनी चाहिए या भगवान की भजना करनी चाहिए? या किसी को दान देना चाहिए? क्या करना चाहिए?

दादाश्री: यदि मानसिक शांति चाहते हो तो अपनी चीज़ दूसरों को खिलानी चाहिए। कल आइस्क्रीम का डिब्बा भरकर लाना और इन सब को खिलाना। उस समय कितना आनंद होता है वह तू मुझे बताना। इन लोगों को आइस्क्रीम नहीं खानी है। तू तेरी शांति के लिए प्रयोग करके देख लेना। ये लोग कोई बेकार नहीं बैठे हैं, सर्दी में आइस्क्रीम खाने के लिए।

इस तरह, तू जहाँ हो वहाँ, कोई जानवर हो, बंदर हों, उन्हें चने डालेगा तो वे उछल-कूद मचाएँगे। वहाँ तेरे आनंद की कोई सीमा नहीं रहेगी। वे खाते जाएँगे और तेरे आनंद की कोई सीमा नहीं रहेगी। इन कबूतरों को तू दाने डाले उससे पहले तो वे उछल-कूद करने लगेंगे और तूने दाने डाले, तेरी अपनी चीज़ दूसरों को दी कि भीतर आनंद शुरू हो जाता है।

अभी कोई व्यक्ति रास्ते में गिर गया हो, उसकी टाँग टूट गई हो और खून निकल रहा हो, वहाँ तू अपनी धोती फाड़कर पट्टी बाँधेगा, उस समय तुझे आनंद होगा। भले ही उस समय तू सौ रुपये की धोती फाड़कर बाँधे, लेकिन उस समय तुझे बहुत आनंद होगा।

सच्ची समाधि कब आएगी? जब संसार में हमें जिस पर सबसे अधिक स्नेह है, उसे खुला छोड़ दिया जाए। संसार में लोगों को लक्ष्मी पर अतिशय प्रेम है। यदि हम उसे छोड़ दें, तो समाधि रहती है।

दान से लक्ष्मी मुड़ती है सही रास्ते पर

लक्ष्मी को धर्म की ओर मोड़ना चाहिए, क्योंकि मुश्किल समय में धर्म ही हमें स्थिर रखेगा।

पैसों का स्वभाव चंचल है, एक दिन आते हैं और एक दिन सब चले जाते हैं। इसलिए, धन को लोगों के हित के लिए खर्च करना चाहिए। क्योंकि, जीवन में चाहे जैसे भी कर्मों के उदय के बीच या मुश्किल समय में, पहले लोगों की जो मदद की होगी, उस कर्म का फल अभी हमारी मदद करेगा।

यदि लक्ष्मी को अच्छे रास्ते पर खर्च नहीं करते है, तो जीवन में मौज-मस्ती के लिए या गलत रास्ते पर खर्च हुई लक्ष्मी अंत में गटर में जाएगी! जिनकी लक्ष्मी सत्कार्यों में खर्च होती है, वे महापुण्यशाली होते हैं। इसलिए, मनुष्य को गलत रास्ते पर खर्च करने में कंट्रोल करना चाहिए और अच्छे रास्ते पर खर्च करने में डिकंट्रोल करना चाहिए।

परम पूज्य दादाश्री इस बात को सरल भाषा में समझाते हुए कहते हैं कि, “जो धन औरों के लिए खर्च किया, उतना ही धन अपना। उतनी अगले जन्म के लिए पूंजी। अत: यदि किसी को अगले जन्म के लिए पूंजी जमा करनी हो तो पैसे औरों के लिए खर्च करो। फिर अन्य जीव, वह चाहे कोई भी जीव हो। फिर चाहे वह कौए हों। यदि वह थोड़ा सा भी चख जाए, फिर भी वह आपकी पूंजी होगी! लेकिन आपने और आपके बच्चों ने जो खाया, वह आपकी बचत नहीं है। वह सब गटर में गया।“

यदि लाखों रूपए कमाते हों, तो अतिरिक्त लक्ष्मी का कुछ भाग धर्म में लगा देना चाहिए, ताकि हमारी जिम्मेदारी न रहे। नहीं तो लक्ष्मी को संभालने में बहुत जोखिम है। उसमें भी इस काल की लक्ष्मी एक पीढ़ी भी नहीं टिकती। पहले तो लक्ष्मी तीन या पाँच पीढ़ी तक टिकती थी। क्योंकि, इस काल में अधिकतर लक्ष्मी आती तो पुण्य से है, लेकिन जब खर्च होती है तब पाप बँधवाती है, ऐसी है। इसलिए, यदि अच्छे मार्ग पर लक्ष्मी नहीं जाएगी तो अंत में सब धूल-धानी हो जाएगा।

नियम यह है कि जब हम चले जाएँगे, तब बैंक में जमा पैसे यहीं के यहीं रहेंगे। लेकिन, जीते जी जो लक्ष्मी हमने धर्म के कार्यों में या सत्कार्यों में खर्च की है, वह अगले जन्म के खाते में जमा होती है। जिससे लक्ष्मी की कोई अड़चन नहीं आएगी।

लक्ष्मी देने से बढ़ती है

दान यानी देकर लेना। यह जगत् प्रतिघोष स्वरूप है। इसलिए हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमें प्रतिघोष के रूप में वापस मिलता है, वह भी ब्याज सहित, अनेक गुना होकर वापस आता है।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “लक्ष्मी तो देने की इच्छा वाले के यहाँ ही आती है। जो नुकसान उठाता है, ठगा जाता है, नोबिलिटी रखता है, वहाँ लक्ष्मी आती हैं। चली गई है ऐसा लगता है, लेकिन फिर वहीं आकर खड़ी रहती हैं।“

जैसे घर के आमने-सामने के दो दरवाजे खुले रखें, तो एक दरवाजे से हवा अंदर आती है और दूसरे से बाहर जाती है। इसी तरह, लक्ष्मी जी एक मार्ग से खर्च होंगी, तो दूसरे मार्ग से दूसरी आती रहेंगी। लेकिन यदि दरवाजे बंद कर दें, तो हवा रुक जाएगी। इसी तरह लक्ष्मी को रोकेंगे, तो वह उतनी की उतनी ही रहेगी।

हमें तय करना है कि हम किस रास्ते पर लक्ष्मी को खर्च करें, सत्कार्यों में और दूसरों के लिए दान में या अपनी मौज-मस्ती और परिवार के लिए।

जो सच्चा दानवीर है, उसके यहाँ लक्ष्मी कभी कम नहीं होती, फिर वह फावड़े से खोद-खोद कर दान, धर्मादा करे तब भी। सच्चा दानवीर यानी साल में दो दिन धर्मादा करता है वो नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी लोगों की मदद ही करता रहता है। कुछ ऐसे दानवीर होते हैं, जो सात-सात पीढ़ियों से लोगों को धन देते ही रहते हैं। जैसे, अगर किसी को अपनी बेटी की शादी करवानी है, तो उसे देते हैं, कोई ब्राह्मण कुछ माँगे तो, उसे देते हैं, किसी को घर बनाने के लिए पैसों की ज़रूरत हो, साधु-संतों के लिए आश्रम बनवाना हो, गरीबों को भोजन कराने का कार्य हो, वे सभी में बहुत बड़ा दान देते ही रहते हैं। इसलिए वे दानवीर कहलाते हैं।

धन का स्वभाव ऐसा है कि जैसे-जैसे सभी को देते रहते हैं, वैसे-वैसे धन बढ़ता रहता है। इसमें भी यदि किसी अच्छी जगह पर धन दान में जाएँ, तो बहुत अधिक बढ़ता है। लेकिन यदि चोरी या अनीति से धन प्राप्त करे तो वह टिकता नहीं है।

हालांकि, जहाँ धन के ढेर लग रहें हो, वहाँ हम दानवीर बन सकते हैं। लेकिन, यदि घर में ही पैसों की परेशानी हो, तो दानवीर न बनें। दान देने का हमारा भाव हो, तो घर में सभी की सहमति से ही देना चाहिए। घरवालों को कोई परेशानी न हो, ऐसा सुनिश्चित करने के बाद ही सन्मार्ग पर धन खर्च करें।

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