
दान मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं।
एक आहारदान, दूसरा औषधदान, तीसरा ज्ञानदान और चौथा अभयदान।
आहारदान वह पहले प्रकार का दान है। आहारदान का अर्थ है, भूखे को भोजन कराना। आजकल कई धार्मिक संस्थाएँ और स्वयंसेवक अपने क्षेत्र या शहर में भूखे लोगों को भोजन कराने के नेक कार्य के लिए कम कर रहे हैं। कुछ संस्थाएँ मुफ्त में भोजन परोसती हैं, तो कुछ लोग अन्न की बर्बादी न हो, इस हेतु से कम कीमत पर भोजन परोसते हैं। यह सब आहारदान में जाता है।
यदि कोई व्यक्ति हमारे पास आकर कहे, “मुझे कुछ दो, मैं भूखा हूँ”, और हम उसके लिए भोजन लाकर उसे देते है, वह आहारदान में आता है। अक्सर लोग अपने घर में जो बचा-खुचा हो उसे भिखारी को खिला देते हैं, उससे बचे हुए अन्न का सदुपयोग होता है, वह भी अच्छा है। लेकिन वास्तव में, ताज़ा पकाकर भूखे को खिलाएँ, उसकी बात ही अलग है! अगर कोई भूखा आए, तो हमारे पास जो भोजन तैयार हो, वह तुरंत उसको देना चाहिए।
सामान्य तौर पर, आहारदान एकाद पहर के लिए ही होता है, सदा के लिए नहीं होता। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि भूखे को खिलाना उसे एक दिन का जीवनदान देने के बराबर है। एक पहर पेट भरकर भोजन कर लें, तो वह आज के दिन तो जी जाएगा। फिर कल उसे कौन खिलाएगा, उसकी चिंता हमें नहीं करनी है। हम हमेशा अन्नदान कर पाएँगे या नहीं, लेकिन अगर कोई हमारे पास माँगने आए, या हमारे ध्यान में कोई भूखा हो, तो उसे यथाशक्ति भोजन कराना चाहिए।
दूसरे प्रकार का दान है औषधदान, यानी, जरूरतमंद लोगों को दवा लाकर मुफ्त में देना। औषधदान आहारदान से उत्तम माना जाता है।
औषधदान से क्या होता है? मान लीजिए, किसी साधारण स्थिति वाले घर में कोई व्यक्ति बीमार हो और वह अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने जाएँ, फिर वहाँ उसे दवा का प्रिस्क्रिप्शन मिलें, लेकिन उसके पास दवा खरीदने के पैसे ही न हों, तो वह क्या करे! वह दवा ख़रीदेगा ही नहीं। यदि बीमारी बढ़ती जाए तो, व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। किसी की ऐसी परिस्थिति हमारे ध्यान में आए, तो हम उसे दवा खरीदने के पैसे दे दें या कहीं से दवा लाकर दे दें और पैसे न लें, तो इसे औषधदान कहते हैं। कुछ दवाखाने और हॉस्पिटल भी ऐसे लोगों को राहत दर पर चिकित्सकीय उपचार और दवाएँ उपलब्ध कराते हैं, जो औषधदान में आता है।
आहारदान प्राप्त करने वाले को एकाद-दो दिन के लिए जीवनदान मिलता है। लेकिन यदि औषधदान से व्यक्ति ठीक हो जाता है, तो वह कई महीनों या वर्षों तक जी जाता है। चिकित्सकीय उपचार या दवा में किया गया दान व्यक्ति को स्वास्थ्य प्रदान करता है और उसे लंबी आयु देता है। इतना ही नहीं, उसे लम्बे समय तक वेदना से मुक्त भी करता है। इसलिए, आहारदान की तुलना में औषधदान अधिक कीमती माना जाता है।
तीसरे प्रकार का दान है ज्ञानदान। लोगों को सन्मार्ग पर ले जाएँ ऐसी पुस्तकों का दान करना, वह ज्ञानदान में आता है। इसे औषधदान से भी ऊँचे प्रकार का दान कहा गया है।
जो पुस्तकें लोगों को सही समझ देकर सच्चे मार्ग पर ले जाएँ और लोगों का कल्याण हो, ऐसी पुस्तकों को छपवाना, उनका वितरण करना, लोगों को मुफ्त में वे पुस्तकें देना आदि, ज्ञानदान में आता है। मुफ्त में मिलने वाली पुस्तकों का दुरुपयोग न हो, उसके लिए राहत दर पर पुस्तकें देना, वह भी ज्ञानदान में आता है।
ज्ञानदान से प्राप्त होने वाली पुस्तकों के द्वारा यदि धर्म की सही समझ प्राप्त हो जाए, तो मनुष्य का वर्तमान जीवन सुधर जाता है, जीवन में क्लेश और दुःख कम हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अगले जन्म में ऊँची गति में जन्म होता है। और यदि पुस्तक में सच्ची समझ मिले, तो सुख-दुःख से परे होकर जन्म-मरण के फेरे से मुक्त होकर मोक्ष में जाने के द्वार भी खुलते हैं। एक ही पुस्तक किसी के हाथ में पहुँच जाएँ, तो कितना परिवर्तन हो सकता है! ज्ञानदान से एक जन्म का ही नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर का कल्याण हो सकता है, इसलिए ज्ञानदान को दुनिया में बहुत ऊँचा माना जाता है।
जिनके पास धन अधिक हो, उन लोगों को मुख्य रूप से ज्ञानदान में लक्ष्मी का उपयोग करना चाहिए। लेकिन वह ज्ञान कैसा होना चाहिए? जो ज्ञान लोगों के लिए हितकारी हो, ऐसा ज्ञान। डकैतों की बातें या विषय-विकार की बातें छापने वाली पुस्तकें, जिन्हें पढ़कर मनुष्य को आनंद तो होता है, लेकिन वह अधोगति की ओर फिसलता रहता है, इन्हें मुफ्त में देना वह ज्ञानदान नहीं कहलाता।
इतना ही नहीं, धर्म की पुस्तकों को छपवाने के पीछे भी यदि हेतु कीर्ति और यश प्राप्त करने का हो, तो वह सच्चा ज्ञानदान नहीं माना जाता। धर्म की पुस्तक तो ऐसी होती हैं कि उसका ज्ञान हमें जीवन में काम आता है। वर्ना दूसरी ढेर सारी पुस्तकें छपवाएँ, लेकिन कोई पढ़े नहीं या एक बार पढ़कर रख दें और वे जीवन में काम न आएँ, तो उसका कोई अर्थ नहीं है। अपने नाम और कीर्ति के लिए पुस्तकें छापे वह नहीं, बल्कि लोगों के काम आए ऐसी पुस्तकें अधिक छपें, तो ज्ञानदान का फल प्राप्त होता है।
सबसे ऊँचा दान अभयदान कहलाता है। हमारे वर्तन, विचार और वाणी से किसी भी जीव को किंचित्मात्र भी भय न लगे, त्रास न लगे उसे अभयदान कहते हैं। अभयदान ही अकेला ऐसा दान है, जिसमें पैसे की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती।
लेकिन अभयदान देना हर किसी के बस की बात नहीं है। परम पूज्य दादाश्री खुद, बचपन में, यदि रात के बारह बजे घर आते, तो जूते हाथ में लेकर धीरे से आते थे, ताकि रास्ते में सो रहे कुत्तों को भी नींद में खलल न पहुंचे। यह अभयदान का एक उदाहरण है।
अभयदान सीधे वर्तन में नहीं आता। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि किसी जीव को किंचित्मात्र भी दुःख न हो, ऐसा भाव पहले रखना चाहिए। तभी वह भाव वर्तन में आता है। लेकिन यदि भाव ही न किए हों, तो वर्तन में कैसे आएगा? इसलिए अभयदान को बहुत ऊँचा दान कहा है।
सबसे श्रेष्ठ अभयदान है। फिर दूसरा ज्ञानदान, तीसरा औषधदान और चौथा आहारदान आता है।
दान में सीधे पैसे देने के बजाय, ज़रूरतमंद लोगों को इन चारों में से किसी भी प्रकार से दान किया जा सकता है। तीन प्रकार के दान जिसमें आहार, औषध और पुस्तकें प्रदान करते हैं, इनमें अप्रत्यक्ष रूप से लक्ष्मी खर्च होती है।
जिनके पास साधारण धन हो, उन्हें आहारदान और औषधदान करना चाहिए। जिनके पास अधिक पैसे हों, उन्हें ज्ञानदान देना चाहिए, क्योंकि विद्यादान उत्तम माना जाता है। तथा, सभी को हो सके वहाँ तक मन में अभयदान की भावना करते रहनी चाहिए। जिनके पास पैसे न हों, वे भी किसी जीव को दुःख न हो, उनको भय न लगे, इस तरह से जीवन जीएँ तो वह अभयदान कहलाता है।
किसी भी प्रकार से किया गया दान उत्तम ही है। संक्षेप में, जहाँ किसी को दुःख हो, उसके दुःख को कम करना और पैसों का सन्मार्ग में उपयोग करना, ये सभी दान ही है।
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