
मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय तो सदा के लिए संसार के बंधन से मुक्त होना है। संसार का यह बंधन केवल आत्मज्ञान से ही टूट सकता है। लेकिन जब तक आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता, तब तक मनुष्य को परोपकार का ही ध्येय रखना चाहिए।
परोपकार का अर्थ है अपने मन, वचन, काया यानी अपने विचार, वाणी और वर्तन को दूसरों के लिए उपयोग करना।
यदि एक आम का पेड़ हो, तो वह अपने कितने आम खाएगा? एक भी नहीं। उल्टा आम के फ़ल, उसके पत्ते, लकड़ी, उसकी छाया, सभी का उपयोग दूसरों के लिए होता है; फलस्वरूप वो ऊर्ध्वगति प्राप्त करता रहता है। नीम भले ही कड़वा होता है, लेकिन फिर भी लोग उसे लगाते हैं, क्योंकि वो ठंडक देता है। उसका कड़वा रस औषधि के रूप में हितकारी होता है। लेकिन इन सबके बदले में कोई पेड़ हमसे पैसे या कुछ और नहीं माँगता। वह तो सर्दी-गर्मी सब सहकर फल पकाकर तैयार करके हमें देता है। उसे खुद को फल का उपयोग करने की या खाने की कोई परवाह नहीं होती।
इसी प्रकार मनुष्य का शरीर मिला है, यदि हम इसका उपयोग दूसरों के लिए करें तो यह जीवन सार्थक माना जाएगा। यदि अपने स्वार्थ के लिए ही उपयोग करता रहे तो वह मनुष्य नहीं कहा जाएगा। इस पेड़ का उदाहरण मनुष्य को उपदेश देता है कि आप अपना फल दूसरों को दो, ‘ओब्लाइजिंग नेचर’ रखो, तो कुदरत आपको देगी।
कुदरत का नियम ऐसा है कि जो अपने मन-वचन-काया का उपयोग दूसरों के लिए करता है उसकी खुद की ज़रूरतें अपने आप पूरी होती रहती हैं। जैसे कि पेड़ को कभी हवा, पानी, रोशनी या भोजन के लिए नहीं सोचना पड़ता। हमने कभी किसी पेड़ को इमोशनल होते देखा है, कि एक मील दूर नदी है तो वहाँ जाकर पानी पी आऊँ? नहीं, पेड़ जहाँ खड़ा रहता है वहाँ उसे सब कुछ मिलता रहता है।
परोपकार ही नहीं, अपने घर के लोगों के लिए भी मन-वचन-काया का उपयोग करता है उसे सब कुछ मिल जाता है। उदाहरण के लिए, कुतिया अपने बच्चों को खिलाती, पिलाती और उनकी रक्षा करती है। उन बच्चों के भीतर भी भगवान विराजमान हैं। इसलिए जब कुतिया अपने बच्चों की सेवा करती है तो वह परोक्ष रूप से भगवान की सेवा करती है। नियम यह है कि दूसरों की सेवा करने से खुद का मोह, ममता और स्वार्थ कम हो जाता है। कुतिया को अपनी जीविका के लिए सब कुछ अपने आप मिल जाता है। इसमें फिर मनुष्य तो सामनेवाले के भीतर भगवान को पहचानकर सेवा कर सकता है और उसका बहुत ऊँचा फल मिलता है।
जिस प्रकार जंगल में पेड़ और लताएँ सहजीवी रूप से रहते हैं और एक दूसरे के विकास में मदद करते हैं। इस प्रकार पारस्परिक उपकार करना, एक-दूसरे के पूरक होना, एक-दूसरे की मदद करने के लिए ही तो जीवन है। लेकिन मनुष्य में बुद्धि का विकास हुआ है। परिणाम स्वरूप, एक-दूसरे के प्रति राग द्वेष, और भेद बढ़े हैं। मनुष्य में अपने मोह और स्वार्थ के लिए हर चीज़ को उपयोग करने की वृत्तियाँ बढ़ी हैं। वास्तव में, जीवन में धन का प्रमाण रखना चाहिए और अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा परोपकार के लिए खर्च करना चाहिए। परोपकार केवल दूसरों के लिए धन का उपयोग करने से ही नहीं होता। बल्कि किसी की दूसरे तरीके से मदद कर सकते हैं, ऐसे दो-चार वाक्य बोल दें जिससे सामने वाली की समस्या का समाधान हो जाए, तो यह भी परोपकार ही है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “प्रामाणिकता और पारस्परिक 'ओब्लाइजिंग नेचर'। बस, इतना ही ज़रूरी है। पारस्परिक उपकार करना, इतना ही मनुष्य जीवन की बड़ी उपलब्धि है! इस संसार में दो प्रकार के लोगों को चिंता मिटती है, एक ज्ञानी पुरुष को और दूसरे परोपकारी को।“ आत्म-साक्षात्कार के बाद संसार की सभी चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं। लेकिन जिन्हें आत्म-साक्षात्कार नहीं हुआ हो, उसे भी परोपकार करने से, खुद के मन-वचन-काया का दूसरों के लिए उपयोग करने से सभी दुःख, चिंता और उपाधि से मुक्त हो जाते हैं।
जीवन में यदि कोई चिंता करने योग्य बात है, तो वह यही है कि यह मानव जन्म कैसे सार्थक हो? लेकिन आजकल लोगों को लक्ष्मी की, संतान की, परिवार की और स्वास्थ्य की अधिक चिंता होती है। कैसे ज़्यादा पैस कमाऊँ, कैसे मेरी मान और प्रतिष्ठा बढ़े, कैसे जीवन में सुख-सुविधाएँ बढ़ें, संसार में सुरक्षित रहें इन सभी चिंताओं से मनुष्य घिरा हुआ रहता है। संसार में चिंता, उपाधि करने से भोगे जाने वाले कर्मों के फल में कोई बदलाव नहीं होता, उल्टा अधोगति के कर्म बंध जाते हैं।
यह मानव जन्म व्यर्थ न जाए और सार्थक हो, इसके लिए हमें अपना सब कुछ दूसरों के लिए उपयोग करना चाहिए। हमें भावना रखनी चाहिए कि लोगों के लिए उपयोग करना है, और यह भाव अमल में आए तो ज़्यादा बेहतर है। हालाँकि, सांसारिक चिंताएँ अचानक बंद हो जाएँ और रातों-रात परोपकार शुरू हो जाए ये हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन "मुझे परोपकारी बनना है, मेरे पास जो कुछ भी है उसे दूसरों के लिए उपयोग करना है।“ यह भाव रखना हमारे हाथ में है। यदि परोपकार का ध्येय निरंतर याद आता रहे तो भी बहुत पुण्य बँधता है। और, अभी भाव रखें उसका भी बहुत ऊँचा फल मिलता है और जीवन में सदैव के लिए सुख और शांति हो जाती है ।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "जिससे कुछ भी अपने ध्येय की तरफ पहुँच सके। यह बिना ध्येय के जीवन का तो कोई अर्थ ही नहीं है। डॉलर आते हैं और खा-पीकर मज़े उड़ाते हैं और सारा दिन चिंता-वरीज़ करते रहते हैं, इसे जीवन का ध्येय कैसे कहा जाएगा? मनुष्यपना मिला, वह व्यर्थ जाए, उसका क्या अर्थ है? इसलिए, मनुष्यपना मिलने के बाद अपने ध्येय तक पहुँचने के लिए क्या करना चाहिए? संसार के सुख चाहिए, भौतिक सुख, तो आपके पास जो कुछ हो वह दो लोगों को।"
सतयुग में लोग दूसरों को सुख देने की ही कोशिश करते थे। वे दिनभर यही सोचते रहते थे कि, “किसकी मदद करूँ?” यही विचार आते थे। लेकिन इस युग में ज़्यादातर लोगों को लगता है कि, “यदि मैं सब कुछ दे दूँगा, तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा।” इतना ही नहीं, आजकल भौतिक सुख पाने के उद्देश्य से मनुष्य ने दुराचार और भ्रष्टाचार करना शुरू कर दिया है। खाने-पीने और उपभोग की वस्तुओं में साथ-साथ दवाइयों में मिलावट करना शुरू कर दिया है। इससे मानव जीवन सार्थक होना तो दूर रहा, उल्टा मनुष्य से जानवर में जाने की तैयारियाँ हो रही हैं।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “धर्म की शुरुआत ही ‘ओब्लाइजिंग नेचर' (परोपकारी स्वभाव) से होती है।“ वे कहते हैं, ”धर्म क्या है? भगवान की मूर्तियों के पास बैठे रहना, उसे धर्म नहीं कहते। धर्म तो, अपने ध्येय तक पहुँचना, उसे धर्म कहते हैं। साथ-साथ एकाग्रता के लिए हम कोई भी साधन करें, वह अलग बात है, पर इसमें एकाग्रता करो तो सब एकाग्र ही है इसमें। ओब्लाइजिंग नेचर रखो, तय करो कि अब मुझे लोगों को ओब्लाइज ही करना है अब। तो आपमें परिवर्तन आ जाएगा।“
मन की शांति के लिए जप-तप या क्रियाएँ करना, माला फेरना, मंदिरों में जाना ये सब अच्छे ही हैं। लेकिन एक तरफ़ हम धार्मिक क्रियाएँ करते हों और दूसरी तरफ घर में माता-पिता को दुःख दे रहे हों, हमसे पति-पत्नी या बच्चों को दुःख हो रहा हो तो यह सच्चा धर्म नहीं है। जो मन की शांति हम धार्मिक क्रियाएँ करके प्राप्त करना चाहते हैं वही शांति दूसरों की मदद करने से, अपने आसपास के लोगों को दुःख नहीं पहुँचाने से अपने आप मिल जाएगी।
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