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दान किस तरह से देना चाहिए?

यदि हमारे पास अतिरिक्त धन हो और हम उसे दान में देते है, तब भीतर कैसा भाव होना चाहिए, इसकी सुंदर समझ यहाँ मिलती है। साथ ही साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम एक तरफ़ मंदिर या धार्मिक कार्य में दान के लिए पैसा खर्च कर दें और दूसरी तरफ़ घर में बुज़ुर्ग माता-पिता, परिवार के सदस्यों या अपने नीचे काम करने वालों को पैसों के लिए तड़पाएँ, तो ऐसा दान किसी काम का नहीं है। पहले नज़दीकी लोगों को संभाल कर फिर बाहर दान देना चाहिए।

दान देना चाहिए, मन बिगाड़े बगैर

दान मन बिगाड़े बगैर देना चाहिए। खुद की धर्मादा में देने की इच्छा हो, लेकिन मन बिगड़ जाए, तो एक पैसा भी नहीं दे पाते। कुछ लोग वर्षों तक अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान-धर्मादा में देते हैं, और अचानक देना रुक जाए। उसका कारण मन बिगड़ जाना है।

यदि मन-वचन और काया की एकता के साथ दान देता है, तो उसकी बात ही अलग होती है। कई लोगों को मन में दान देने का भाव ही नहीं होता, लेकिन वाणी में कहते रहते हैं, कि “मुझे देना है” और वर्तन में दान दे भी देते हैं। फिर भी, मन में देने का भाव नहीं होता, इसलिए उस दान का फल भी नहीं मिलता!

दूसरी ओर, कोई मन से दान देने का शुद्ध भाव करें, वाणी से भी बोले कि “मुझे देना है”, लेकिन संयोगवश वर्तन में नहीं दे पाते, तो वह भाव आने वाले जन्म के लिए जमा होता है! जैसे, मंदिर में किसी सेठ को हज़ार की नोटें दान पेटी में डालते हुए देखकर, किसी को यदि मन में हो कि “अरे! मेरे पास पैसे होते तो मैं भी देता!” तो उसका फल आने वाले जन्म में मिलता है।

सिर्फ़ दिखावे के लिए दान देने का भी कोई अर्थ नहीं है। यदि हमारी गाय मरने वाली हो और हम उसे दान में दे देते है, तो दान लेने वाले को कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसके बजाय दान न देना अच्छा है। घर में बचा हुआ अन्न भिखारी को खिलाएँ और ताज़ा भोजन बनाकर प्रेम से खिलाएँ, तो इन दोनों में बहुत फर्क है। इसके बावजूद, बचे हुए अनाज की बर्बादी हो, इसके बजाय भूखे को खाना खिलाना अच्छा है।

दान में वस्तु की तुलना में भाव की कीमत अधिक

दान देते समय दी गई वस्तु की कीमत नहीं, बल्कि भाव की कीमत होती है। जैसे कि, एक धनी व्यक्ति किसी के दबाव में आकर पाँच लाख रुपये का दान करे, लेकिन मन में भाव करे कि “एक पैसा भी देने जैसा नहीं था!” तो उसे वैसे भाव का फल मिलेगा और अगले जन्म में एक पैसा भी दान में नहीं दे पाएगा। जबकि, सिर्फ़ पाँच सौ रुपये का दान करने वाला साधारण व्यक्ति मन में भाव करें, कि “यह पाँच सौ हैं, ले लो। लेकिन आज अगर मेरे पास पाँच लाख होते तो सब दे देता!” तो उसे ऊँचा फल मिलेगा और अगले जन्म में पाँच लाख दे सकेगा! जिसने उल्टा भाव किया, उसने लाखों रुपये देने के बावजूद भी उसका दान व्यर्थ गया! दान के बदले में अभी तो ‘वाह-वाह’ मिलती है, लेकिन अगले जन्म की कमाई ज़ीरो हो जाती है।

मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि जब पैसे नहीं होते, तब सोचता है कि “पैसे आएँ तो मुझे दान में देने हैं।” फिर पैसे आते हैं, तो सोचता है कि “अभी डेढ़ लाख हुए हैं, दो लाख होंगे तब दूँगा।” और उस विचार की पुड़िया बनाकर एक तरफ़ रख देता है। कमाई होती हैं, तब उसे पैसे की माया उलझा देती है और दान नहीं दे पाता। ऐसा करते-करते एक दिन सदा के लिए आँखें बंद हो जाती हैं और सब कुछ वैसे का वैसा ही रह जाता है। इसके बजाय जब भाव हो, तब सामर्थ्य अनुसार दान दे देना चाहिए।

कोई व्यक्ति दान देता रहता है, धर्म और भक्ति करता है, मंदिरों में पैसा देता है, तो जगत् के लोग कहते हैं कि बहुत धार्मिक है! लेकिन यदि उस व्यक्ति को भीतर ऐसे विचार आएँ कि “किस तरह से धन इकट्ठा करूँ और किस तरह से भोग लूँ!” तो भगवान उसका एक भी पैसा जमा नहीं करते। वास्तविकता में, जो कर्म भीतर बँध रहा है, जिसका लोगों को पता नहीं है, उसका फल अगले जन्म में मिलता है।

दान में नीयत चोर नहीं होनी चाहिए। एक तरफ़ कालाबाज़ारी, तस्करी सब करके करोड़ों रुपये कमाते हैं और दूसरी तरफ़ सिर्फ़ एक लाख रुपये दान देते हैं, ताकि खुदका खराब न दिखे, खुदका नाम न खराब हो। इसकी इस प्रकार से तुलना की जाती है, कि निहाई (कई किलो वज़न का ठोस लोहा) की चोरी की और सुई का दान किया। उसमें भी लोग खाते के बाहर का जो काला धन आया है, उसका दान करते हैं। फिर भी, गलत तरीके से प्राप्त किया हुआ धन अच्छे कार्य में उपयोग किया, तो उतना ख़ुद पाप से मुक्त हुआ।

यदि हम ‘दो नंबर’ के पैसे किसी भूखे व्यक्ति को दान में देने के लिए उपयोग करें, तो भूखे को खाना तो मिलेगा। यानी उसे वैसा लाभ होगा। क्योंकि, खुदके पास जो आया, उसका त्याग किया। उसमें जिस हेतु के लिए उपयोग किया गया हो, उसके अनुसार ही पुण्य बँधता है।

दान में अंतराय न डालें

कोई दान दे रहा हो, वहाँ कोई बुद्धिशाली कहे कि, “यह तो चोर कंपनी है, यहाँ क्या दान देना?” ऐसे दान में अंतराय डालते हैं। देने वाला देता है और लेने वाला ले लेता है, लेकिन खुद बीच में ऐसा बोलकर अंतराय डालता है, और कोई लेना-देना न होने पर भी अपने लिए लक्ष्मी का अंतराय डालता है। बोलकर अंतराय डालता है, उसका फल तो इस जन्म में मिल जाता है, लेकिन मन बिगाड़ने पर तो भारी अंतराय पड़ते हैं, जो आने वाले जन्म में फलित होता है। फिर उस अंतराय का फल ऐसा आता है कि उसे दुःख में भी कोई देने वाला नहीं मिलता।

यदि खुद तय कर लें कि “मुझे अतिरिक्त पैसा दान में देना ही है, तो उससे अंतराय टूटते हैं! जब भी नेगेटिव विचार आएँ, तब उनका पछतावा करके धो डालें, तो अंतराय पड़ना रुक जाता है। पहले हमने मन में विचार किया था, किदान नहीं देना चाहिए, उसके विपरीत अब हम सोचते हैं, कियह दान देना अच्छा है, इससे पहले वाला नेगेटिव मिट जाता है। इसलिए, शुभ भाव करते रहना चाहिए कि अतिरिक्त धन अच्छे रास्ते पर खर्च हो। फिर दिया गया या नहीं दिया गया, वह कुदरत के हाथ में है।

दान में अपेक्षा न रखें

अपेक्षा के बिना किया गया दान उत्तम है। जबकि, मान, कीर्ति या नाम की अपेक्षा के साथ किया गया दान अर्थहीन होता है। कीर्ति के लिए दान करें, यह आत्मार्थी के लिए बहुत हानिकारक होता है।

कुछ लोग भगवान के मंदिर में दान करते हैं, तो बदले में सांसारिक अपेक्षाएँ रखते हैं। भगवान के पास पैसे या दूसरी कोई चीज़ रखते हैं, वह सब व्यर्थ नहीं बल्कि फलदायी होता है। भगवान से प्रार्थना करते हैं, कि “हे भगवान, बेटे के घर एक बेटा हो जाए!”, “मेरा बेटा पास हो जाए।” “घर में बूढ़े बाप को पक्षाघात हुआ है, वह ठीक हो जाए।” ऐसी माँग करके दो सौ-पाँच सौ रुपये रख देते हैं।

अधिकतर दान देने वालों को बदले में अपना नाम हो, वाह-वाह हो और कीर्ति फैले उसी की भीख होती है। लाखों रुपये दान में देते हैं, इसके बदले में कीर्ति मिले तो बहुत हो गया। फिर व्यवहार में ऊपर से बोलते ज़रूर हैं कि दान को गुप्त रखना, लेकिन भीतर कीर्ति की कामना होती है, इसलिए ही देते हैं। फिर लोग भी प्रशंसा करते हैं, कि “ओहोहो! लाखों रुपयों का दान दिया।” इसलिए, दान का बदला यहीं का यहीं ही मिल गया।

कुछ लोग तो नाम कमाने के लिए अपनी जमा-पूंजी लुटा देते हैं। लोग फूलमाला पहनाएँ, इसके लिए दान दें तो यह कीर्ति के लिए दान दिया कहा जाता है। कुछ लोग तो दान देने के बदले में यदि नाम नहीं छपा हो तो दूसरी बार दान नहीं देते। मंदिरों में, स्कूलों में, कॉलेजों में, हॉस्पिटलों में बेहिसाब धन दान में दिया हो, लेकिन वह सब ईगोइज़्म (अहंकार) है। अहंकार रहित पैसा दान में जाए, तो सच्चा दान कहलाता है। वर्ना उसकी कीर्ति मिलती रहे, तो वह अहंकार को पोषित करने का एक आसान साधन बन जाता है।

गुप्त दान का महत्त्व

लाख रुपये दान में दे और बदले में तख्ती लगवाएँ, इसकी तुलना में गुप्त दान में सिर्फ एक रुपया ही दें, तो वह गुप्त दान का एक रुपया भी ज़्यादा कीमती साबित होता है! क्योंकि, यह तख्ती लगवाई उससे तोबैलेंस शीटपूरी हो गई। जैसे हमने सौ रुपये का नोट किसी को दिया और उसके छुट्टे लिए, वैसे ही दान के बदले में तख्ती लगवाई, इसलिए हिसाब वहीं का वहीं पूरा हो गया, फिर लेना-देना कुछ रहा नहीं।

लेकिन यदि एक ही रुपया गुप्त रूप से दिया हो, तो उसका बैलेंस बाकी रहता है, जो अगले जन्म में वापिस मिलता है। दान के बदले मेंवाह-वाहहो, तो दान करके जो पुण्य कमाया था, वह पुण्य यहीं का यहीं खर्च हो जाता है। यदि गुप्त रूप से दान दें, तो उसका पुण्य अगले जन्म में साथ आता है।

कुछ लोग मंदिर में भगवान के पास किसी को पता न चले ऐसे बड़ा दान देकर आ जाते हैं, यह दान अगले जन्म में उगता है। जिसने गुप्त रखा, उसका फल अगले जन्म में मिलेगा।

जागृतिपूर्वक दान देना

दान का शुभ कार्य करते समय जागृति रहनी चाहिए। जागृतिपूर्वक दान दें, तो लोगों का कल्याण होगा। दान देते समय हमें कीर्ति या ख्याति प्राप्त न हो, इस तरह गुप्त रूप से दें, तो यह जागृतिपूर्वक का दान कहलाता है।

दान देने वाले के लिए तो लोग “वाह-वाहकिए बिना रहेंगे नहीं। लेकिन खुद उसे स्वीकारेगा तो रोग प्रवेश करेगा, और यदि जागृत रहकर स्वीकार नहीं करेगा तो रोग प्रवेश नहीं करेगा। जो दान देने वाले की प्रशंसा करता है, वह सत्यकार्य की अनुमोदना का पुण्य बाँधता है। क्योंकि, उसके मन में यह अच्छे भाव के बीज पड़ते हैं, कियह करने योग्य है।जबकि, दान देने वाला यदि प्रशंसा स्वीकार करेगा तो वह नुकसान उठाता है, उसका सारा पुण्य धुल जाता है।

परम पूज्य दादा भगवान जागृतिपूर्वक से दिए गए दान को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, “जागृतिपूर्वक सभी क्रियाएँ करें तो अगले जन्म का हित होगा, वर्ना सब नींद में जाएगा। यह दान किया वह सब नींद में गया! जागते हुए चार आने भी जाएँ तो बहुत हो गया! यह दान दे और भीतर यहाँ की कीर्ति की इच्छा हो तो वह सब नींद में गया। परभव के हित के लिए जो दान यहाँ दिया जाए, वह जाग्रत कहलाता है।“

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