
‘ज्ञान’ का स्वभाव ही ऐसा है कि (उस पर) किसी का असर ही नहीं होता, निर्लेप रहता है! ज्ञान, अज्ञान से भी निर्लेप रहता है। ज्ञान तो क्रिया में भी एकाकार नहीं होता, निर्लेप ही रहता है!
परम पूज्य दादा भगवानक्रियाओं में ज्ञान नहीं है और ज्ञान में क्रिया नहीं है। दोनों ही अलग स्वभाव वाले हैं!
परम पूज्य दादा भगवानकिसी भी चीज़ को ‘निज’ स्वभाव में जाने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती। विशेष भाव में ले जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है! पानी को गरम करना हो तो कितनी मेहनत करनी पड़ती है? अगर ठंडा करना हो तो? कुछ भी नहीं करना पड़ता क्योंकि वह उसका स्वभाव ही है! उसी प्रकार आत्मा स्वभाविक रूप से मोक्ष स्वरूप है। इसलिए ‘ज्ञानीपुरुष’ कृपा करके रास्ता बना देते हैं। ‘ज्ञानी’ की आज्ञा में रहने से मोक्ष होता है, कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ती। मेहनत से तो यह संसार खड़ा होता है। जप-तप किए थे, उसी से तो यह सारा फल मिल रहा है।
परम पूज्य दादा भगवानsubscribe your email for our latest news and events
