
अज्ञान निकालने के लिए क्या करना चाहिए? ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुस्तक या शास्त्रों के साधनों का सेवन करना चाहिए, और यदि ‘ज्ञानी पुरुष’ मिल जाएँ तो अन्य किसी भी साधन की ज़रूरत नहीं है। आत्मा अवक्तव्य, अवर्णनीय है। वह पुस्तकों में नहीं लाया जा सकता।
परम पूज्य दादा भगवान‘आत्मा ऐसा है, वैसा है, ऐसा नहीं है’, ऐसा तो सब शास्त्र भी कहते हैं, साधु-महाराज भी कहते हैं। लेकिन मीठा का मतलब क्या है? वह ज्ञान तो सिर्फ ‘ज्ञानी’ ही चखाते हैं। उसके बाद वह ज्ञान क्रियाकारी हो जाता है।
परम पूज्य दादा भगवानशास्त्र क्या है? शब्दरूपी है। वे शब्द हैं। उनके अर्थ निरावृत होते-होते शब्दार्थ होता है। फिर अर्थ आगे बढ़ते हैं। वे अर्थ निरावृत होते-होते परमार्थ तक पहुँचते हैं। वहाँ तक दृष्टि पहुँच जाती है। लेकिन शास्त्र से दृष्टि बदल नहीं सकती। दृष्टि बदलने के लिए तो ‘ज्ञानीपुरुष’ की आवश्यक्ता है। ‘इस’ दृष्टि की वजह से ही संसार खड़ा हो गया है। ‘ज्ञानी’ दृष्टिभेद करवा देते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानचार वेद पूर्ण हो जाने के बाद, धारण होने के बाद फिर अंत में वेद ‘इटसेल्फ’ क्या कहते हैं? दिस इज़ नॉट देट, दिस इज़ नॉट देट, दिस इज़ नॉट देट (नेति, नेति) तू जिस आत्मा को खोज रहा है, वह इसमें नहीं है। ‘गो टु ज्ञानी’ (ज्ञानी के पास जा)।
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