
अंतरशत्रु का जिन्होंने नाश कर दिया है, ऐसे अरिहंत को नमस्कार करता हूँ। अंतरशत्रुओं को पहचानो। क्रोध-मान-माया-लोभ, ये अंतरशत्रु हैं!
परम पूज्य दादा भगवानखुदा बनने के लिए हथियारों की ज़रूरत नहीं है, खुद को पहचानने की ज़रूरत है। जो खुद को पहचाने, वह खुदा!
परम पूज्य दादा भगवान‘ज्ञानियों’ के ज्ञान स्वरूप को पहचानना है। जगत् को प्रेमस्वरूप से पहचानना है।
परम पूज्य दादा भगवानकिंचित्मात्र भी ‘पोतापणुं’ (अपनापन) रखने की ज़रूरत नहीं है, ‘खुद’ है ही नहीं। यह जो ऐसा लगता है कि अस्तित्व है, वही भ्रांति है।
परम पूज्य दादा भगवानक्रोध को दबाते रहने से क्रोध नहीं जाता। क्रोध को पहचानना पड़ता है। क्रोध तो अहंकार है, किस प्रकार के अहंकार की वजह से क्रोध होता है, उसका पता लगाना चाहिए। यदि गिलास टूटने से क्रोध होता है तो वह नफा-नुकसान वाला अहंकार है, इसीलिए सोचकर अहंकार को निर्मूल करना चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवानखुद के स्वच्छंद को कोई पहचान नहीं सकता और जो उसे पहचान जाए, वे ‘ज्ञानी’ कहलाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानस्वच्छंद तो बहुत बड़ा रोग है। उसकी जड़ को पहचान लेना है। पहचान लिया तो ठीक रहेगा, वर्ना वह भटका देगा!
परम पूज्य दादा भगवानजिन्हें कोई किसी भी प्रकार से पहचान न पाए वे ‘ज्ञानी पुरुष!’ ‘ज्ञानी पुरुष’ सिर्फ उनकी वीतरागता से पहचाने जा सकते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानआपका चित्रण करने वाले आप खुद ही हो। आपका यह चित्रण किसी और ने नहीं किया है। भगवान तो अंदर बैठे हुए हैं! जब तक ‘आप’ अपने ‘स्वरूप’ को नहीं पहचानोगे तब तक ‘भगवान’ अलग हैं। जब ‘स्वरूप’ को पहचान जाओगे तब ‘आप’ खुद ही ‘भगवान’ हो! जब तक ‘स्वरूप’ को नहीं पहचानोगे तब तक ‘तू ही, तू ही’ करना पड़ेगा और ‘स्वरूप’ को पहचानने के बाद ‘मैं ही, मैं ही’ करना होता है! सर्वत्र ‘मैं ही हूँ’!
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