
कुदरत के घर पर तो निश्चय में दुःख नहीं है और व्यवहार में भी दुःख नहीं है। पूरे जगत् को इतना समझ में नहीं आने से व्यवहार दुःखदायी हो गया है। उसे व्यवहार नहीं आता है। व्यवहार निर्लेप होना चाहिए, निर्लेप व्यवहार हो जाने पर फिर आनंद की सीमा नहीं रहती।
परम पूज्य दादा भगवानव्यवहार यानी ‘सुपरफ्लुअस’ ‘सुपरफ्लुअस’ रहने के बजाय जगत् के लोग व्यवहार को ही निश्चय मान बैठे हैं और फिर कहते भी हैं कि ऐसा ही होना चाहिए, ऐसा ही करना चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवानकृपा का मतलब ‘एवरी टाइम सिन्सियर’। नैमित्तिक कृपा पात्र हुए बगैर ‘निश्चय’ प्राप्त नहीं हो सकता। क्रमिकमार्ग में भी नैमित्तिक कृपा है ही। ‘हम’ तो स्पेशल कृपा बरसाते हैं। परम विनय से ‘हमारी’ कृपा उतरती है। सिर्फ ‘कम्पलीट सिन्सियारिटी’ की ही चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान‘‘व्यवहार से ‘तू’ कर्ता है और निश्चय से अकर्ता है,’’ भगवान महावीर ने कहा है।
परम पूज्य दादा भगवानयह ज्ञान क्या है? न तो व्यवहार है न ही निश्चय। यह तो ‘अक्रम विज्ञान’ है! ‘अक्रम विज्ञान’ अर्थात् क्या? शुद्ध निश्चय और शुद्ध व्यवहार।
परम पूज्य दादा भगवान‘अकषायी व्यवहार’, वह शुद्ध व्यवहार है और निजस्वरूप का लक्ष (जागृति), वह निश्चय है! उसी से मोक्ष है!
परम पूज्य दादा भगवाननिश्चय में कुछ कमी नहीं रहनी चाहिए लेकिन यदि व्यवहार में भी कमी रह जाए तो वह भूल ही कहलाएगी। व्यवहार में यदि कमी रह जाए तो निश्चय में भी कच्चा पड़ जाता है।
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