
जहाँ पर कुछ भी कर्तापन है वहाँ बंधन है; और जहाँ जानना और समझना है, वहाँ मोक्ष है।
परम पूज्य दादा भगवानशाता वेदनीय और अशाता वेदनीय कब तक रहते हैं? जब तक कमियाँ हैं, तब तक। फिर आगे जाकर वे नहीं रहते। शाता-अशाता में ज्ञायक स्वभाव रहता है।
परम पूज्य दादा भगवानभगवान को साक्षी बनने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें थोड़े ही ‘कॉर्ट’ में जाना है? साक्षी तो ‘आपको’ बनना है ताकि कर्म नहीं बंधे और ‘भगवान’ तो सिर्फ ‘देखते’ ही रहते हैं!
परम पूज्य दादा भगवानजगत् टोके बिना रहता ही नहीं है। लेकिन टोकते नहीं रहना चाहिए। जगत् ऐसा है कि टोके बिना सुंदर चले। यह जगत् किसी भी तरह की दखलंदाज़ी करने जैसा नहीं है। जगत् तो केवल ‘जानने’ योग्य ही है।
परम पूज्य दादा भगवानसमकिती को तो कहीं पर भी परेशानी नहीं होती। जो सभी जगह ज्ञाता-द्रष्टा ही रहे, उसे परेशानी होती ही नहीं। जब तक दखलंदाज़ी है तभी तक वह समकित कहलाता ही नहीं।
परम पूज्य दादा भगवानकाबू में कुछ भी आएगा नहीं। काबू में लेना भी नहीं है। सिर्फ जानते रहना है। ‘हम’ तो ज्ञाता-दृष्टा व परमानंदी हैं।
परम पूज्य दादा भगवान‘व्यवस्थित’ का मतलब यही है कि प्रकृति के कार्यों में और बाहर के ‘एविडेन्स’ में दखल नहीं करना। हाथ ऊपर उठे, पैर इधर-उधर होते ही अंदर से कहता है कि, ‘चलो अब’ तो चलने लगता है। उसमें कोई दखल नहीं करना है, ‘ज्ञाता-दृष्टा’ रहना है।
परम पूज्य दादा भगवानब्रह्मांड सिर्फ छ: तत्वों से भरा हुआ है! यह छ: हिस्सेदारों की ‘लिमिटेड कंपनी’ है। (१) व्यापार के लिए जगह देता है ‘अवकाश’ क्षेत्र, (२) व्यापार के लिए माल-सामान देता है ‘पुद्गल’, (३) माल-सामान लाता-ले जाता है ‘गति सहायक तत्व’, (४) माल की व्यवस्था का काम करता है ‘स्थिति सहायक तत्व’, (५) उपरोक्त चारों तत्वों का निपटारा करता है ‘कालतत्व’, (६) देख-भाल करता है, ‘शुद्धात्मा’-‘ज्ञाता-दृष्टा’।
परम पूज्य दादा भगवानमन गाँठों से बना है। मन में जो विचार आते हैं वे मनोग्रंथि में से उत्पन्न होते हैं। जब वे विचार आएँ तब उनसे अलग रहे, विचारों में तन्मयाकार न हो, उसका ज्ञाता-दृष्टा रहे तब कहा जाएगा कि ‘ग्रंथिभेद’ हुआ। विचारों में तन्मयाकार होना अर्थात् जैसा विचार आए वैसा ही ध्यान उत्पन्न होता है।
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