आध्यात्मिक कोटेशन "आत्मा" पर

भगवान कहते हैं कि मन-वचन-काया और आत्मा (प्रतिष्ठित आत्मा) का उपयोग औरों के लिए कर। फिर तुझ पर कोई भी दु:ख आए तो मुझे बताना।

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जहाँ किंचित्‌मात्र भी दु:ख नहीं होता है वहाँ आत्मा है।

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अज्ञान निकालने के लिए क्या करना चाहिए? ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के लिए पुस्तक या शास्त्रों के साधनों का सेवन करना चाहिए, और यदि ‘ज्ञानी पुरुष’ मिल जाएँ तो अन्य किसी भी साधन की ज़रूरत नहीं है। आत्मा अवक्तव्य, अवर्णनीय है। वह पुस्तकों में नहीं लाया जा सकता।

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आत्मा का अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत शक्ति आज भी उसी रूप में है। आत्मा कभी भी पापी हुआ ही नहीं। आत्मा संपूर्ण शुद्ध ही है।

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‘आत्मा ऐसा है, वैसा है, ऐसा नहीं है’, ऐसा तो सब शास्त्र भी कहते हैं, साधु-महाराज भी कहते हैं। लेकिन मीठा का मतलब क्या है? वह ज्ञान तो सिर्फ ‘ज्ञानी’ ही चखाते हैं। उसके बाद वह ज्ञान क्रियाकारी हो जाता है।

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आत्मा का अस्तित्व है, थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी, आत्मा का वस्तुत्व है, थ्योरी ऑफ रियलिटी और आत्मा का पूर्णत्व है, थ्योरी ऑफ एब्सल्यूटिज़म। ‘हम’ ‘थ्योरम ऑफ एब्सल्यूटिज़म’ में हैं!

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आत्मा तो ‘ज्ञान स्वरूपी’ है, ‘केवलज्ञान स्वरूपी’ है, अन्य कुछ भी नहीं!

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आत्मा अरूपी है और रूपी भी है। सिर्फ रूपी कहोगे तो गलत होगा। देह की अपेक्षा रूपी है और वास्तव में अरूपी है। यदि एक का आग्रह रखा तो गलत कहा जाएगा। ‘ज्ञान’ हो जाने के बाद तो अरूपी है।

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आत्मा अरूपी है। इन आँखों से जो दिखाई देता है, वह सब तो भ्रांति है। यथार्थ तो ‘दिव्यचक्षु’ से दिखाई देता है कि, ‘ये भगवान हैं और ये भगवान नहीं हैं।’ दोनों भाग अलग दिखाई देते हैं। भगवान अमूर्त हैं। अत: आँखों से, रूपी चीज़ों द्वारा वे नहीं देखे जा सकते। भगवान, अरूपी ज्ञान से समझे जा सकते हैं, चारित्र से पहचाने जाते हैं।

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आत्मा निर्गुण है अर्थात् जहाँ पर प्रकृति का एक भी गुण नहीं है।

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आत्मा में इतनी अधिक शक्ति है कि यदि दीवार में प्रतिष्ठा की जाए तो दीवार भी बोलने लगे, ऐसा है!

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