आध्यात्मिक कोटेशन "parmatma" पर

जगत् न्याय स्वरूप है, तभी परमात्मा हैं!

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हिंसा किसके प्रति करोगे? जीवमात्र में परमात्मा ही हैं! किसे दु:ख दोगे?

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‘साइन्टिफिक’ सिद्धांत क्या है? भगवान की उपस्थिति में ‘रोंग बिलीफ’ उत्पन्न होती है। भगवान की उपस्थिति में संसार थम जाता है। भगवान की उपस्थिति में परमात्म पद उत्पन्न होता है।

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‘खुद’ परमात्मा तो है ही, लेकिन परमात्मा की सत्ता कब प्राप्त होती है? भूल खत्म हो जाए तब। वह भूल खत्म होती नहीं और सत्ता प्राप्त होती नहीं और लोगों के ससुर और सास बन कर मज़े करते हैं!

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आत्मा निरंतर अलग है, देह से निरंतर अलग ही रहे, ऐसा है। ऐसा भान हो जाए तभी से परमात्मा है!

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इन दो वाक्यों में ही मैं पूरा ‘साइन्स’ बता देना चाहता हूँ : जीव मात्र में परमात्म शक्ति रही हुई है। उस परमात्म शक्ति में कोई दखलंदाज़ी कर ही नहीं सकता।

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संसार में क्या सुख है? खुद का परमात्म सुख बरत सके, ऐसा है। कोई दखल ही नहीं दे सके, ऐसी सच्ची आज़ादी मिल सकती है, ऐसा है। जो भी परेशानी आती है वह दखल देने का परिणाम है।

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जब तक पूर्ण परमात्मा का अनुभव नहीं हो जाता, सच्ची आज़ादी न मिल जाए, तब तक रुकना ही नहीं चाहिए।

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बुद्धि से परमात्मा संबंधित बातें करना, आत्मा की निंदा करने के बराबर है। आत्मा अवर्णनीय है।

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