
‘आत्मा ऐसा है, वैसा है, ऐसा नहीं है’, ऐसा तो सब शास्त्र भी कहते हैं, साधु-महाराज भी कहते हैं। लेकिन मीठा का मतलब क्या है? वह ज्ञान तो सिर्फ ‘ज्ञानी’ ही चखाते हैं। उसके बाद वह ज्ञान क्रियाकारी हो जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान‘ज्ञान’ का स्वभाव ही ऐसा है कि (उस पर) किसी का असर ही नहीं होता, निर्लेप रहता है! ज्ञान, अज्ञान से भी निर्लेप रहता है। ज्ञान तो क्रिया में भी एकाकार नहीं होता, निर्लेप ही रहता है!
परम पूज्य दादा भगवानदेह की सभी क्रियाओं में अज्ञानी का आत्मा भी जुदा रह सकता है। यहाँ पर खाना खा रहा होता है लेकिन खुद होता है ‘ऑफिस’ में! मन की क्रिया से और वाणी की क्रिया से अलग नहीं रह पाता!
परम पूज्य दादा भगवानक्रियाओं में ज्ञान नहीं है और ज्ञान में क्रिया नहीं है। दोनों ही अलग स्वभाव वाले हैं!
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