दुःख तीन प्रकार के होते हैं। १) देह के दुःख २) वाणी के दुःख, और ३) मन के दुःख। देह के दुःखों को ‘कष्ट’ कहते हैं, जिसे प्रत्यक्ष दुःख कहते हैं। जैसे दाढ़ दुःखे, आँखें दुःखें या पक्षाघात हो जाए, तो ये सभी देह के दुःख हैं। फिर यदि किसी ने अपमानजनक शब्द कहे हों तो वाणी के ‘घाव’ पड़ते हैं, जो हृदय में बैठ जाते हैं और फिर भुलाए नहीं जाते। वे वाणी के दुःख हैं। तीसरे प्रकार के दुःख, मन के दुःख हैं, जिसमें “ऐसा होगा तो क्या होगा?” जैसे विचारों के भँवर में फँसकर मनुष्य असर में आ जाता है और दुःखी हो जाता है।
वास्तव में दुःख किसे कहते हैं? जहाँ खाने को न मिले, कपड़े पहनने को न मिलें या सोने को न मिले, वह। रोटी, कपड़ा और मकान के अभाव को दुःख कहा जाता है। संक्षेप में, जो दुःख देह को स्पर्श करता है, वह दुःख है। लेकिन मन और वाणी के दुःख तो खुद आमंत्रित किए हुए हैं, जो वास्तव में दुःख हैं ही नहीं! इस संसार रूपी सागर में दूषम मन के कारण सभी दुःख हैं।
आमंत्रित किए हुए दुःख वे दुःख नहीं
किसी व्यक्ति को भूख का दुःख हो, कान में दर्द हो या दाढ़ में टीस उठ रही हो, तो उसे दुःख मान सकते हैं। लेकिन अगर कोई शिकायत करे कि “मेरी खिचड़ी में घी क्यों नहीं है?” या “खाना पसंद नहीं आ रहा।” तो यह वास्तव में दुःख नहीं है। क्योंकि देह को ऐसी कोई शिकायत नहीं है, बल्कि यह मन का शोर है। बाल काट दिए जाएँ यह दुःख नहीं है, लेकिन हाँ, कान को कैंची लग जाए और दर्द हो, तो वह दुःख है। व्यापार में घाटा होने के बावजूद अगर रहने, खाने और पीने को मिल रहा हो तो वह सच्चा दुःख नहीं है। कुछ लोगों को ऑफिस की परेशानियाँ होती हैं कि बॉस जैसे-तैसे डाँट देते हैं, सभी के सामने अपमान कर देते हैं, तो उसे भी दुःख नहीं कहा जाएगा। तब मन को मना लेना चाहिए कि तनख्वाह तो देते हैं और घर तो चलता है न! इसी प्रकार कितने ही समाज के दुःख भी होते हैं कि अगर इतना व्यवहार नहीं करेंगे तो कैसा लगेगा? लेकिन इन सभी में वास्तव में दुःखी होने जैसा कुछ नहीं है। मान्यता के दुःखों का रो-रोकर गुणा करें तो वे बढ़ जाते हैं। इसके बजाय उनका हँसकर भाग करें तो दुःख उड़ जाते हैं।
मनुष्य की बुद्धि तो विकसित हो चुकी है। पड़ोस में किसी को हार्ट अटैक आया हो और पता चले कि उनके सीने में दर्द हो रहा था, तो फिर खुद को सीने में दर्द होने पर विचार आता है कि “यदि मुझे हार्ट अटैक आएगा तो?” ये मन के दुःख हैं। उस वक्त विचारों से कहना चाहिए कि “तुम बाहर जाओ, यह शरीर जब जाना होगा, तब जाएगा!” लेकिन दूषम मन वही के वही विचार दोहराता रहता है कि “उन्हें ऐसा हुआ था, तो मेरे साथ भी ऐसा हो गया तो?” इसी वजह से इसके उल्टे असर पड़ते हैं। उसी को दुःख मानकर अगर कोई लगातार उसी के बारे में सोचता रहे, तो जो नहीं होना है वह भी हो जाता है। यानी नकारात्मक विचारों के असर से ही सब बिगड़ता है! जहाँ विचार नहीं होते, वहाँ काम सफल होता है और जहाँ बहुत विचार चलते रहते हैं, वहाँ काम बिगड़ जाता है।
“इसने मुझे ऐसा कहा और वैसा कहा” यह देह को स्पर्श नहीं करता, इसलिए दुःख नहीं है। “हमेशा ऐसा ही करता है, ऐसा है और वैसा है” ऐसे विचार चलते हैं और मन बिगड़ जाता है। फिर जहाँ दुख नहीं भी होता, वहाँ से उसे बुलावा दे बैठता है। इस तरह मनुष्यों को बेचैनी बनी रहती है। मन के ऐसे व्यर्थ दुःखों को तो डिसमिस कर देना चाहिए, और न हो तो अंत में उसका स्वीकार नहीं करना चाहिए। नहीं तो, मन का चक्कर दुःखदायी हो जाएगा।
पशु सहज होते हैं, उनका मन भी सीमित होता है और बुद्धि भी सीमित होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य जैसे दुःख नहीं होते। हम गाय को खाना देते हैं, तो वह दौड़कर आती है और डंडा दिखाएँ तो भाग जाती है। बस इतना ही उसका मन है। गाय कभी यह सोचकर दुखी नहीं होती कि “यह डंडा दिखाकर मेरा अपमान करता है!” हम जानवरों को ‘हुर्र-हुर्र’ करके भगा दें तो वे डर के मारे भाग जाएँगे, लेकिन उन पर शब्दों का कोई असर नहीं होता और न ही इसके परिणामस्वरूप उन्हें कोई दुःख होता है। मनुष्यों में तो अच्छी तरह रहने के लिए घर होता है, खाने-पीने की कोई तकलीफ़ नहीं होती, फिर भी दूषम मन यहाँ-वहाँ से दुःखों को इकट्ठा कर लेता है। आखिरकार, मानसिक दुःख सहन न कर पाने के कारण, मनुष्य अपना जीवन समाप्त कर देने का कदम उठा लेता है। लेकिन यह अत्यंत खतरनाक है, इसके परिणाम बहुत भयंकर आते हैं, इसलिए ऐसा विचार तो कभी मन में लाना ही नहीं चाहिए। धैर्य रखकर वह समय काट लेना चाहिए।
कुदरत का नियम ऐसा है कि हम दूसरों को सुख देंगे तो हमें सुख मिलेगा और दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा। इसलिए अगर दुःख पसंद न हो तो आज से दुःख देना बंद कर देना चाहिए। यदि दुःख दे दिया जाए, तो पछतावा करके वापस लौट आना चाहिए।
जिसका उपाय हो, वही दुःख है
परम पूज्य दादाश्री एक अनोखी व्याख्या देते हुए कहते हैं कि जिसका उपाय हो, वही दुःख कहलाता है और जिसका कोई उपाय ही न हो, वह दुःख कहलाता ही नहीं। यह बहुत सूक्ष्म बात है। जैसे कि, किसी व्यक्ति की एक उँगली जन्म से ही कम है, तो वह दुःख नहीं कहलाएगा, क्योंकि उसका कोई इलाज नहीं है। लेकिन पैर में फोड़ा हुआ हो तो वह दुःख कहलाएगा, क्योंकि उसे मिटाया जा सकता है, उसका उपाय है। दाढ़ में दर्द हो तो उसे दुःख कहा जाएगा, क्योंकि डॉक्टर के पास जाकर इलाज कराया जा सकता है, दाढ़ निकलवाई जा सकती है।
संक्षेप में, कोई परिस्थिति आ जाए, उसमें पता करना चाहिए कि उसका कोई उपाय है? यदि है, तो उपाय करना चाहिए पर दुःखी नहीं होना चाहिए। यदि उसका कोई उपाय ही नहीं है, तो वह परिस्थिति बदली नहीं जा सकती, इसलिए उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। यानी किसी भी हाल में दुःखी नहीं होना चाहिए।
दुःखों से मुक्ति का सच्चा मार्ग
इस काल में मनुष्य ज़्यादातर मानसिक और शारीरिक दुःखों से व्याकुल रहते हैं। परिणामस्वरूप, वे पैसा कमाने में और पाँच इन्द्रियों के विषय भोग में सुख ढूँढते हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोग सच-झूठ करके, दूसरों को धोखा देकर, घर के सदस्यों को दुःखी करके भी अणहक्क (बिना हक़ की, अवैध) की लक्ष्मी और विषय-विकार भोगने में लिप्त रहते हैं। कोई पता ही नहीं करता कि इन सब से वास्तव में सुख बढ़ा या कम हुआ?
वास्तव में, यदि दुःखों से मुक्त होना हो तो आज से ही दूसरों को दुःख देना बंद कर देना चाहिए। पहले जो दुःख दिए होंगे, उनके परिणाम स्वरूप आज हमें दुःख प्राप्त होंगे। उनका समभाव से निकाल करना चाहिए और नए कारणों को सुधारना चाहिए। जीवन में सुख और शांति प्राप्त करने का सरल उपाय बताते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि “ये मन-वचन-काया दूसरों के सुख के लिए खर्च करें तो खुद को संसार में कभी भी सुख की कमी नहीं पड़ती।“
अंततः जब मनुष्य आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर ले, तो जीवन में सदा के लिए सनातन सुख की प्राप्ति होती है। लेकिन जब तक आत्मसाक्षात्कार साध्य नहीं होता, तब तक सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलने से जीवन में सुख और शांति स्थापित होती है।
