जीवन व्यवहार चलाने के लिए वाणी एक महत्त्वपूर्ण साधन है। लेकिन, कभी-कभी जाने-अनजाने में वाणी का उपयोग गलत तरीके से और गलत जगह पर हो जाता है। वाणी के इन्हीं गलत प्रयोगों के अलग-अलग रूपों में से एक है, निंदा-चुगली।
निंदा एक ऐसा दोष है, जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन में आसानी से एक रूप हो गया है। पहले तो यह समझना मुश्किल होता है कि कब हमसे निंदा हो जाती है और समझ में आने के बाद उसे पकड़ पाना मुश्किल है। यहाँ निंदा के स्वरूप, उसके पीछे के कारणों, निंदा करने के जोखिमों और उससे बाहर निकलने की समझ दी गई है।
निंदा किसे कहते हैं?
किसी भी व्यक्ति की निजी बातें करना निंदा कहलाती है। निंदा खास तौर पर व्यक्ति की पीठ पीछे या उसकी ग़ैर-मौजूदगी में की जाती है। कोई भी ऐसा वाक्य बोलना जिससे सामने वाले को कोई नुकसान हो या उसे बुरा लगे, वह सब निंदा ही कहलाती है।
टीका और निंदा में फर्क है। टीका यानी सामने वाले के दिखाई देने वाले दोषों को खुला करना। जबकि, निंदा यानी सामने वाले में वे दोष दिखाई दें या न दें, फिर भी उसके बारे में उल्टा-सीधा बोलते रहना।
निंदा के लक्षण
हमारे आसपास पूरे दिन निंदा-चुगली चलती ही रहती है। पड़ोसियों की, रिश्तेदारों की, ऑफिस के लोगों की या फिर देश के नेताओं और धर्मगुरुओं की निंदा लोग कदम-कदम पर करते ही रहते हैं। जब लोग खाली बैठे रहते हैं, तब चौपाल जमती है और निंदा-चुगली शुरू हो जाती है कि, “फलाने ने ऐसा किया और वैसा किया।"
यह जगत् कैसा है कि सही बात सुननेवाला कोई नहीं मिलता। और झूठी बात सुनने वाले जगह-जगह मिल जाते हैं। अरे, लोग तो मृत व्यक्ति की भी निंदा करना नहीं छोड़ते।
निंदा करने के पीछे के कारण
लोग सबसे ज़्यादा निंदा कब करते हैं? जब किसी भी व्यक्ति के बारे में नेगेटिव अभिप्राय हों तब। अभिप्राय बंधने के कई कारण हो सकते हैं। जैसे, जब किसी व्यक्ति के द्वारा हमारा अपमान हुआ हो, हमारी मनमानी नहीं हुई हो या फिर हमारा नुकसान हुआ हो, तब उस व्यक्ति के प्रति नेगेटिव अभिप्राय बन जाते हैं। फिर राग-द्वेष की परंपरा बन जाती है और वही आगे चलकर निंदा के रूप में बाहर निकलती है।
मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि जब वह दूसरों को गलत साबित करता है, तभी खुद को सही और अच्छा साबित कर पाता है। इसलिए, खुद को ज़्यादा बेहतर और ऊँचा साबित करने के लिए, हम दूसरों की निंदा या बुराई करके उनकी चुगली करते हैं।
निंदा का दूसरा और सबसे बड़ा कारण है स्पर्धा! मनुष्य के जीवन में स्पर्धा से प्रगति हुई और फिर इसी स्पर्धा से निंदाएँ भी शुरू हो गई। स्पर्धा का सदुपयोग प्रगति है और उसका दुरुपयोग निंदा। जहाँ स्पर्धा है, वहाँ निंदा है। स्पर्धा में उतरे लोग हमेशा “मैं बड़ा और वह छोटा”, यही साबित करने में लगे रहते हैं। कई बार हम किसी व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए, वह बेवकूफ़ है और मैं बहुत जानता हूँ, यह साबित करने के लिए उसकी निंदा करते रहते हैं, जिसमें हमारे अपने ही स्वभाव का प्रदर्शन होता है।
वास्तविकता में, इंसान को अंदर कुछ दुःख होता है, इसीलिए, शांति पाने के लिए सामने वाले की निंदा-चुगली और टीका करते हैं। निंदा करने वाले को खुद इस बात का एहसास नहीं होता कि वह क्या कर रहा है। सुखी इंसान कभी भी दूसरों की निंदा या टीका नहीं करता।
निंदा के जोखिम
निंदा आध्यात्मिक मार्ग में एक बहुत बड़ा बाधक दोष है।
जगत् का व्यवहार ऐसा है कि हम जो देंगे, वही हमारे पास लौटकर आएगा। अगर हम किसी की निंदा करेंगे, तो हम खुद भी निंदनीय बन जाएँगे।
खुद को ऊँचा साबित करने के लिए दूसरों की निंदा करने से, वास्तव में न तो हम ऊँचे उठते हैं और न ही हमें कोई सुख मिलता है।
किसी की भी निंदा करने का मतलब है, अपने दस रुपये के नोट को भुनाकर एक रुपया लाना! निंदा और टीका करने वाले हमेशा अपना ही खोते हैं। इससे हमारा समय और शक्ति बेकार में बर्बाद हो जाते हैं।
निंदा के जोखिम के बारे में परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “एक घंटे की निंदा करके इंसान पशुओं की योनि में आठ बार जाने का आयुष्य बाँध लेता है।“ निंदा करके मनुष्य चार गतियों में भटकता रहता है। इसलिए निंदा करना जोखिमभरा व्यापार है। विचक्षण मनुष्य उसे कहते हैं जिसे जागृति रहे कि निंदा करने के क्या परिणाम आएँगे।
यह सारा वातावरण परमाणुओं से भरा हुआ है। अगर हम किसी के लिए एक भी गैर-ज़िम्मेदाराना शब्द कहेंगे, तो उसके स्पंदन सामने वाले तक पहुँच ही जाते हैं।
प्रत्येक मनुष्य में आत्मरूप से भगवान विराजमान हैं। मनुष्य की निंदा करना यानी भगवान की निंदा करने के बराबर है। निंदा करना हिंसा करने के बराबर है। किसी भी व्यक्ति की निंदा करना उसे मारने के बराबर है।
निंदा एक हिंसक भाव है, जिससे पापकर्म बंधता है। निंदा करना गलत है, ऐसा समझ में आए और निंदा करने के बाद उस पर पछतावा हो, तो दिल साफ होता है। लेकिन, अगर किसी को निंदा करने में आनंद आता हो, तो वह अधोगति के कर्म बाँधता है।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, “यह वाणी तो सरस्वती देवी है। निंदा नहीं करनी चाहिए। अगर दुरुपयोग करोगे न तो लक्ष्मी रूठ जाएगी। जहाँ तिरस्कार और निंदा होगी वहाँ लक्ष्मी जी नहीं रहेंगी। लक्ष्मी कब नहीं मिलती? लोगों की बदगोई या निंदा में पड़ें तब लक्ष्मी आना बंद हो जाती है। मन की स्वच्छता, देह की स्वच्छता और वाणी की स्वच्छता हो तो लक्ष्मी मिलती है!“ इसलिए, हमें नेगेटिव वाणी, निंदा करने वाली वाणी या दूसरों को दुःख पहुँचाने वाली वाणी नहीं बोलनी चाहिए।
नरसिंह मेहता ने कहा है कि,
“वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड़ पराई जाणे रे।
सकल लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे।“
सिर्फ वैष्णव ही नहीं, बल्कि सच्चा मनुष्य तो वही कहलाता है जो किसी की भी निंदा में नहीं पड़ता। इतना ही नहीं, वह सभी लोगों के पॉज़िटिव गुणों को देखकर उन्हें वंदन करता है। अगर हम किसी का गुणगान करते हैं, तो हमें लाभ होता है और यदि किसी के बारे में नेगेटिव बोलते हैं, तो हमें नुकसान होता है। लेकिन मनुष्यों को अपने हिताहित का भान ही नहीं है और ऐसी दशा हो गई है कि खुली आँखों से सो रहे हैं। दूसरों की निंदा करके हम केवल अपना ही अहित कर रहे हैं और जानबूझकर नुकसान उठा रहे हैं।
निंदा से बाहर निकलने के उपाय
निंदा से बाहर निकलने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है, पॉज़िटिव चर्चा। किसी का नेगेटिव देखकर उसकी नेगेटिव चर्चा करने के बजाय, उसके पॉज़िटिव ढूँढ निकालें और उसके बारे में पॉज़िटिव बातें करें। जब हम दूसरों के बारे में अच्छा बोलेंगे, तो हमें अंदर से सच्चा सुख मिलेगा। फिर इसी बात को पकड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
अगर किसी के बारे में बोलना ही हो, तो कुछ अच्छा बोलना चाहिए, लेकिन बुरा तो बिल्कुल भी नहीं बोलना चाहिए। कोई इंसान चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो, लेकिन उसके जीते जी या उसकी मृत्यु के बाद भी, उसके बारे में कभी बुरा नहीं बोलना चाहिए। इस संसार में अपनी ही गलतियों को देखकर उन्हें सुधारने की ज़रूरत है।
हम खुद तो निंदा में नहीं पड़ते लेकिन अगर सामने से कोई किसी की निंदा करने आए, तो हमें कोई बहाना बनाकर वहाँ से उठ जाना चाहिए या फिर वहाँ पर मौन रहना चाहिए, पर उसकी नेगेटिव बातों में सहमति नहीं देनी चाहिए। यदि हम फुर्सत में हों, तो कोई किताब या कुछ और लेकर बैठ जाना चाहिए, लेकिन निंदा नहीं करनी चाहिए।
यदि लोग हमारी निंदा करते हैं, तो उन्हें उसकी छूट देनी चाहिए, उस पर कोई हर्ज नहीं होना चाहिए और शांति से विचार करना चाहिए, लेकिन हमें कभी किसी की निंदा में नहीं पड़ना चाहिए।
जो व्यक्ति हाज़िर न हो, उसके बारे में बिल्कुल भी नेगेटिव बातें नहीं करनी चाहिए। यदि हमारी इच्छा न हो, फिर भी ऐसा हो जाए, तो तुरंत माफी माँग लेनी चाहिए कि, “हे भगवान! मुझसे नेगेटिव बोला गया, उसके लिए मैं माफ़ी माँगता हूँ। ऐसी भूल फिर कभी नहीं करूँगा, ऐसा निश्चय करता हूँ। ऐसी भूल फिर से नहीं करने की मुझे शक्ति दीजिए।“ इस प्रकार पश्चाताप करने से भी निंदा के जोखिम से बचा जा सकता है।
