खणखोद यानी क्या?
खणखोद यानी किसी भी व्यक्ति या उसकी परिस्थिति के बारे में नेगेटिव या व्यर्थ चर्चा करना।
“आपने सुना, उसने ऐसा किया?”
“हैं! यह तो बहुत गलत है!”
“ऐसा भी कोई करता है? मैं तो ऐसा कभी नहीं करूँगा!”
“फलाने का क्या हुआ?”
कोई एक सामान्य बात हो, फिर उसमें नमक, मिर्च, हल्दी, धनिया, जीरा, राई, काली मिर्च, दालचीनी, लौंग, अदरक आदि डालकर उसका तड़का लगाया जाता है! जब वही बात वापस उस व्यक्ति के पास पहुँचती है, तो उसे लगता है कि यह क्या हो गया? असली बात ही पूरी बदल चुकी होती है!
एक कहानी बहुत प्रचलित है। एक चूहे की सात पूँछें थीं। आस-पास के सभी लोग उसे “सात पूँछ का चूहा, सात पूँछ का चूहा” कहकर चिढ़ाते थे। चूहे को लगा कि अगर मैं अपनी पूँछ कटवा दूँ, तो लोग चिढ़ाना बंद कर देंगे। इसलिए उसने एक पूँछ कटवा दी। लेकिन लोगों ने चिढ़ाना बंद नहीं किया और लोग उसे “छह पूँछ का चूहा, छह पूँछ का चूहा” कहने लगे। बेचारे चूहे ने परेशान होकर एक-एक करके अपनी सारी पूँछें कटवा दीं। लेकिन लोग फिर भी नहीं रुके। सबने उसे “बिना पूँछ का चूहा, बिना पूँछ का चूहा” कहना जारी रखा।
खणखोद में भी ऐसा ही होता है, जिसमें बिना किसी तथ्य या कारण के लोगों के बारे में नेगेटिव बातें करना जारी ही रहता है।
खणखोद के लक्षण
खणखोद यानी, खोद-खोद कर घाव कर देना। जैसे बंदर का घाव कहा जाता है, वैसे यह भी एक प्रकार का घाव होता है।
खणखोद शब्द में खण (खरोंचना) का अर्थ है कुरेद-कुरेद कर ऐसी स्थिति कर देना कि वहाँ खुजली होने लगे। जैसे बंदर का घाव कहा जाता है, यह भी उसी तरह का एक घाव होता है।
इतना ही नहीं, यदि यह घाव हुआ हो, तो सब मिलकर उसे और बड़ा कर देते हैं। इसलिए जलन शांत होने के बजाय बढ़ती जाती है और व्यक्ति बेचैन हो जाता है।
“आप आज फलाने प्रसंग में क्यों नहीं आए? आपको मना किया था क्या? किसी के साथ झगड़ा हुआ है?”
“आपके बच्चे मंदिर क्यों नहीं आते? भगवान को नहीं मानते?”
“आपके हसबैंड नहीं आए, बहुत गलत बात है! सभी के आए हैं।”
“आप वहाँ अकेले रहते हैं? और आपकी वाइफ यहाँ अकेली रहती हैं?”
“आप अस्पताल में भर्ती थे? क्यों रहना पड़ा? आपकी तबीयत खराब हुई थी?”
“आपने चूड़ियाँ नहीं पहनी? बिंदी नहीं लगाई? सब ठीक है न? हम तो सुहागिनें कहलाती हैं, पहनना पड़ता है।”
“आप तो बिल्कुल सूख गए हैं? तबीयत ठीक है न? कहीं कैंसर-वेंसर तो नहीं हो गया न?” ऐसे पूछते हैं कि सामने वाला घबरा ही जाए!
लगातार प्रश्न पूछते ही रहते हैं कि, “फलाना व्यक्ति कौन है? उसका फलाने व्यक्ति के साथ क्या संबंध है? फलाने यहाँ क्यों आए हैं?”
गाड़ी कहाँ से छूटी, किस पटरी पर चढ़ी, कहाँ जाने वाली है, इसका कोई ध्यान ही नहीं रहता! बेवजह समय और शक्ति बर्बाद हो जाती है।
इस तरह, संसार में बात-बात पर आमने-सामने असरों का आदान-प्रदान होता रहता है। एक प्रकार की नेगेटिव भाव प्रतिष्ठा होती रहती है। जिसकी बात हो रही होती है, उसे लगता है कि “मैंने कुछ गलत किया?” और उसका दुःख शुरू हो जाता है।
खणखोद का दूसरा लक्षण है, बात का बतंगड़ बन जाना। इसको समझने के लिए एक बड़ी रोचक कहानी है। एक पंडित रास्ते से चलते हुए जा रहे थे। तभी उनके मुँह से कुछ निकला। निकालकर देखा तो मुर्गे का पंख था। उन्हें ताज्जुब हुआ कि यह मुँह में कैसे आ गया? वे बहुत चिंतित हो गए। जब घर पहुँचे तब उन्होंने पत्नी को यह बात बताई। पत्नी को भी ताज्जुब हुआ। पंडित ने पत्नी से कहा कि ध्यान रखना, यह बात कभी किसी को पता न चले, नहीं तो लोग इसका गलत मतलब निकालेंगे। पत्नी ने कहा, “मैं कसम खाती हूँ कि किसी को नहीं बताऊँगी।”
लेकिन थोड़ी देर में पत्नी को विचार आया कि, “यह बात मैं अपने तक नहीं रख पाऊँगी, मेरा तो सिर फटा जा रहा है! कानों से धुआँ निकल रहा है! एक काम करती हूँ, मैं अपनी विश्वासपात्र पड़ोसन को यह बात बताकर हल्की हो जाती हूँ।” फिर पंडित की पत्नी ने अपनी विश्वासपात्र पड़ोसन को यह बात बताई और उससे प्रॉमिस लिया कि वह यह बात किसी को नहीं बताएगी। लेकिन पंडित की पत्नी के बताने के तरीके में कुछ अंतर हुआ या पड़ोसन के समझने में। बात कुछ इस तरह पहुँची कि पंडित के मुँह से बहुत सारे पंख निकले। पड़ोसन को बड़ा ताज्जुब हुआ, फिर भी उसने पंडित की पत्नी को आश्वासन दिया कि वह चिंता न करे, ऐसा तो होता ही रहता है। और वचन दिया कि “चिंता मत करो, मैंने अपने होंठ सी लिए हैं, मैं यह बात किसी से नहीं कहूँगी!”
लेकिन तुरंत ही पड़ोसन का मन हुआ कि वह यह बात किसी को बताए। उसे वहीं एक धोबिन जाती हुई दिखाई दी, और उसने उसे यह बात बता दी। मगर उसने बात इस तरह बताई मानो पंडित के मुँह से पूरा मुर्गा ही निकल आया हो! धोबिन को भी ताज्जुब हुआ कि मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा, क्योंकि पंडित जी तो शाकाहारी हैं! उसने भी वचन दिया कि वह यह बात किसी को नहीं बताएगी, लेकिन रास्ते में ही उसकी सहेली मिल गई, तो उसने यह बात उसे बता दी। लेकिन जोश में आकर उसने ‘मुर्गा’ की जगह ‘मुर्गे’ कह दिया। फिर जब उस सहेली ने यह बात अपने पति को बताई, तब ऐसा लगा मानो पंडित के मुँह से एक नहीं, बल्कि मुर्गों का पूरा झुंड ही निकला हो।
धीरे-धीरे शाम होने तक यह बात पूरे गाँव में फैल गई। फिर तो मुर्गे कबूतर, बतख और चिड़ियों में बदल गए। रात होते-होते तो पूरा गाँव इस चमत्कारी घटना को देखने के लिए पंडित के घर के बाहर इकट्ठा हो गया। पंडित ने तुरंत इस बात का खंडन किया कि उनके मुँह से कोई चिड़िया निकली है। लेकिन कोई उनकी बात मानने को तैयार नहीं था और सभी ज़िद करने लगे कि वे अपनी चमत्कारिक शक्ति का प्रयोग करके सबको मुँह से चिड़िया निकालकर दिखाएँ। पंडित गुस्सा हो गए, लेकिन कोई चारा नहीं था, इसलिए उन्होंने एक तरकीब लगाई। पंडित ने सबको अपने घर के सामने बैठने के लिए कहा और खुद घर में जाकर पीछे के दरवाज़े से भागकर जंगल में चले गए! उन्होंने तय किया कि जब तक गाँव के लोग शांत नहीं हो जाते और यह नहीं मान लेते कि यह बात गलत थी, तब तक वे वापस घर नहीं लौटेंगे।
इस प्रकार, खणखोद के पीछे कोई कारण नहीं होता। यह उद्देश्य या तर्क के बिना होने वाली व्यर्थ चर्चा ही होती है। बिज़नेस पार्टियों में और खास तौर पर महिलाओं की किटी पार्टियों में यही सब होता रहता है। खाली समय में सब इकट्ठा होते हैं, खाते-पीते हैं और तरह-तरह की एक्टिविटी करके मज़ा करते हैं। फिर ऐसी ही गप्पें और गपशप चलती रहती हैं। आम तौर पर, अपनी सोच के साथ जब दूसरों की सोच मिल जाती है, तो एक जैसी सोच वाले लोगों की टोली बन जाती है।
खणखोद के जोखिम
लोगों की बातों को कुरेदना, निंदा-चुगली करना और बात का बतंगड़ बनाकर उसमें से मज़ा लेना बहुत बड़ा जोखिम है। यदि हमारे मन में किसी व्यक्ति के लिए नेगेटिव विचार आया हो, फिर वही बात हम दूसरों से कहें, दूसरा तीसरे से कहे, और इस तरह सबको बताते फिरें, तो इससे अधोगति के कर्म बंधते हैं।
व्यर्थ नेगेटिव चर्चाएँ करने में मनुष्य का अमूल्य जीवन व्यर्थ चला जाता है।
नेगेटिव करने से खुद को भी दुःख होता है और सामने वाले को भी दुःख पहुँचता है। जबकि पॉज़िटिव खुद को भी सुख देता है और दूसरों को भी सुखी करता है। ऐसी बेकार चर्चाओं में सुख लेने से हम हर तरह से अपना ही नुकसान करते हैं।
किसी भी व्यक्ति के बारे में नेगेटिव बातें करने से उसे दुःख पहुँचता है, और जब हमें उसका दंड मिलता है तब हम ही दुःखी होते हैं। दंड भोगने के बाद भी यदि खणखोद की आदत नहीं जाती, तो फिर उसे कोई सुधार नहीं सकता।
इतना ही नहीं, जिस व्यक्ति से हम किसी की नेगेटिव चर्चा करते हैं, उसके दिमाग में हम ज़बरदस्ती नेगेटिव अभिप्राय भर देते हैं। जिससे उस व्यक्ति का दिमाग खराब होता है और उसका निमित्त हम ही बनते हैं।
या फिर, कोई व्यक्ति हमसे किसी के बारे में कुछ नेगेटिव बातें करता है। पहले तो हमारा मन उसके प्रति बिल्कुल साफ होता है, लेकिन बाद में उसमें कचरा भर जाता है। परिणामस्वरूप, उसका बोझ हमें ही महसूस होने लगता है और बिना किसी वजह के हमें ही भुगतना पड़ता है।
जिस व्यक्ति के बारे में हम नेगेटिव चर्चाएँ करते हैं, उसका जो नुकसान होता है उसके निमित्त हम ही बनते हैं। कुछ लोग सुख से रह रहे होते हैं, लेकिन उनके बारे में नेगेटिव चर्चाएँ शुरू होने के बाद कुछ ही समय में वे डिप्रेस हो जाते हैं, अपसेट हो जाते हैं और मानसिक पीड़ा से गुज़रने लगते हैं। उन्हें ऐसा लगने लगता है कि “इन लोगों ने मुझे अकेला कर दिया है, मुझे अपने से अलग समझते हैं।”
पॉज़िटिव शब्द बोलने से व्यक्ति मज़बूत बनता है, जबकि नेगेटिव शब्द उसे कमज़ोर कर देते हैं। “तू ऐसा करता है? ऐसा नहीं करना चाहिए।” जैसे तीन-चार नेगेटिव वाक्यों से तो पूरी बिलीफ़ बिगड़ जाती है।
लोगों की खणखोद करने की आदत किस तरह व्यक्ति की मान्यता बदल देती है, इसकी यह एक दृष्टांत कथा है। एक ब्राह्मण अपने कंधे पर बकरा लेकर जंगल के रास्ते से गुज़र रहे थे। रास्ते में तीन ठग आए। उन्होंने सोचा कि इस बकरे को हथिया लेना है। इसलिए तीनों ठग ब्राह्मण के रास्ते में एक-एक किलोमीटर की दूरी पर खड़े हो गए।
पहले ठग ने ब्राह्मण को रोका और पूछा, “महाराज! ब्राह्मण होकर कंधे पर यह कुत्ता लेकर जा रहे हैं?” इस पर ब्राह्मण चौंके और बोले, “नहीं, यह तो बकरा है।”
वे एक किलोमीटर आगे बढ़े तो दूसरा ठग मिला और उसने कहा, “महाराज! हाय हाय, यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? क्या ब्राह्मण के कंधे पर कुत्ता शोभा देता है?” ब्राह्मण थोड़ा घबरा गए, लेकिन फिर बोले, “यह कुत्ता नहीं, बकरा है।” वे आगे तो बढ़ गए, पर उनके मन में शंका उठने लगी।
थोड़ी ही दूर पर तीसरा ठग मिला और बोला, “महाराज! यह क्या? आपको घर जाकर नहाना पड़ेगा। भला कुत्ते को इस तरह छुआ जाता है?” तब ब्राह्मण की मान्यता बदल गई कि, “जब सभी कह रहे हैं, तो यह कुत्ता ही है।” और तुरंत कंधे से बकरे को उतारकर चलते बने। फिर तो तीनों ठग बकरे को मारकर खा गए।
संसार में एक-दूसरे के साथ नेगेटिविटी का आदान-प्रदान होता ही रहता है। व्यक्तियों के प्रति नेगेटिव भाव प्रतिष्ठा करके खुद भी बिगड़ते हैं और सामने वाले को भी दोगुना बिगाड़ते हैं। नेगेटिविटी ही संसार में दुःखी होने का कारण है।
खणखोद की आदत से बाहर निकलने के उपाय
पॉज़िटिविटी सुखी होने का कारण है। हम पॉज़िटिव रहेंगे, तो हमारी ज़बरदस्त शक्तियाँ बढ़ती जाएँगी, जबकि नेगेटिव रहने से शक्तियाँ टूट जाती हैं।
किसी भी गाँव में मंदिर भी होता है और कूड़े का ढेर भी होता है। हमें अपनी दृष्टि अच्छी चीज़ों पर रखनी चाहिए और बुरी चीज़ों को अनदेखा कर देना चाहिए।
जीवन में एक सिद्धांत रखना चाहिए। किसी के कहने से हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। यदि हम किसी की बातों में आ जाते हैं, तो हमारे भीतर उसके प्रति नेगेटिव अभिप्राय बैठ जाता है और हमारा अपना ही दिमाग खराब होता है। यह सबसे बड़ी मूर्खता कहलाती है।
किसी भी नेगेटिव बात को तीन छलनियों से छानना चाहिए। क्या यह बात सच है? क्या यह अच्छी है? और क्या यह काम की है? यदि बात इन तीनों छलनियों से पार न हो तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। ज़्यादातर लोग सुनी-सुनाई बातें ही करते हैं, वह बात सच है या नहीं उन्हें यह भी पता नहीं होता। किसी व्यक्ति की नेगेटिव बातें अच्छी तो होती ही नहीं। और साथ ही, यह जाँचने पर कि क्या यह बात करने से किसी को फ़ायदा होगा या यह बात काम आएगी या नहीं, तो पता चलता है कि इसमें सिर्फ बेकार की चर्चा ही होती है।
यदि कोई हमारे पास खणखोद करने या किसी व्यक्ति की नेगेटिव बातें करने आए, तो हमें उन्हें धीरे से कहना चाहिए कि, “उस व्यक्ति के बारे में जैसा हम मान रहे हैं, वैसा नहीं है, उनमें बहुत कुछ पॉज़िटिव भी है। क्यों न हम उसकी पॉजिटिव बातों पर ध्यान दें? हम नेगेटिव फैलाकर क्यों दोष के भागी बनें?”
यदि हम हताश हो चुके व्यक्ति के बारे में भी अच्छा बोलें, तो वह नॉर्मल होकर फिर से खिलने लगता है। कोई एक नेगेटिव बोले, तो उसके सामने उसकी पाँच पॉज़िटिव बातें बोलनी चाहिए। नेगेटिव बात को मोड़ा भी जा सकता है कि, “आप जैसा कह रहे हैं, वैसा नहीं है। मैं उन्हें जानता हूँ। थोड़ी-बहुत गलती तो सभी से होती है, लेकिन आफ्टर ऑल वे बहुत अच्छे इंसान हैं।“
कोई भी जगह हो - फिर चाहे वह घर हो, ऑफिस हो या समाज। सबको मिलकर यह तय करना चाहिए कि हमें वहाँ सिर्फ पॉज़िटिव बातें ही करनी हैं। भले दस चीज़ें बिगड़ गई हों, लेकिन कोई एक भी चीज़ अच्छी हुई हो, तो उसी की पॉज़िटिव चर्चा करेंगे, नेगेटिव की चर्चा ही नहीं! यदि कोई व्यक्ति नेगेटिव बातें करने आए, तो आसपास के लोगों को उसे सावधान करना चाहिए और हो सके तो शांति से रोक देना चाहिए।
दूसरी ओर, यदि कोई हमारे बारे में नेगेटिव बोल रहा हो, तो हमें उसके असर में नहीं आना चाहिए। जैसे सर्दियों में हम ठंड से नहीं कहते कि तुम बंद हो जाओ। सर्दियों का मौसम कभी बदल या सुधर नहीं सकता। हमें ही एडजस्ट होकर स्वेटर पहनना पड़ता है, तभी ठंड से बचा जा सकता है। ठीक इसी तरह, लोगों की नेगेटिव बातों के बीच हमें सही समझ का बख्तर पहनकर रहना चाहिए, ताकि हमारी मान्यता न बिगड़े।
जहाँ नेगेटिव बातों को हम रोक नहीं सकते, वहाँ प्रार्थना और पॉज़िटिव भाव करना चाहिए कि “हे भगवान! इनकी कमियाँ दूर हों, इन्हें अपनी गलतियाँ दिखाई दें, ये उनसे मुक्त हों और ये जो कुछ भी बोल रहे हैं, उसमें इनकी जागृति बढ़े।”
अब तक हमने जो भी नेगेटिव बोला हो, उसका प्रत्याख्यान करना चाहिए कि, “ऐसा कभी नहीं बोलना है। हो सके तो दो अच्छी बात करेंगे, लेकिन उल्टा तो बोलना ही नहीं है।”
गलत बोलने से हमारा भी नुकसान होता है और सामने वाले का भी नुकसान होता है। इसलिए, हमारी वाणी से क्या बोला जा रहा है और उसका सामने वाले पर क्या उल्टा असर हो रहा है, इस पर हमारी जागृति होनी ही चाहिए।
