संसार व्यवहार में हम कहते रहते हैं कि "जैसा बोओगे, वैसा काटोगे!", यदि आप दूसरों का नुकसान करेंगे तो आपका नुकसान होगा। लेकिन नुकसान होने से किस तरह रोका जाए, इसकी समझ प्राप्त नहीं होती। माता-पिता की सेवा करनी चाहिए, दूसरों का भला करना चाहिए तो सुखी होंगे, पर किस तरह से किया जाए इसका प्रैक्टिकल तरीका नहीं मिलता। परिणामस्वरूप, गणित में सवाल देकर जवाब बता दिया गया हो, पर सवाल हल करने का तरीका न दिया गया हो, तब जो उलझन होती है वैसी ही दशा लोगों की होती है। जैसे कोई मशीन बिगड़ गई हो और आवाज़ कर रही हो तो ठोक-पीट करें कि, "बेकार है, ये लोग सस्ती मशीन देते हैं, पैसे ऐंठते हैं।" तो कलह बढ़ेगी। इसके बजाय विस्तार से देखना पड़ेगा कि मशीन कहाँ अटक रही है? कौन सा पार्ट खराब हो गया है? फिर खराब पार्ट को बदल देते हैं तब मशीन चालू हो जाती है या खड़खड़ाते हुए पार्ट पर लुब्रिकेशन कर दें तो आवाज़ बंद हो जाती है। इसे व्यावहारिक कला कहा जाता है। ऐसी ही व्यावहारिक कला व्यक्तियों के साथ व्यवहार में भी आनी चाहिए। अलग-अलग प्रकार के व्यवहार के सोल्यूशन के लिए अलग-अलग कलाएँ चाहिए इससे जीवन से क्लेश दूर हो जाता है।

मनुष्य जीवन का ध्येय

जीवन की नैया को किस मंज़िल तक पहुँचाना है, यह तय किए बिना, दिशा जाने बिना उसे हाँकते ही जाएँ तो मंज़िल कैसे मिलेगी? चप्पू चला-चलाकर थक जाएँगे, हार जाएँगे और अंत में मझधार में डूब जाएँगे।

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हमें विचार करना चाहिए कि संसार में हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? जन्म लिया, बचपन से बड़े हुए, पढ़े-लिखे, नौकरी-धंधा किया, शादी की, बच्चे हुए, उनकी शादी करवाई, बूढ़े हुए और अंत में अर्थी निकली। जीवन गुज़ार रहे थे, वे खुद ही गुज़र गए। देह छोड़ते वक्त कुछ भी हाथ में नहीं आया। घर, बंगला, गाड़ी, पैसा, परिवार ही नहीं, हमारा नाम भी यहीं का यहीं रह गया। साथ क्या आया? हमारी ही उलझनें, हमारे ही राग-द्वेष।

मनुष्यगति से चारों गतियों में जाने के कर्म बाँधे जा सकते हैं। चारों गतियों की भटकन से मुक्त होकर मोक्ष में भी मनुष्य देह से ही जाया जा सकता है। लोगों के सुख के लिए जीवन जिएँ तो फिर से मनुष्य में जा सकते हैं या देवगति में जा सकते हैं और स्वरूप का भान प्राप्त हो जाए, तो मोक्षगति में जाया जा सकता है, इतनी मनुष्यपन की सिद्धि है। जैसे एक इंजन लाकर उसे चलाते रहें, पर उसके साथ पट्टा जोड़कर पानी निकालने का या कुछ पीसने का काम न करें तो वह इंजन बेकार जाता है। उसी तरह पूरी ज़िंदगी दौड़-धाम करें, पर उसके साथ जीवन का कोई ध्येय तय नहीं किया हो, तो जीवन बेकार जाता है।

क्लेश का कारण

इस दुषम काल में मनुष्य इतने दुःखों से घिर गए हैं कि सहन नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप लोगों का दिमाग क्रैक हो जाता है या वे डिप्रेशन और हताशा में डूब जाते हैं। पैसों की किल्लत, सेहत की परेशानियाँ, बच्चों के पालन-पोषण की चुनौतियाँ, पति-पत्नी के रिश्तों में क्लेश, सास-बहू के बीच का क्लेश, जिसका कोई अंत ही नहीं है। इस क्लेशमय जीवन का मुख्य कारण नासमझी ही है! परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, तमाम दुःखों का मूल तू खुद ही है!” पहला मूल कारण अज्ञानता है। उसमें भी, व्यावहारिक नासमझी के कारण जीवन में छोटे-बड़े क्लेश होते रहते हैं और खुद दुःखी होता है। जैसे जलता हुआ गोला दूसरों को जलाता है, वैसे ही खुद दुःखी हो तो दूसरों को दुःख दिए बिना नहीं रह सकता।

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बच्चों के लिए माता-पिता की अत्यधिक भावनाएँ, मोह, ममता और एक-दूसरे की ज़रूरत को समझ न पाने के कारण दोनों के बीच किचकिच चलती ही रहती है। घर में सबसे नज़दीक का रिश्ता पति और पत्नी का होता है; दोनों एक-दूसरे की हूँफ से बंधे होने के बावजूद सबसे ज़्यादा क्लेश उन्हीं के बीच होता है। इतना ही नहीं, परिवार में सास-बहू, देवरानी-जेठानी, सगे भाई-बहनों के व्यवहार में, और कामकाज में बॉस-अन्डरहैन्ड, बिज़नेस पार्टनर, सहकर्मी या व्यापारी के साथ व्यवहार में क्लेश चलता रहता है। अरे! संसार छोड़कर त्यागी के रूप में जीवन जीए वहाँ भी गुरु-शिष्य के बीच, सहाध्यायियों में, संघपति के साथ व्यवहार तो बना ही रहता है। इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में क्लेश रहित जीवन जीना आना ही चाहिए।

सभी धर्मों का सार

सभी धर्मों का सार इतना ही है कि हमारे मन-वचन-काया से किसी भी जीव को किंचित्‌‍मात्र भी दुःख न हो। फिर चाहे घर हो, तो उसमें क्लेश करके दुःख न दें। नौकरी-धंधा करें, तो अनीति और अप्रामाणिकता से किसी को दुःख न दें। बॉस के रूप में अपने नीचे काम करने वालों को दुःख न दें और कर्मचारी के रूप में बॉस को चिल्लाना न पड़े, वैसे सिंसियर रहकर काम करें। पति और पत्नी के रूप में एक-दूसरे को दुःख न दें। माता-पिता के तौर पर बच्चों पर दबाव डाले बिना संस्कार दें और बच्चों के तौर पर माता-पिता की दिल से सेवा करें। संक्षेप में, किसी भी तरह से दूसरों को दुःख पहुँचाना अधर्म है। मंदिर में जाकर पूजा-पाठ या क्रियाएँ करते रहना ही धर्म नहीं है, बल्कि क्लेश रहित जीवन जीना और किसी को दुःख न देना वह धर्म है।

इसलिए, हररोज़ सुबह दिल से पाँच बार प्रार्थना करनी चाहिए, “प्राप्त मन-वचन-काया से इस जगत् में किसी भी जीव को किंचित्‌‍मात्र भी दुःख न हो, न हो, न हो!” और इसके बावजूद किसी को भूल से दुःख दे दिया जाए, तो उसका हृदयपूर्वक पश्चाताप करके उसे धो डालने से जीवन वास्तव में शांतिमय बीतता है।

धर्म के शास्त्रों या प्रवचनों के आधार पर खुद यह समझने लगे कि सामने वाला गाली दे रहा है, मेरा नुकसान कर रहा है या देह में दर्द उत्पन्न हो रहा है, ये सब मेरे ही कर्मों के उदय के कारण है ऐसी समझ फिट हो जाए, तो समता से कर्म पूरा होता है और जीवन में आंतरिक या बाहरी क्लेश को टाला जा सकता है।

अंत में, व्यवहार आदर्श होना चाहिए!

आदर्श व्यवहार यानी किसी भी जीव को किंचित्‌‍मात्र भी दुःख न हो। घर के, बाहर के, अड़ोसी-पड़ोसी किसी को भी, हमसे दुःख नहीं हो, उसे आदर्श व्यवहार कहा जाता है। फिर भी हमसे किसी को दुःख हो जाए, तो तुरंत ही मन में उसके लिए माफ़ी माँग लेनी चाहिए और फिर से दुःख न दिया जाए, इसके लिए निश्चय करना चाहिए।

आदर्श व्यवहार जीवन की शुरुआत से ही होना चाहिए। उसमें बड़ों के प्रति विनय रखना चाहिए। घर में बूढ़े माता-पिता को दुत्कार कर बाहर मंदिर में धर्म के बड़े-बड़े कार्य करते हों, तो वह आदर्श व्यवहार नहीं है। जिसका व्यवहार आदर्श होता है, उसके आसपास तो सुगंध फैल जाती है।

माता-पिता और बच्चों के बीच क्लेश रहित जीवन

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, माँ और बाप बनने की ज़िम्मेदारी देश के प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी से भी अधिक है!” आजकल कोई भी नौकरी ढूँढने जाएँ तो ग्रेजुएट होने का सर्टिफिकेट तो चाहिए ही, लेकिन शादी से पहले या बच्चों को जन्म देने से पहले किसी प्रकार का सर्टिफिकेट नहीं माँगा जाता। जब संसार व्यवहार के हर ज्ञान के लिए सर्टिफिकेट होता है, तो आदर्श माता-पिता बनने के लिए क्यों नहीं? घर में माता-पिता से ही बच्चों को सबसे ज़्यादा संस्कार मिलते हैं। इसलिए माता-पिता के पास यह समझ होनी आवश्यक है कि बच्चे को कहाँ कितना कहना है, कहाँ एन्करेज करना है और कहाँ डिस्करेज करना है। फिर भी, परम पूज्य दादा भगवान से हमें कुछ ऐसी समझ मिलती है, जो हमें एक सर्टिफाइड मदर और फादर बनने में मददरूप हो सकती है।

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माता-पिता दिन में कई बार नेगेटिव शब्द बोलकर बच्चों को सुधारने के लिए बार-बार टोकते रहते हैं, तो बच्चों के मानस पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। वे डिप्रेशन में चले जाते हैं या सामने जवाब देने लगते हैं। बच्चों से दोस्त की तरह बात करनी चाहिए। उन्हें काँच के बर्तन की तरह सँभालना चाहिए। जैसे एक माली गुलाब के फूल को पोषण देता है, सँभालता है, रक्षा करता है और काँटे निकाल देता है, उसी तरह माता-पिता को बच्चों की प्रकृति के पॉज़िटिव गुणों को निखारना चाहिए और उनकी प्रकृति को पहचानकर काम लेना चाहिए। बच्चा कुछ अच्छा करके आए तो अत्यधिक राग नहीं और खराब करे तो द्वेष नहीं, ऐसा प्रेम माता-पिता को बच्चों पर रखना चाहिए। एक आँख में प्रेम और एक आँख में कड़ाई  रखकर व्यवहार करना चाहिए। बच्चों को लगे कि मेरी गलती के लिए मुझे डाँट रहे हैं, लेकिन बाकी सभी तरह से मुझसे बहुत प्रेम करते हैं। अत्यधिक लाड़-प्यार भी नहीं रखना चाहिए और व्यवहार में बिल्कुल ऊपर-ऊपर से भी नहीं हो जाना चाहिए। दोनों के बीच बैलेंस रखना चाहिए। कभी भी बच्चों से गलती हो जाए तो उन पर हाथ नहीं उठाना चाहिए। मारने से वे बाहर से ठीक दिखते हैं, लेकिन भीतर से टूट जाते हैं। अनिवार्य होने पर ही बच्चों को सलाह देनी चाहिए। बच्चों को सुधारने से पहले माता-पिता को खुद सुधरना चाहिए। माता-पिता के आचार, विचार और संस्कार इतने ऊँचे होने चाहिए कि बच्चों पर उनका प्रभाव पड़े। अंत में तो बच्चे प्रेम से ही वश में आते हैं। माता-पिता की ओर से बच्चों को इतना प्रेम मिले कि यदि बच्चा किसी गलत राह पर चला गया हो और माता-पिता एक ही बार कहें, “यह हमें शोभा नहीं देता,” तो उसका दूसरे दिन से बंद हो जाए।

अलग-अलग परिस्थितियों में बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करन चाहिए, इसकी विस्तृत समझ के लिए पढ़ें: पॉज़िटिव पैरेंटिंग: माता-पिता और बच्चों का व्यवहार।

पति-पत्नी में क्लेश रहित जीवन

पति और पत्नी एक-दूसरे को पूरी ज़िंदगी सुख देने के लिए शादी करते हैं। लेकिन बाद में देखें तो शादीशुदा ज़िंदगी में जाने-अनजाने में दोनों को एक-दूसरे से दुःख होता रहता है। उसमें भी कलियुग का प्रभाव ऐसा विपरीत है कि जहाँ कुछ न हो, वहाँ भी पति-पत्नी में मतभेद, शंका, आक्षेप, धोखेबाज़ी आदि उत्पन्न हो जाते हैं और दोनों एक-दूसरे को दुःख पहुँचा देते हैं। खास तौर पर पति-पत्नी में खुद के मत का आग्रह, खुद सही हैं और सामने वाला गलत है यह साबित करने की ज़िद के कारण शुरुआत में मतभेद होते हैं, जो बढ़कर मनभेद में बदल जाता है। बात ज़्यादा बिगड़ जाए तो तलाक की नौबत आकर खड़ी हो जाती है।

वास्तव में पति-पत्नी को एक-दूसरे के पूरक बनकर रहना चाहिए। अपने मत मत पर अड़े रहने के बजाय के बजाय सामने वाले को क्या पसंद है, उसके आधार पर खुद एडजस्ट हो जाना चाहिए। पति-पत्नी एक-दूसरे के मित्र बनकर रहें तो दांपत्य जीवन सुंदर बनता है। जहाँ मित्रता होती है वहाँ एक-दूसरे के प्रति अत्यधिक राग-द्वेष नहीं होते, क्योंकि वहाँ अत्यंत अपेक्षा, आसक्ति और मालिकी भाव नहीं होता। जैसे दो मित्र साथ रहते हों, काम में एक-दूसरे की मदद करते हों और पूरक बनकर जीवन बिताते हों वैसे। लेकिन एक-दूसरे के साथ एडजस्ट नहीं होने से, एक-दूसरे पर मालिकी भाव होने से या एक-दूसरे को सुधारने के प्रयत्न करने से पति-पत्नी के बीच निरंतर टकराव होता रहता है। सामने वाले को सुधारने जाओ तो रिएक्शन आता है जिससे झगड़े और बढ़ते हैं।

उसमें भी बच्चे होने के बाद यदि पति-पत्नी उनकी मौजूदगी में झगड़ते हैं, तो बच्चों के मानस पर बुरा असर पड़ता है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, जहाँ किंचित्‌मात्र क्लेश है वहाँ धर्म नहीं है।” जिस घर में क्लेश नहीं है, वह घर स्वर्ग जैसा सुंदर है। लेकिन लोगों में यह मान्यता घर कर गई है कि, “बर्तन होंगे तो खड़केंगे ही!” वहाँ हमें यह समझने की ज़रूरत है कि मनुष्य बर्तनों की तरह निर्जीव नहीं हैं। एक-दूसरे को दुःख हो तो आमने-सामने स्पंदन पहुँचते हैं।

पति-पत्नी को तो एक-दूसरे की मदद हो, इस तरह से जीना चाहिए। पति या पत्नी में से किसी को मुश्किल हो, तो किस तरह उनकी मुश्किल दूर हो, इस तरह से व्यवहार करना चाहिए। उसमें भी पत्नी को पति की आश्रित कहा जाता है। जो अपने आश्रित हों, उन्हें तो दुःख नहीं ही देना चाहिए और हाथ तो बिल्कुल नहीं उठाना चाहिए। यदि दोनों में से एक व्यक्ति संबंध को बार-बार तोड़ने की कोशिश करे, तो दूसरे को उसे जोड़ते रहना चाहिए। एक-दूसरे की प्रकृति का निरीक्षण करके उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। घर में पति-पत्नी का व्यवहार इतना सुंदर होना चाहिए कि दोनों को ऐसा लगे कि ऐसा जीवनसाथी मिला यह मेरा नसीब है, वर्ना ऐसा कहाँ मिलता?

पति-पत्नी में यदि सच्चा प्रेम हो, तो वह किसी भी संयोगों में घटता-बढ़ता नहीं है। अभी तो दोनों कुछ महीने एक-दूसरे से दूर रहें, तो दूसरे व्यक्ति की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उसे प्रेम कैसे कहा जा सकता है? प्रेम में तो अर्पणता होती है। पति दूर हो तो पत्नी के चित्त में वह बना ही रहता है और पत्नी दूर हो तो पति को पूरा दिन याद आती रहती है, इसको लगन कहा जाता है ।

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सही समझ विस्तार से प्राप्त करने के लिए पढ़ें: जिएँ सुखी वैवाहिक जीवन।

ऊपरी और अन्डरहैन्ड के बीच क्लेश रहित जीवन

नौकरी या धंधे में हम काम करते हों, तब यदि ऊपरी या अन्डरहैन्ड के साथ व्यवहार क्लेश रहित रहे, तो आसपास के लोगों को काम करने में आनंद आता है। जिसमें ऊपरी के तौर पर हमारा व्यवहार बिना किसी रौब के होना चाहिए और अपने नीचे काम करने वालों को हमें हर तरह से सँभालना चाहिए। जबकि अन्डरहैन्ड के तौर पर हमारा व्यवहार विनय पूर्वक होना चाहिए, जिसमें पूरी निष्ठा और सावधानी से काम पूरा करें, तो व्यवहार शोभा देता है।

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अधिकतर नौकरी धंधे में ऊपरी उनके आश्रितों को कुचलते रहते हैं और साहब के साथ अच्छी-अच्छी बातें करते रहते हैं। काम करने वालों को ऐसी शिकायत रहती है कि उनके ऊपरी बहुत काम करवाते हैं, पैसे भी नहीं देते और ऊपर से रौब भी झाड़ते हैं। पूरी दुनिया अन्डरहैन्ड (हमारे नीचे काम करने वाले) को झिड़काए ऐसी है। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि हमारे नीचे जो भी आए हों, उनका रक्षण करना चाहिए। फिर चाहे वह घर में काम करने वाला नौकर हो या ऑफिस का स्टाफ। मान लीजिए कि, नौकर चाय की ट्रे लेकर जा रहा हो और गिर जाए, तो सेठ उसे डाँटने लगते हैं कि, “तुम्हारे हाथ टूटे हैं? दिखता नहीं है?” अब उस नौकर की इच्छा नहीं थी कप-रकाबी तोड़ने की। लेकिन उस छोटे से नुकसान के कारण हम नौकर को सबके सामने डाँटकर उसका अपमान करें और नौकरी से भी निकाल दें, तो नौकर का अहंकार दुभता है। उसे दुःख होता है कि, “मैं गरीब हूँ इसीलिए सेठ ऐसे डाँट रहे हैं।“ वह भी मन में गाँठ बाँध लेता है और बैर बाँधता है, जो इसी जन्म में या अगले जन्म में वसूल होकर रहता है। गुस्सा करने के बजाय यदि सेठ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करें और पहले प्रेम से पूछें कि, "भाई, तुम जल तो नहीं गए न?" और फिर समझाएँ कि, "जल्दीबाज़ी में मत चला करो!" तो नौकर को ठेस नहीं लगेगी और बैर बंधने से रुक सकता है।

हमें यह समझना चाहिए कि नौकर के आधार पर ही खुद सेठ है, अन्डरहैन्ड के आधार पर ही खुद बॉस है। यदि सभी काम करने वाले चले जाएँ, तो फिर कौन बॉस और कौन अन्डरहैन्ड? उन्हीं के आधार पर तो काम चलता है। इसलिए, अपने अधीन काम करने वालों को नौकर की तरह नहीं, बल्कि घर के लोगों की तरह सँभालना चाहिए। हमारा व्यवहार देखकर ही नौकर भी सेठ का घर के बड़े-बुज़ुर्ग की तरह विनय रखेंगे। लेकिन यदि हम काम करने वाले की छोटी-सी गलती पर, “तुम्हें नौकरी से निकाल दूँगा!” ऐसे दादागिरी करें, तो फिर वे लोग भी हमारे प्रति विनय नहीं रखेंगे।

जब हम बॉस या टीम लीडर की तरह हों, तब हमारे नीचे काम करने वाले लोग सचमुच कड़ी मेहनत करके प्रोजेक्ट या कार्य पूरा करते हैं। उस समय यदि काम अच्छा हो, तो उसका श्रेय पूरी टीम में बाँट देना चाहिए और काम बिगड़ जाए, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले लेनी चाहिए, अंडरहैंड के सिर पर नहीं डालनी चाहिए। लेकिन ज़्यादातर ऊपरी अच्छे काम का क्रेडिट खुद ले लेते हैं और काम बिगड़ने पर लोगों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। तो इससे काम करने वालों का उत्साह टूट जाता है।

यदि हम किसी डिपार्टमेन्ट में या टीम में काम कर रहे हों, तो प्रत्येक टीम मेम्बर को बराबरी का मौका देना चाहिए। हम अपना मत ज़रूर रखें, लेकिन उसे सामने वाले पर थोपें नहीं। इसके बजाय सबको बोलने का मौका दें और उनकी भी राय जानें। कई बार हमारे विचारों की रफ्तार सामने वाले के सोचने की रफ्तार से अधिक होती है। हम किसी परिस्थिति में फटाफट ग्रैस्पिंग करके निर्णय ले सकते हैं, जबकि सामने वाले की ग्रैस्पिंग धीमी होती है तब हमारा धैर्य जवाब दे जाता है और हम झुंझला जाते हैं। उस वक्त ज़्यादा समझदार व्यक्ति को कम समझदार व्यक्ति के स्तर पर आकर बात करनी चाहिए। थोड़ी-थोड़ी देर में, “आपको समझ में आया?” ऐसा सुनिश्चित करके अपनी बात करनी चाहिए। जैसे हम छोटे बच्चे के साथ उसके लेवल पर उतरकर बात करते हैं, उसी तरह धैर्य से काम लेना चाहिए। जैसे एक तेज़ रिवॉल्यूशन वाली मशीन को धीमी रिवॉल्यूशन वाली मशीन के साथ पट्टे से जोड़ दें, तो दोनों की रफ्तार मैच न होने पर पट्टा टूट जाता है, वैसे ही व्यक्तियों के बीच के संबंध भी टूट जाते हैं। इसलिए, सामने वाले व्यक्ति के स्वभाव का बारीकी से निरीक्षण करके एडजस्टमेन्ट लेना चाहिए।

यदि हमारे पास सत्ता हो, तो उसका दुरुपयोग लोगों को कुचलने के लिए नहीं करना चाहिए। जिसके पास सत्ता होती है, वह अक्सर ऐसा खेल खेलता है कि उसके सामने सिर उठाने वाला फिर कभी सिर न उठा सके। परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, जो सत्ता का दुरुपयोग करता है, वह सत्ता चली जाती है और ऊपर से मनुष्य जन्म नहीं आता। एक घंटा ही यदि अपनी सत्ता में आए हुए व्यक्ति को डाँटा-फटकारा जाए तो सारी ज़िंदगी का आयुष्य बंध जाता है।” जैसे खेत में एक दाना बोने पर हज़ारों दाने उग आते हैं, वैसे ही यदि हम सत्ता का उपयोग करके किसी व्यक्ति को एक बार दुःख देते हैं, तो वह दुःख कई गुना होकर हमें ही भुगतना पड़ता है।

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