
क्रोध यानी समझ का अभाव। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, परिस्थिति का सामना कैसे करें यह समझ नहीं पड़े तब मनुष्य क्रोध कर देता है। लोग नहीं कहते कि, "मुझे कुछ सूझा नहीं इसलिए गुस्सा हो गया!" किस तरह से सामनेवाले व्यक्ति के साथ व्यवहार करें इसकी समझ कम पड़ जाए और काम खत्म करने जाएँ तब क्रोध हो जाता है।
क्रोध होने का सामान्य कारण है, दिखना बंद हो जाना। हम अंधेरे में जा रहें हों और रास्ते में दीवार आए, तो वह दिखाई नहीं देती और हम टकरा जाते हैं। उसी तरह, अंदर सूझ ना पड़े, किसी भी परिस्थिति में आगे का रास्ता ना दिखाई दे, दूसरे शब्दों में दिखना बंद हो जाए तब क्रोध आ जाता है।
कई बार हमारे विचार फास्ट होते हैं और सामनेवाले के विचार धीमे होते हैं। इसलिए हमारी बात सामनेवाले को नहीं पहुँचती या वह समझ नहीं पाते, तब हम चिढ़ जाते हैं। हमारे विचारों का रिवोल्यूशन 5000 हो और सामने वाले का 500 हो, तब हमें सामनेवाले के लेवल पर जाकर समझाना नहीं आता और धैर्य कम पड़ जाता है। परिणाम स्वरूप हम क्रोध कर देते हैं।
बारीकी से जाँच करें तो खासतौर पर जब हमारी मनमानी नहीं होती, तब क्रोध आता है। जैसे कि, घर में बच्चे हमारा कहा नहीं मानते तब क्रोध आ जाता है। पति या पत्नी हमारी अपेक्षा के अनुसार ना करें तब क्रोध आता है। छोटे होते हैं तब मम्मी-पापा हमारी ज़िद पूरी ना करें तब क्रोध आता है। नौकरी-धंधा में भी हमारे अधीन काम करने वाले लोग हमारे कहे अनुसार ना करें तब क्रोध आ जाता है। हमारी मनमानी नहीं हो, सामनेवाले को दबाकर काम लेने जाएँ तब क्रोध से सामनेवाले के साथ झगड़ा कर लेते हैं।
कुछ लोगों का व्यवहार हमारे साथ बुरा होता है तो भी हमें उनके ऊपर क्रोध नहीं आता। जबकि कुछ लोगों का व्यवहार हमारे साथ अच्छा होता है तो भी हम उनके ऊपर क्रोध कर देते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण यह होता है कि पहले इन व्यक्तियों के साथ हुए अनुभवों के कारण हमें उनके लिए कुछ प्रकार के अभिप्राय या प्रेजुडिस (पूर्वधारणा) बँध गए होते हैं।
मान लीजिए कि घर में दो बच्चों में से एक बच्चा बहुत ही शरारती हो, तो उसके प्रति माँ-बाप को "यह हमेशा शरारत करता है।" ऐसा अभिप्राय पड़ जाता है। और दूसरा बच्चा समझदार हो, तो उसके प्रति "यह बेटा बहुत समझदार है" ऐसा अभिप्राय बैठ जाता है। फिर समझदार बच्चा बड़ी शरारत करके आ जाए तो भी माँ-बाप उसके ऊपर इतना ज्यादा गुस्सा नहीं होते। जबकि शरारती बच्चा ज़रा सी ऐसे ही शरारत करे तो उसके ऊपर माँ-बाप गुस्सा कर देते हैं।
क्रोध वह मान कषाय का रक्षक है। हम मानते हों कि "मैं अक्कल वाला हूँ, मुझे समझ में आता है" और तब कोई व्यक्ति हमारा अपमान करे, सबके बीच में खंडन कर दे, काम में गलतियाँ निकाले, हमें जितना चाहिए उतना मान ना दे, तब मान को ठेस लगती है। ऐसे समय में सामनेवाले व्यक्ति के ऊपर क्रोध आता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “क्रोध तो, खुद के मान में रुकावट आए तब क्रोध करता है। खुद के मान को ठेस लगे, तब क्रोध से मान का रक्षण करता है। मान का रक्षक है क्रोध।”
जब हमारी दृष्टि से हमें सामनेवाले व्यक्ति के दोष दिखते हैं, तब क्रोध आ जाता है। हर कोई अपनी अपनी मान्यता के अनुसार अपने व्यू प्वाइंट से सामने वाले को देखता है और उसी के आधार पर सामनेवाले को सही या गलत कहता है। जब सामनेवाला हमारी मान्यता के विरुद्ध करता है तो हमें क्रोध आ जाता है। जब सामनेवाले के व्यू प्वाइंट से देखें तो क्रोध शांत हो जाता है।
कई बार हम सही होते हैं, उसी जगह पर "तुम गलत हो" ऐसा आक्षेप आता है, तब क्रोध आ जाता है। जैसे कि, किसी मामले में चोरी नहीं की हो तो भी "तुमने चोरी की है" ऐसा आक्षेप आए, गलती किसी दूसरे की हो और हमें "यह गलती तुमने की है" ऐसा कहे तो हम गुस्सा हो जाते हैं। क्योंकि, देखने पर हमें वहाँ अन्याय हो रहा है लगता है।
हम रास्ते में जा रहे हों और पहाड़ के ऊपर से कोई पत्थर लुढ़कता लुढ़कता हमारे सिर के ऊपर लगे और खून निकलने लगे तब हमें क्रोध आता है? नहीं, क्योंकि वहाँ किसका दोष है वह दिखाई नहीं देता। लेकिन जब कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हों और बॉल सिर पर लगे तब हमें क्रोध आ जाता है। क्योंकि वहाँ बच्चे ने बॉल मारी है ऐसा दिखता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “यह तो उसके मन में ऐसा लगता है कि 'यही करता है।' कोई मनुष्य जान-बूझकर मार ही नहीं सकता। इसलिए पहाड़ पर से लुढ़कना और मनुष्य पत्थर मारे, वे दोनों समान ही है। लेकिन भ्राँति से ऐसा दिखता है की 'वह करता है।' इस वर्ल्ड में किसी मनुष्य को संडास जाने की शक्ति (स्वतंत्र) नहीं है।”
बहुत से लोग कहते हैं कि "मुझे क्रोध आ जाता है। मेरा स्वभाव क्रोधी है।" लेकिन स्वभाव से क्रोध आता होता तो वह सभी पर एक समान आता। हमें घर में बच्चों के ऊपर, पत्नी के ऊपर, पड़ोसी के ऊपर या हमारे अधीन काम करने वाले लोगों के ऊपर तुरंत क्रोध आ जाता है। लेकिन ऑफिस में बॉस के ऊपर हम क्रोध नहीं करते। सड़क में पुलिस हमें लाइसेंस के लिए पकड़े तो उनके ऊपर क्रोध नहीं आता। यानी सुपीरियर के सामने हम चुप हो जाते हैं। अतः क्रोध स्वभाव से नहीं आता।
घर में जमाई के हाथ से चाय का कप टूट जाए तो, "कोई बात नहीं। जले नहीं ना?" ऐसा कहते हैं। जबकि नौकर के हाथ से कप फूट जाए तो उसे गुस्से में डाँट देते हैं। इसलिए जिन्हें अपने से इन्फीरियर माना है उनके ऊपर जल्दी क्रोध आ जाता है।
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