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क्रोध करे वह निर्बल या बलवान?

जीवन व्यवहार में ऐसा कहा जाता है कि कुछ जगहों पर तो क्रोध करने की ज़रूरत पड़ती है। क्रोध ना करें तो वह निर्बलता नहीं कही जाएगी? परंतु परम पूज्य दादा भगवान लौकिक मान्यताओं से अलग ही समझ यहाँ देते हैं कि, “नहीं, कोई ऐसा कारण नहीं है कि जहाँ पर क्रोध करने की ज़रूरत हो।” वे कहते हैं कि क्रोध तो निर्बलता है। क्रोध-मान-माया-लोभ ये निर्बलताएँ जिनमें नहीं होंती, वह बलवान कहलाएँगे।

मन भी नहीं बिगड़े, वह बलवान!

प्रश्नकर्ता: तो फिर कोई मेरा अपमान करे और मैं शांति से बैठा रहूँ तो वह निर्बलता नहीं कहलाएगी?

दादाश्री: नहीं। ओहोहो! अपमान सहन करना, वह तो बहुत बड़ा बल कहलाता है! अभी हमें कोई गालियाँ दें तो हमें कुछ भी नहीं होगा, उसके लिए मन भी नहीं बिगड़ेगा, वही है बल! और निर्बलता तो ये सब किच-किच करते ही रहते हैं न, जीवमात्र लड़ते ही रहते हैं। वह सारी निर्बलता कहलाती हैं। अर्थात् शांति से अपमान सहन करना बहुत बड़ा बल कहलाता है और ऐसा अपमान एक ही बार पार कर जाएँ, एक स्टेप पार कर जाएँ न तो सौ स्टेप पार करने की शक्ति आ जाएगी। आपको समझ में आया न? सामने वाला यदि बलवान हो, तो जीवमात्र उसके सामने निर्बल हो ही जाता है। वह तो उसका स्वाभाविक गुण है लेकिन यदि कोई निर्बल व्यक्ति आपको छेड़े और तब भी आप उसे कुछ भी नहीं करो, तब वह बहुत बड़ा बल कहलाएगा।

वास्तव में तो निर्बल का रक्षण करना चाहिए और बलवान का सामना करना चाहिए जबकि इस कलियुग में ऐसे लोग रहे ही नहीं न! अभी तो निर्बल को ही मारते रहते हैं और बलवान से तो भागते हैं। बहुत कम लोग हैं कि जो निर्बल की रक्षा करते हैं और बलवान का सामना करते हैं। यदि ऐसे लोग हों, तो उसे तो क्षत्रिय गुण कहा जाएगा। वर्ना पूरा जगत् कमज़ोरों को ही मारता रहता है। घर जाकर पति अपनी पत्नी पर शूरवीरता दिखाता है। खूंटे से बंधी हुई गाय को मारें तो वह किस ओर जाएगी? और खुली छोड़कर मारे तो? भाग जाएगी न, या फिर सामना करेगी।

क्रोध जाए तब

क्रोध वह कमज़ोरी है। यह कमज़ोरी जिनमें नहीं होती उनकी पर्सनालिटी पड़ती है।

जो लोग सामनेवाले को सुधारने या उन्हें बदलने के लिए क्रोध का हथियार नहीं उठाते उनकी पर्सनालिटी पड़ती है। फिर वह व्यक्ति साधारण सूचना दें, तो भी सभी उनकी बात मान लेते हैं और उनके कहे अनुसार करते हैं।

लेकिन हम किसी को डाँटकर सुधारने जाएँगे तो वह हमारी बात मानेगा ही नहीं। उसका कारण बताते हुए परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “नहीं मानने का क्या कारण है? आपका प्रभाव नहीं पड़ता। अर्थात् कमज़ोरी नहीं होनी चाहिए, चारित्रवान होना चाहिए। ‘मेन ऑफ पर्सनालिटी’ होनी चाहिए! लाखों गुंडे उसे देखते ही भाग जाएँ! चिड़-चिड़े आदमी से कोई नहीं भागता, बल्कि मारेंगे भी! संसार तो कमज़ोर को ही मारता है न!“

शील का प्रताप

सच्चा बलवान हो तो उसके पास शील का हथियार होता है। जो व्यक्ति क्रोध करते हैं, उनसे लोग इतना नहीं डरते जितना कि क्रोध ना करने वालों से डरते हैं। इसका कारण क्या है? कुदरत का नियम है कि जब क्रोध बंद हो जाता है तब प्रताप उत्पन्न होता है। प्रताप यानी ठंडा ताप, चारित्र का ताप।

जहाँ बर्फ पड़ी हो, वहाँ अत्यधिक ठंड पड़ती है। उस बर्फ की ठंडक से झाड़ियाँ जल जाती हैं, कपास-घास सभी जल जाता है। क्योंकि हिमालय में लिमिट से भी ज़्यादा ठंड पड़ती है। जैसे आग की गर्मी में पौधे जल जाते हैं, वैसे ही बर्फ की ज़्यादा ठंड में भी पौधे जल जाते हैं। इसी तरह यदि हम क्रोध किए बिना शांत होकर रहें, तो ऐसा शील उत्पन्न होगा, जिसके प्रभाव से कहे बिना ही सामनेवाला सुधर जाता है।

परम पूज्य दादा भगवान समझाते हैं कि क्रोध की निर्बलता के सामने सच्चा बलवानपन उत्पन्न हो जाए तो उसके प्रताप से ही सब वश हो जाते हैं।

दादाश्री: खुद की शक्ति होने के बावजूद भी इंसान सामने वाले को तंग नहीं करे, अपने दुश्मन को भी दु:खी न करे, वह बहुत बड़ा बलवान कहलाता है। अभी कोई आप पर गुस्सा करे और आप भी उस पर गुस्सा हो जाओ तो क्या वह कमज़ोरी नहीं कहलाएगी? यानी मेरा क्या कहना है कि ये क्रोध-मान-माया और लोभ, ये सभी निर्बलताएँ हैं। जो बलवान है, उसे तो क्रोध करने की ज़रूरत ही कहाँ रही? लेकिन ये तो क्रोध का जितना ताप है, उस ताप से सामने वाले को बस में करने जाते हैं जबकि जिसे क्रोध नहीं है उसके पास कुछ होगा तो सही न? उसका शील नामक जो चारित्र है उससे जानवर भी वश में हो जाते हैं। बाघ, सिंह, दुश्मन वगैरह, पूरी सेना सभी वश हो जाते हैं!

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