जीवन में सुख और शांति पाने का सबसे सरल उपाय है, दूसरों के सुख के बारे में सोचना। परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, "ये मन-वचन-काया दूसरों के सुख के लिए खर्च करें तो खुद को संसार में कभी भी सुख की कमी नहीं पड़ती।"
अंततः यदि मनुष्य आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लेता है तो उसे जीवन में हमेशा के लिए शाश्वत सुख की प्राप्ति हो जाती है। लेकिन जब तक आत्म-साक्षात्कार सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलने से जीवन में सुख और शांति स्थापित होती है।
नियम ऐसा है कि हम हमारा दूसरों के लिए उपयोग करें तो हमें आनंद होता है। बहुत बड़े काम नहीं, बल्कि साधारण क्रियाएँ जैसे, अपनी पसंद की चीज़ दूसरों को दे देना, पशु-पक्षियों को खाना दे दें, गरीब या भूखे लोगों को भोजन कराना, बुज़ुर्गों की छोटी-मोटी सहायता करना, ज़रूरतमंद को अनाज या औषधि आदि उपलब्ध कराने से हमारे भीतर ही सुख उभरता है। क्योंकि हर जीव के भीतर भगवान रहते हैं। जब हम किसी के दिल को ठंडक पहुँचाते हैं, तब उनके भीतर के भगवान हमें आशीर्वाद देते हैं। यदि हमने एक दान दिया हो तो बदले में हजार दान का फल मिलता है, इसी प्रकार परोपकार का भी हमें कई गुना फल मिलता है।
दूसरों को सुख देने से हमें सुख का अनुभव होता है। इसका कारण अध्यात्म विज्ञान में मिलता है। हर एक के भीतर आत्मा की उपस्थिति है और आत्मा खुद ही सुख का धाम है, अनंत सुख का स्रोत है। जब हम किसी जीव को सुख देते हैं, तब हम स्वयं अपने ही आत्मा के सुख का अनुभव करते हैं।
जीवन में सुख और आनंद की प्राप्ति का सरल उपाय यहाँ परम पूज्य दादा भगवान से मिलता है।
प्रश्नकर्ता : मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए मनुष्य किसी गरीब, किसी अशक्त की सेवा करे या भगवान की भजना करे या फिर किसी को दान दे? क्या करना चाहिए?
दादाश्री : मानसिक शांति चाहिए तो अपनी चीज़ दूसरे को खिला देनी चाहिए। कल आइस्क्रीम का पीपा भरकर लाना और इन सब को खिलाना। उस घड़ी तुझे कितना सारा आनंद होता है, वह तू मुझे कहना। उन लोगों को आइस्क्रीम खानी नहीं है। तू तेरे शांति का प्रयोग करके देख। ये कोई सर्दी में फालतू नहीं है, आइस्क्रीम खाने को। इस प्रकार तू जहाँ हो वहाँ कोई जानवर हो, ये बंदर होते हैं उन्हें चने डालें तो वे उछलकूद करते हैं, वहाँ तेरे आनंद की सीमा नहीं रहेगी। वे खाते जाएँगे और तेरे आनंद की सीमा नहीं रहेगी। इन कबूतरों को तू दाना डाले उससे पहले कबूतर ऐसे उछलकूद करने लगते हैं। और तूने डाला, तेरी खुद की चीज़ दूसरों को दी कि भीतर आनंद शुरू हो जाएगा। अभी कोई मनुष्य रास्ते में गिर गया और उसका पैर टूट गया और खून निकलता हो, वहाँ तू अपनी धोती फाड़कर ऐसे बाँधे, उस समय तुझे आनंद होगा। भले ही सौ रुपए की धोती हो, उसे फाड़कर तू बांधे, लेकिन उस घड़ी तुझे आनंद खूब होगा।
लेकिन इस कलियुग में खुद का खुद के लिए ही उपयोग करने की संकीर्णता और आगे बढ़कर दूसरों का मुफ्त में हड़प लेने की प्रवृत्तियाँ फैल चुकी हैं। जब दूसरों का मुफ्त में हड़पते हैं तब उस समय तोभीतर अच्छा लगता है कि 'मुझे कुछ मिला'। लेकिन दुनिया में 'मुफ्त' नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं। बिना हक़ का कुछ भी हड़प लें वह कुदरत में जमा हो ता है, फिर ब्याज सहित लौटाना पड़ता है। भले ही कुछ समय के लिए सुख मिला ऐसा लगता है, लेकिन अंत में खुद को ही भारी दुःख सहना पड़ता है।
जब पूरी दुनिया इकट्ठा करने में सुख मानती है, तब यह समझ दुनिया को मिलनी चाहिए कि अपनी प्रिय वस्तु दूसरों के लिए उपयोग करना यही सुखी होने का सही मार्ग है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि, “धर्म की शुरुआत ही ओब्लाइजिंग नेचर (परोपकारी स्वभाव) से होती है। दूसरों को कुछ भी देतें हैं, तब से ही खुद को आनंद शुरू होता है।”
वे कहते हैं कि, “संसार का स्वरूप कैसा है? जगत् के जीव मात्र में भगवान रहे हुए हैं, इसलिए किसी भी जीव को कुछ भी त्रास दोगे, दुःख दोगे तो अधर्म खड़ा होगा। किसी भी जीव को सुख दोगे तो धर्म खड़ा होगा। अधर्म का फल आपकी इच्छा के विरुद्ध है और धर्म का फल आपकी इच्छानुसार है।”
मनुष्य जब से किसी को सुख देता है, तब से सच्चे धर्म की शुरुआत होती है और जिसे खुद के सुख की परवाह ही न हो, बल्कि किस तरह सामने वाले की अड़चन दूर हो यही भावना रहती है, वहाँ से कारुण्यता की शुरुआत होती है।
परम पूज्य दादाश्री ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में यही ध्येय रखा था कि, जो कोई भी मुझसे मिले उसे सुख प्राप्त होना ही चाहिए। उन्होंने जीवन भर अपने सुख के लिए विचार तक नहीं किया। उनके जीवन के अनेक प्रसंगों में यह भावना छलकती है।
परम पूज्य दादा भगवान का बचपन से ही ओब्लाइजिंग नेचर था। जब छोटे थे तब वे छोटे से भादरण गाँव में रहते थे। उनके बड़े भाई वडोदरा में रहते थे, इसलिए परम पूज्य दादाश्री को व्यापार के काम के लिए वडोदरा आना-जाना पड़ता था। उस समय गाँव से शहर जाना इतना आसान नहीं था। कुछ चीजें गाँव में उपलब्ध नहीं होती थी और लोगों ने वडोदरा शहर देखा भी नहीं था। इसलिए परम पूज्य दादाश्री जब भी वडोदरा जाते, तब पूरे गाँव में सभी से पूछ लेते थे कि, "मैं वडोदरा जा रहा हूँ, आपको कोई काम है? कुछ चाहिए?" तब कोई कहता कि, "मेरे लिए धोती लाना।" अब, अगर परम पूज्य दादाश्री धोती लेने गए हों, तो मान लीजिए उस समय पच्चीस रुपये की धोती आती हो तो वे पच्चीस रुपये में ही खरीदते थे। फिर जिसने मंगाई हो उसे तेईस रुपये में देते। दो रुपये अपनी जेब से डालते। क्योंकि, उन्हें मोल-भाव करना पसंद नहीं था। फिर अगर कोई गाँव में ऐसा कहे कि वडोदरा में तो तेईस रुपये की धोती मिलती है, तो सामने वाले को दुःख होगा कि उन्होंने दो रुपये का कमीशन लिया। इसके बदले दो रुपये कम लें तो सामने वाला सस्ता मिला ऐसा सोचकर खुश हो जाएगा। परम पूज्य दादाश्री में इतनी उदारता थी कि वे अपने पैसे खर्च करके भी सामने वाले को खुशी देते थे।
युवावस्था में ही उन्होंने अपने मित्रों से कह रखा था कि ये हाथ सबको देने के लिए बने हैं, लेने के लिए नहीं। इसलिए अगर किसी को भी आधी रात में ज़रूरत पड़े तो मुझसे कहना, मैं तुम्हारी हर तरह से मदद करूँगा, लेकिन अगर मैं तुम्हारे घर आधी रात को आऊँ तो तुम ज़रा भी यह डर मन में नहीं रखना कि यह कुछ माँगने आया होगा!
व्यवसाय में भी, परम पूज्य दादाश्री को कभी भी यह विचार नहीं आता कि कैसे ज़्यादा पैसे कमाए जाएँ। ऊपर से किस तरह दूसरों की मदद करूं, किसी को व्यवसाय में किस तरह से ज़्यादा पैसे कमाने का तरीका बताऊँ, किसी को नौकरी नहीं मिल रही हो तो किस तरह उसे नौकरी दिलवा दूं, पहचान से कुछ काम करवा दूं, इसी में वे पूरा दिन वर्तते थे।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि उनका यह परोपकारी स्वभाव बचपन से ही था।वह आत्मज्ञान प्रकट करने में बहुत बड़ा निमित्त बना। वही दूसरों को मदद करने की भावना, वही ओब्लाइजिंग नेचर फिर पूरे जगत कल्याण की भावना में रूपांतरित हो गया।
नियम है कि दूसरों को सुख देंगे तो सुख मिलेगा और दूसरों को दुःख देंगे तो दुःख मिलेगा। यदि हम अपने आस-पास के लोगों को दुःख देते हैं तो बदले में सुख की आशा नहीं रख सकते।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "इस दुनिया का कानून एक ही वाक्य में समझ जाओ, इस संसार के सारे धर्मों का, कि जिस व्यक्ति को सुख चाहिए, वह दूसरे जीवों को सुख दे और दुःख चाहिए तो दुःख दे। जो अनुकूल आए वह दे। अब अगर कोई पूछे कि 'हम लोगों को सुख कैसे दें? हमारे पास पैसे नहीं हैं।' तो ऐसा नहीं है कि पैसों से ही दे सकते हैं। उसके प्रति ओब्लाइजिंग नेचर रख सकते हैं, उसके लिए चक्कर लगा सकते और उसे सलाह दे सकते हैं, कई तरह से ओब्लाइज कर सकते हैं, ऐसा है।”
दादाश्री कहते हैं कि मनुष्य को ओब्लाइजिंग नेचर (परोपकारी स्वभाव) रखना चाहिए। दूसरों को सुख देने से पुण्य बंधता है। इतना ही नहीं, यदि कोई हमारा नुकसान कर गया हो, तो यह समझ रखें कि पूर्व का कोई हिसाब होगा जो पूरा हो गया, लेकिन आज मुझे उसे दुःख नहीं देना है तो इससे भी पुण्य बंधता है। दूसरी ओर, जब किसी भी जीव को दुःख दें, या दुःख देने का भाव भी होता है, तो उससे अशुभ कर्म बंधते हैं। हमें जीवन में पुण्य के आधार पर सुख और पाप के आधार पर दुःख मिलता है।
इसलिए, यदि हम दूसरों को सुख नहीं दे सकते या दूसरों की सेवा नहीं कर सकते, तो कोई बात नहीं, लेकिन किसी को दुःख तो नहीं देना चाहिए। भाव में सौ प्रतिशत हो कि किसी को दुःख नहीं देना, फिर भी दुःख पहुँच जाए, तो किस तरह उसे कम कर सकते हैं उसके प्रयत्न करते रहने चाहिए। अपनी जो भी शक्ति हो उसका उपयोग दूसरों का दुःख कम करने में करें। ऐसा करने से हमारे दुःख उत्पन्न होने का कारण नहीं रहेगा। सामनेवाली व्यक्ति की मुश्किलों में उसे मदद करने का भाव हो और कैसे उसे सुख मिले ऐसी सच्चे दिल की भावना हो, तो कुदरती रूप से हमारे निमित्त से, सामने वाले को सुख मिलें ऐसे संयोग उत्पन्न हो जाएँगे।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि जीवन में सीखने लायक कुछ नहीं है, बस दूसरों को सुख देना सीखना है। वे कहते हैं कि हमें सुख की दुकान खोलनी चाहिए। कोई हमें कितना भी दुःख दे, उसे जमा कर लेना चाहिए, लेकिन हमें हर किसी को सुख, सुख और सुख ही देना चाहिए।
सिद्धांत यह है कि यदि हम किसी के दिल को ठंडक पहुँचाएँगे तो कुदरत हमारे दिल को ठंडक पहुँचाएगी, लेकिन सामने वाले को दुःख देंगे, तो उसका मन आहत होगा, उसका अहंकार टूट जाएगा और उसके बदले में वह वैर बांधेगा।
आम तौर पर, लोगों की सच्चे दिल से मदद करने में हमें धोखा खाने का डर रहता है। परम पूज्य दादा भगवान इसका सुंदर समाधान यहाँ देते हैं।
प्रश्नकर्ता: दिल को ठंडक पहुँचाने जाएँ तो आज जेब कट जाती है।
दादाश्री: जेब भले ही कट जाए, वह पिछला हिसाब होगा, जो चुक रहा है। पर आप अभी ठंडक देंगे तो उसका फल तो आएगा ही, उसकी सौ प्रतिशत गारन्टी लेख भी कर दूँ। यह हमने दिया होगा, इसलिए हमें आज सुख आता है। मेरा धंधा ही यह है कि सुख की दुकान खोलनी। हमें दुःख की दुकान नहीं खोलनी है। सुख की दुकान, फिर जिसे चाहिए वह सुख ले जाए और कोई दुःख देने आए तो हम कहें, 'ओहोहो, अभी बाकी है मेरा। लाओ, लाओ।' उसे हम एक और रख छोड़ें। अर्थात् दुःख देने आएँ तो ले लें। हमारा हिसाब है, तो देने तो आएँगे न? नहीं तो मुझे तो कोई दुःख देने आता नहीं है।
इसलिए सुख की दुकान ऐसी खोलो कि बस सभी को सुख देना है। दुःख किसी को देना नहीं और दुःख देनेवाले को तो किसी दिन कोई चाकू मार देता है न? वह राह देखकर बैठा होता है। यह जो बैर की वसूली करते हैं न, वे यों ही बैर वसूल नहीं करते। दुःख का बदला लेते हैं।
परम पूज्य दादा भगवान बचपन से ही ओब्लाइजिंग नेचर के थे और पच्चीस वर्ष की उम्र में उनके मित्र उन्हें सुपरह्युमन कहते थे। यदि उनकी कोई चीज़ दूसरों को पसंद आ जाती तो वे उसे प्रेमपूर्वक तुरंत दे देते थे।
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि जो व्यक्ति समान भाव से व्यवहार करता है, जैसा मिले, वैसा देता है, उसे ह्यूमन (मनुष्य) कहते हैं। अर्थात् सुख दिया हो उसे सुख देना और दुःख दिया हो उसे दुःख देना, यह मानवता कहलाती है। दूसरों का सुख छीन लेना, वह पशवता कहलाती है। दूसरों का सुख छीन लेना, दूसरों को धोखा देना, विश्वासघात करना, ये सब वाइल्डनेस (जंगलीपन) कहलाता है। लेकिन जो अपना सुख दूसरों को भोगने के लिए दे देता है, दुःखियों का दुःख दूर करता है, उसे सुपरह्युमन (अतिमानव) कहते हैं और वह देवगति में जाता है। सामनेवाला चाहे कितनी ही बार अड़चन डाले, धोखा दे, दुःख दे फिर भी उसका नुकसान न हो इस तरह से उसे मददरूप साबित होता है, यही सुपरह्यूमन स्वभाव है। वास्तव में, दूसरों का छीन लेने में हम अपनी मानवता ही खो देते हैं और दूसरों को देने में हम खुद को सुपरह्युमन बनने में मदद करते हैं।
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