परोपकार का मतलब है खुद नुकसान उठाकर भी दूसरों को देना। परोपकार की भावना वर्षों तक लगातार बनी रहे, सामने सेकोई भी कठिनाई आने पर भी यदि भावना में बदलाव न हो, तो उसका बहुत उच्च परिणाम प्राप्त होते हैं।
अध्यात्म विज्ञान क्या कहता है कि, अपने मन, वचन और काया (शरीर) का उपयोग परोपकार के लिए करेंगे तो आपको सब कुछ प्राप्त होगा। जो व्यक्ति अपना जीवन किसी भी प्रकार के परोपकार के लिए समर्पित करता है, उसे जीवन में किसी भी बाधा का सामना नहीं करना पड़ता। बाधाओं का मतलब है किसी भी प्रकार के मानसिक या शारीरिक दुःख नहीं आएंगे, पैसों की तकलीफ नहीं पड़ेगी।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “आप अपने लिए कुछ भी मत करना। लोगों के लिए ही करना तो अपने लिए कुछ भी करना नहीं पड़ेगा।"
अपने परिवार की मदद करना सभी का दायित्व है, लेकिन दूसरों की मदद करने से बड़ा फल मिलता है। सेवा और परोपकार करने वाला व्यक्ति अनुकूल या प्रतिकूल संजोंग और परिस्थितियाँ आने पर भी वह अपना शुरु किया हुआ कार्य पूरा करता है। ऐसा करने से खुद की ही प्रकृति की कचास (कम्मियाँ) दूर हो जाती हैं।
यदि दूसरों के लिए उपयोग किया, तो अपने आत्मा के खाते में ही जमा होता है। बिना किसी बदले की अपेक्षा (उम्मीद) के दूसरों की आत्मा को शांति देने का कार्य किया जाए, उससे अपनी ही आत्मा को शांति मिलती है।
व्यक्ति जितना अधिक अपना जीवन दूसरों के लिए व्यतीत करता है, उतना ही पुण्य कमाता है और उधर्वगति की ओर बढ़ता जाता है। जब तक जीवन-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति नहीं मिलती, तब तक पुण्य ही एकमात्र मित्र की तरह कार्य करता है और पाप शत्रु की तरह कार्य करता है।
हम शत्रु चाहते हैं या मित्र, यह निर्णय हमें ही करना है। जिसे पाप रूपी शत्रु चाहिए होता है, वही, "अगला जन्म किसने देखा है? अभी तो मज़े कर लो।" इस तरह के रवैये से वह गलत कर्म करेगा। जैसे कि, किसी से पैसे लेकर उसे वापस न करना, या कुछ गलत काम करके भाग जाना, आदि।“ इससे ऐसा लगता है जैसे हमने तो अभी मज़े कर लिए! लेकिन इससे पाप कर्म बंधते हैं, जिनका फल हमें ही भोगना पड़ता है। दूसरी ओर, जिसे पुण्यरुपी मित्र चाहिए, उसे पेड़ से सीखना चाहिए। जिस प्रकार एक पेड़ न तो अपने फल खुद खाता है और न ही अपने फूलों का उपभोग करता है, उसी प्रकार मनुष्य को अपना सब कुछ दूसरों के लिए उपयोग करना चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "आम खाया, उसमें आम के पेड़ का क्या गया? और हमें क्या मिला? हमने आम खाया, इसलिए हमें आनंद हुआ। उससे हमारी वृत्तियाँ जो बदलीं, उससे हम सौ रुपये जितना अध्यात्म में कमाते हैं। अब आम खाया, इसलिए उसमें से पाँच प्रतिशत आम के पेड़ को आपके हिस्से में से जाता है और पँचानवे प्रतिशत आपके हिस्से में रहता है। वे लोग हमारे हिस्से में से पाँच प्रतिशत ले लेते हैं और वे बेचारे ऊँची गति में जाते हैं और हमारी अधोगति नहीं होती है, हम भी आगे बढ़ते हैं। इसलिए ये पेड़ कहते हैं कि हमारा सबकुछ भोगो, हर एक प्रकार के फल-फूल भोगो।"
जीवन में पुण्य कमाने का सबसे आसान रास्ता है परोपकार। बहुत ज्यादा नहीं, तो हमारे पास जो कुछ है, उसका पांच प्रतिशत, दूसरों को देने से शुरुआत करें। अपनी कमाई का पांच प्रतिशत सही जगहों पर दान धर्मार्थ कार्यों में दें, या गरीबों को भोजन कराएं, बच्चों को शिक्षित करें, या स्कूलों या अस्पतालों में दान दें। जिस प्रकार यदि खेत में एक बीज बोया जाए तो हजार बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार अच्छे कर्म करें तो बदले में अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।
हम दूसरों की सहायता के लिए अपने पास जो है उसका योगदान दें, तो जीवन अपनेआप ही अधिक सात्विक और सरल बन जाएगा।
परोपकार करने से अंततः स्वयं को ही लाभ होता है यदि ऐसी दृष्टि विकसित हो जाए, तो परोपकार करना आसान हो जाता है। ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "आप अपने फल दूसरों को दे दो। आपको अपने फल मिलते रहेंगे। आपके जो फल उत्पन्न हों-दैहिक फल, मानसिक फल, वाचिक फल, 'फ्री ऑफ कॉस्ट' लोगों को देते रहो तो आपको आपकी हर एक चीज़ मिल जाएगी। आपकी जीवन की ज़रूरतों में किंचित् मात्र अड़चन नहीं आएगी और जब आप खुद वे फल खा जाओगे तो अड़चन आएगी।"
इस मानव जीवन में हमें जो कुछ भी मिला है, वो अगर परोपकार में लगा दें तो हमें किसी प्रकार की हानि या कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। परोपकार के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं। जब दूसरों के बारे में सोचे बिना जीवन जीते हैं, तो चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, एक भी इच्छा पूरी नहीं होगी। भ्रष्टाचार के माध्यम से लोगों का धन लूटकर कोई चाहे कितनी भी भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त कर ले, वह उन्हें रात को सोने नहीं देगा, जबकि जिनके मन, वचन और शरीर दूसरों के लिए उपयोग होते हैं, वे चैन की नींद सोते हैं।
परोपकार करने वाले का अहंकार भी नार्मल रहता है। जब संकुचितता होती है, तब अहंकार बढ़ जाता है। बुद्धि इतनी बढ़ जाती है कि किस तरह दूसरों को धोखा देकर फ़ायदा उठाना है, वह आता है। वह अहंकार फिर दो पैरों से चार पैरों की ओर, अर्थात् अधोगति की ओर ले जाता है।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं कि हमेशा किसी के लिए उपकार किया हो, किसी का भला किया हो, किसी के लिए जीते हों, उतना ही हमें लाभ होता है। परोपकार का फल भौतिक लाभ मिलता है। जो व्यक्ति मानव सेवा या समाज सेवा में अपना समय और शक्ति लगाता है, उसे भी बदले में शांतिपूर्ण जीवन मिलता है। अच्छे भाव से किया गया कोई भी काम सुख और शांति देता है।
भगवान प्रत्येक जीव के भीतर निवास करता है। भगवान कहते हैं, "जो दूसरों का सँभालता है, उसका मैं सँभाल लेता हूँ और जो खुद का ही सँभालता है, उसका मैं उसी के ऊपर छोड़ देता हूँ।”
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “संसार का काम करो, आपका काम होता ही रहेगा। जगत् का काम करोगे तो आपका काम अपने आप होता रहेगा और तब आपको हैरानी होगी।" बचपन से ही वह हमेशा इस बात पर विचार करते रहते थे कि अपने सामने आने वाली बाधाओं को कैसे दूर किया जाए। परिणामस्वरूप उनमें अलौकिक करुणा प्रकट हुई तथा अद्भुत आध्यात्मिक विज्ञान प्रकट हुआ!
इस संसार में अशुभ से शुभ की ओर जाने के लिए प्रत्यक्ष गुरु का बहुत महत्व है। गुरु की सेवा में अपने सेवक भाव से मन, वचन और काया का उपयोग करने से हमारी अनेक कमजोरियाँ दूर हो जाती हैं। तथा हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगती होती है। यदि उनमें कोई आत्मज्ञानी गुरु हो तो उनकी सेवा करने से आत्मज्ञान प्राप्ति में आने वाली बाधाएं नष्ट हो जाती हैं तथा मोक्ष प्राप्ति संभव हो जाती है। यदि कोई आत्म-साक्षात्कारी गुरु हो तो उसकी सेवा करने से व्यक्ति प्रगति करता है। ऐसे सच्चे गुरु की सेवा करनी चाहिए, जो लक्ष्मी या विषय-विकारी इच्छाओं की मलिनता से मुक्त हो।
परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, “इस दुनिया में तीन का महान उपकार है। उस उपकार को छोड़ना ही नहीं है। फादर-मदर और गुरु का! हमें जो रास्ते पर ले आए हों उनका, इन तीनों का उपकार भुलाया जाए ऐसा नहीं है।"
ज्ञानी पुरुष परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, "कोई 'हमारी' सेवा करे तो हमारे सिर उसकी ज़िम्मेदारी आ जाती है और हमें उसे मोक्ष में ले ही जाना पड़ता है।"
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