
पैसों से ही ‘ऑब्लाइज़’ किया जा सके, ऐसा नहीं है। वह तो देने वाले की शक्ति पर आधारित है। सिर्फ मन में भाव रखने हैं कि, ‘कैसे मैं ऑब्लाइज़ करूँ’, इतना ही रहा करे, बस वही देखना है।
परम पूज्य दादा भगवानहिंसक भाव अर्थात् ज़रा सा भी, किंचित्मात्र भी हिंसा करना या किसी को नुकसान पहुँचाना, किसी पर गुस्सा होना, दु:ख देना, पीड़ा देना। पहले ऐसे भाव खत्म हो जाने चाहिए।
परम पूज्य दादा भगवान‘ज्ञान’ का स्वभाव ही ऐसा है कि (उस पर) किसी का असर ही नहीं होता, निर्लेप रहता है! ज्ञान, अज्ञान से भी निर्लेप रहता है। ज्ञान तो क्रिया में भी एकाकार नहीं होता, निर्लेप ही रहता है!
परम पूज्य दादा भगवानक्रियाओं में ज्ञान नहीं है और ज्ञान में क्रिया नहीं है। दोनों ही अलग स्वभाव वाले हैं!
परम पूज्य दादा भगवानजहाँ पर हिंसकभाव नहीं रहे वह संयमी कहलाता है। क्रोध-मान-माया-लोभ में भी हिंसक भाव न रहें, वह संयम कहलाता है। संयमी मोक्ष में जाता है।
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