
जगत क्रोधी के बजाय क्रोध नहीं करनेवाले से ज़्यादा घबराता है! क्यों? कुदरत का नियम ऐसा है कि क्रोध बंद होने पर प्रताप उत्पन्न होता है! वर्ना क्रोध नहीं करनेवाले का रक्षण करनेवाला ही नहीं मिलता न! अज्ञानता में क्रोध रक्षण करता है!
परम पूज्य दादा भगवानपैसों के पीछे ही पडे हैं कि कहाँ से पैसे लाएँ? कहाँ से पैसे लाएँ? अरे! स्मशान में क्यों पैसे खोज रहे हो? यह संसार तो स्मशान जैसा हो गया है। प्रेम जैसा कुछ दिखाई ही नहीं देता। जिस तरह से पैसे आनेवाले हैं, वह कुदरती रास्ता है। ‘साइन्टिफिक सरकमस्टेन्शियल एविडन्स’ है। उसके पीछे पडऩे की हमें क्या जरूरत? वही हमें मुक्त करे तो बहुत अच्छा है न बाप!
परम पूज्य दादा भगवानसर्जन करना, वह ‘आपकी’ सत्ता में है। विसर्जन करना, वह ‘कुदरत’ की सत्ता में हैं। अतः सर्जन करना हो तो सीधा करना। ‘आपके’ द्वारा जो सर्जन किया हुआ है, कुदरत उसे विसर्जन किए बगैर रहेगी ही नहीं!
परम पूज्य दादा भगवानपूरा जगत् जो भी कुछ कर रहा है, वह सारा कुदरती विसर्जन ही हैं। फिर भले ही जप करो या तप करो, सभी कुदरती विसर्जन हैं। जो फूल चढ़ाते हैं, उनका उपकार कैसा? और जेब काटे, उसका अपकार कैसा? सर्जन में खुद निमित्त होता है और विसर्जन तो कुदरत ही करती है। यह वीतरागों की अंतिम दृष्टि है!
परम पूज्य दादा भगवानsubscribe your email for our latest news and events
