आध्यात्मिक कोटेशन "dharma" पर

धर्मध्यान पालन करने का फल है, सम्यकï दर्शन।

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औरों के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वह धर्मध्यान है।

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धर्म की शुरुआत ही ‘ऑब्लाइज़िंग नेचर’ से होती है।

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जहाँ कोई भी क्लेश है वहाँ भगवान भी नहीं हैं और धर्म भी नहीं है।

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जहाँ धर्म है वहाँ चिंता नहीं है और जहाँ चिंता है वहाँ धर्म नहीं है।

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धर्म अर्थात् किसी भी जीव को किसी भी प्रकार से सुख देना। किसी भी जीव को किसी भी प्रकार से दु:ख देना, वह अधर्म है। बस, धर्म का इतना ही अर्थ समझने की ज़रूरत है।

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आत्मा के धर्म का पालन करना, वही ‘स्वधर्म’ है!

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नापसंद निमित्त को काटने दौड़े तो उसे अधर्म कहा जाएगा और यदि निमित्त को निमित्त समझे और शांत भाव से रहे, उसे धर्म कहा जाएगा।

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धर्म तो सारे सही ही हैं लेकिन जिस धर्म में यह पता लगाते हैं कि, ‘मैं कौन हूँ’ और ‘कर कौन रहा है’, वह अंतिम प्रकार के धर्म मार्ग पर है। और ‘कौन’, उसे जान ले तो वह अंतिम धर्म है!

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खाना, पीना, उठना, जागना, ये सब देह के धर्म में ही आते हैं। एक बार, एक सेकन्ड के लिए भी आत्मधर्म में नहीं आया है। यदि आया होता तो भगवान के पास से हटता ही नहीं।

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