
धर्म अर्थात् किसी भी जीव को किसी भी प्रकार से सुख देना। किसी भी जीव को किसी भी प्रकार से दु:ख देना, वह अधर्म है। बस, धर्म का इतना ही अर्थ समझने की ज़रूरत है।
परम पूज्य दादा भगवाननापसंद निमित्त को काटने दौड़े तो उसे अधर्म कहा जाएगा और यदि निमित्त को निमित्त समझे और शांत भाव से रहे, उसे धर्म कहा जाएगा।
परम पूज्य दादा भगवानधर्म तो सारे सही ही हैं लेकिन जिस धर्म में यह पता लगाते हैं कि, ‘मैं कौन हूँ’ और ‘कर कौन रहा है’, वह अंतिम प्रकार के धर्म मार्ग पर है। और ‘कौन’, उसे जान ले तो वह अंतिम धर्म है!
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