
यदि आपको यह संसार पुसाता है तो आगे कुछ भी जानने की ज़रूरत नहीं है और संसार आपको किसी तरह से परेशान करता है तो आपको अध्यात्म जानने की ज़रूरत है। अध्यात्म में ‘स्वरूप’ को जानने की ज़रूरत है। ‘मैं कौन हूँ’, ऐसा जानते ही सारे ‘पज़ल’ सॉल्व हो जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानआत्मा खुद ही परमात्मा है। वह तप स्वरूप नहीं है, जप स्वरूप भी नहीं है। बाकी की ये सारी कल्पनाएँ हैं। ‘स्वरूप का भान’ होने के बाद ही ये अन्य सारे संयोग बंद हो जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानसंसार में अनेक तरह के उपादान हैं, लेकिन सब से अंतिम उपादान, मोक्ष का उपादान, खुद का स्वरूप, शुद्धात्मा है!
परम पूज्य दादा भगवानचैतन्य अविनाशी है और अचेतन भी अविनाशी है, लेकिन चैतन्य को तत्त्व स्वरूप से जानना है और तत्त्व स्वरूप से ही अविनाशीपन को समझना है!
परम पूज्य दादा भगवान‘ज्ञानी’ की आज्ञा मन का शुद्धिकरण करती है। ‘स्वरूप’ का ज्ञान मन को कैसे भी संजोगों में समाधान देगा।
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