
जो यश के भूखे नहीं होते, उन पर देवगण राज़ी होते हैं। पूरा जगत् हम पर राज़ी हो सके ऐसा है। लेकिन हमारी भूख की वजह से राज़ी नहीं है।
परम पूज्य दादा भगवान‘दादा’ को इतना यश क्यों मिलता है? मैंने कुछ भी नहीं किया हो, तब भी लोग आकर मुझ से कह जाते हैं कि ‘दादा, आपकी वजह से ही मेरा यह सारा काम हुआ है!’ मैं मना करूँ फिर भी यश देकर जाते हैं। यह यशनाम कर्म क्या है? भावना का फल है। भावना क्या थी? ‘इस जगत् में किसी के लिए कोई भी काम करो, खुद को लुटा दो, ऑब्लाइज़ (उपकार) करो। रुपए नहीं हों तो किसी के लिए चक्कर लगाना पड़े तो वह भी करो’
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