आध्यात्मिक कोटेशन "तिरस्कार" पर

यदि मोक्ष में जाना हो तो सही-गलत का द्वंद्व निकाल देना पड़ेगा। यदि शुभ में आना हो तो गलत चीज़ का तिरस्कार करो और अच्छी चीज़ पर राग करो। शुद्ध में सही या गलत चीज़ पर राग या द्वेष नहीं है।

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पूरा जगत् नुकसान का तिरस्कार करता है। उसमें नुकसान ने क्या बिगाड़ा? भगवान से पूछो कि, ‘साहब, आपको नफा-नुकसान नहीं है?’ तब भगवान कहते हैं कि, ‘तू भ्रांतिज्ञान से देखता है, ‘रिलेटिव’ देखता है इसलिए नफा-नुकसान दिखाई देते हैं। मैं यथार्थ ज्ञान से देखता हूँ।’

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जिसका तिरस्कार करोगे, उससे भय लगेगा। साँप के, बाघ के प्रति तिरस्कार है इसलिए उनसे भय लगता है।

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यह मार्ग प्रेममय है। जिसे दुनिया में किसी के प्रति तिरस्कार न हो, वह परमात्मा बन सकता है!

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पूरा संसार चार प्रकार के भावों में खेलता है : 1. हिंसक भाव 2. पीड़ादायक भाव 3. तिरस्कार भाव 4. अभाव भाव। इन चारों सीढ़ियों को पार करके भगवान महावीर जिस पाँचवी सीढ़ी पर पहुँचे थे, वह अंतिम, ‘वीतराग विज्ञान’ का ‘प्लेटफॉर्म’ है!

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पीड़ादायक भाव खत्म होने के बाद तिरस्कार भाव खत्म हो जाने चाहिए। यानी अंदर छुपा तिरस्कार रहा करता है, या सामने वाले की क्रिया पर तिरस्कार होता रहता है, वह।

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भगवान महावीर हिंसक, पीड़ादायक, तिरस्कार और अभाव भाव की चारों सीढिय़ों को पार करके अंतिम, ‘वीतराग विज्ञान’ के ‘प्लेटफॉर्म’ पर पहुँचे थे!

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