
(1) धर्माधर्म आत्मा - अधर्म को धक्का लगाना और धर्म का संग्रह करना, उससे सांसारिक फल मिलता है। (2) ज्ञानघन आत्मा - यानी कि ‘रियल और रिलेटिव’ का ज्ञान हो। (3) विज्ञानघन आत्मा - यानी कि ‘एब्सल्यूट’ (केवल)। हम ‘विज्ञानघन आत्मा’ में बैठे हुए हैं।
परम पूज्य दादा भगवानअपने दृष्टि दोष को जो कम करे, वही धर्म है। जो दृष्टि दोष को बढ़ाए, वह अधर्म है। यह संसार दृष्टि दोष का ही परिणाम है।
परम पूज्य दादा भगवानधर्म से माया की लूट बंद हो जाती है और अधर्म से माया की लूट शुरू हो जाती है।
परम पूज्य दादा भगवान‘इगोइज़म’ ही अधर्म है और ‘इगोइज़म’ का नहीं होना वही धर्म है। प्रत्यक्ष ‘ज्ञानी’ की उपस्थिति के बिना ‘इगोइज़म’ कम हो सके, ऐसा है ही नहीं।
परम पूज्य दादा भगवानसंसार का स्वरूप कैसा है? जगत् के जीवमात्र में भगवान विराजमान हैं, इसलिए किसी भी जीव को कोई भी त्रास पहुँचाओगे, दु:ख दोगे तो अधर्म होगा। अधर्म का फल है आपकी इच्छा के विरूद्ध और धर्म का फल है आपकी इच्छानुसार।
परम पूज्य दादा भगवानसब से ज्यादा कठिन अधर्म है, उससे कम कठिन है धर्म और जिसमें बिल्कुल मेहनत नहीं वह है मोक्ष!
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