
अनंत जन्मों तक भटकने के बाद कहीं जाकर मनुष्य जन्म मिलता है। उसमें कमर दर्द करे, परोसी हुई थाली भी न खाने दें, ऐसे अंतराय होते हैं! ऐसा है यह सब! इसलिए सोच-समझकर कदम उठाना।
— परम पूज्य दादा भगवान‘मॉरल’ अर्थात् खुद के हक़ का और जो सहज रूप से मिल जाए, उतनी सभी चीज़ें भोगने की छूट! ‘मॉरेलिटी’ का यह सब से अंतिम अर्थ है!
— परम पूज्य दादा भगवानजो हमें दु:खों से मुक्त करें, वे ‘ज्ञानी’। जो दु:ख में वृद्धि करें वे ज्ञानी नहीं हैं।
— परम पूज्य दादा भगवानअध्यात्म कोई क्रिया नहीं है, वह तो दृष्टि है। जगत् के लोगों के पास सांसारिक दृष्टि है और ‘यह’ आध्यात्मिक दृष्टि है। ‘ज्ञानी पुरुष’ दृष्टि बदल देते हैं, उसके बाद इस तरफ अध्यात्म दिखाई देता है।
— परम पूज्य दादा भगवानप्रकृति धाक या धमकी से नहीं सुधरती, या वश में नहीं होती। धाक और धमकी से तो जगत् खड़ा हुआ है। धाक और धमकी से तो प्रकृति और भी अधिक बिगड़ती है।
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