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श्री कृष्ण अर्थात् नर से नारायण हुए वे! कृष्ण तो गज़ब के पुरुष हो चुके हैं। वे वासुदेव थे। वासुदेव मतलब जो सभी चीज़ों के भोक्ता, लेकिन मोक्ष के अधिकारी होते हैं। उनकी हज़ारों रानियाँ थी फिर भी वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। श्री कृष्ण भगवान भविष्य में तीर्थंकर होंगे तब उनके निमित्त से करोड़ों लोग आत्मा का ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होंगे।

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हजारों वर्षों पहले हुए भगवान श्री कृष्ण को लोग आज भी बहुत भक्ति से भजते हैं, उनको पूजते हैं। उनके द्वारा बोधित गीता के ज्ञान को समझने और जीवन में अपनाने के लिए पूरी दुनिया के लोग प्रयास करते हैं!

कुछ लोग श्री कृष्ण भगवान को पालने में झूलते हुए लल्लाजी की तरह, तो कुछ लोग राधा और गोपियों के साथ रासलीला करते हुए नटखट नंदलाल के रूप में भजते हैं। कुछ लोग बंसीवाले गोपाल की तरह तो कुछ लोग कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी की तरह आराधना करते हैं। बालकृष्ण, योगेश्वर श्री कृष्ण, श्रीनाथजी और तिरुपति बालाजी इन सभी स्वरूपों में श्री कृष्ण भगवान का सच्चा स्वरूप कौन सा है? तो चलिए, श्री कृष्ण भगवान के सच्चे स्वरूप को पहचानते हैं।

Lord Krishna

"Lord Krishna is not an ordinary King. He was not the doer of anything. His vision showed that the war will not stop and He told Arjun that you will fight in the war. Lord Krishna was a Narayan Vasudev."

वासुदेव श्री कृष्ण

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!

श्री कृष्ण भगवान तो वासुदेव थे। वासुदेव यानी तिरसठ शलाका (श्रेष्ठ) पुरुषों में से एक! हर काल में ऐसे तिरसठ उत्तम पुरुष होते हैं, जिन पर मोक्षमार्ग का सिक्का लग चुका होता है।

तिरसठ शलाका पुरुषों में चौबीस तीर्थंकर भगवान होते हैं, जिन्होंने क्रोध-मान-माया-लोभ पर संपूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। फिर बारह चक्रवर्ती राजा होते हैं, जो पूरी पृथ्वी के, छः खंडों के अधिपति कहलाते हैं। फिर नौ वासुदेव और उनके विरूद्ध में नौ प्रतिवासुदेव होते हैं। कुदरती रूप से दोनों के बीच युद्ध होता है और वासुदेव के निमित्त से प्रतिवासुदेव की मृत्यु होती है, तब वासुदेव पूरी दुनिया के मालिक बन जाते हैं। इसके अलावा नौ बलदेव होते हैं। वासुदेव और बलदेव दोनों भाई होते हैं और उनके बीच अत्यंत राग होता है। श्री कृष्ण भगवान वासुदेव कहलाते हैं और उनके भाई बलराम थे, वे बलदेव कहलाते हैं। ये सभी पुरुष देहधारी रूप में भगवान कहलाते हैं, क्योंकि उनके अंदर संपूर्ण भगवान प्रकट हुए हैं।

वासुदेव पद अलौकिक पद है। वासुदेव के रूप में जिनका जन्म होता है उसके कई अवतार पहले से ही उनका प्रभाव गज़ब का होता है। उनकी आँख देखकर ही लोग डर जाएँ ऐसा उनका प्रताप होता है। वे चलते हैं तो धरती काँपती है। उनकी हाज़िरी से ही लोग इधर-उधर हो जाते हैं। उनके लक्षण अलग ही तरह के होते हैं।

नैष्ठिक ब्रह्मचारी

श्री कृष्ण भगवान को गोपियों और राधा के साथ रासलीला करते हुए दर्शाया जाता है। कुछ लोग उनके चारित्र की दुश्चारित्र कहकर निंदा करते हैं, लेकिन वास्तविकता में श्री कृष्ण भगवान तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। जिनके भाव में निरंतर ब्रह्मचर्य की ही निष्ठा है, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाते हैं! श्री कृष्ण भगवान की हज़ारों रानियाँ थीं, उदय में अब्रह्मचर्य था, फिर भी भाव में निरंतर ब्रह्मचर्य के प्रति ही निष्ठा थी, इसीलिए वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाए।

जैसे कोई व्यक्ति संयोगवश चोरी करता है, लेकिन उसके भाव में हमेशा यही रहता है कि “चोरी नहीं करनी चाहिए”, तो वह नैष्ठिक अचौर्य कहलाएगा। कोई व्यक्ति बाहर से देखने पर दान तो देता है, लेकिन उसके मन में ऐसा हो कि “इन लोगों से सब कुछ छीन लूँ” तो वह दान नहीं माना जाता। इसी तरह इन्द्रियों से जो प्रत्यक्ष दिखता है ऐसी क्रिया की अपेक्षा से अंदर अपनी निष्ठा कहाँ काम कर रही है यह महत्त्वपूर्ण है। एक बार गोपियों को यमुना नदी पार करके सामने दूसरे किनारे पर दुर्वासा मुनि के लिए भोजन लेकर जाना था। लेकिन नदी के उफनते पानी से होकर गुज़रना असंभव था। तब गोपियों ने श्री कृष्ण भगवान से पूछा कि अब क्या करें? श्री कृष्ण भगवान ने कहा, “जाओ, यमुना नदी से कहो कि, अगर श्री कृष्ण आजीवन ब्रह्मचारी हों, तो वे मार्ग दे दें!” गोपियों ने यमुना नदी से ऐसा कहा और यमुना ने मार्ग दे भी दिया। इसी तरह वापस लौटते समय दुर्वासा मुनि ने कहा, “अगर दुर्वासा मुनि आजीवन उपवासी हों, तो यमुना नदी मार्ग दे दें!” और ऐसा ही हुआ। इस प्रकार आहार लेने के बावजूद दुर्वासा मुनि हमेशा निराहारी थे और भगवान श्री कृष्ण हजारों रानियाँ होने के बावजूद नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे।

वास्तव में, गोपी अर्थात् कोई स्त्री नहीं है। श्री कृष्ण भगवान के समय में गायों का पालन करने वाले लोगों को ‘गोप’ कहते थे, जिसका अर्थ है गौ पालन करने वाला व्यक्ति। उसी से गोपी नाम पड़ा है। ज्ञानी पुरुष की भक्ति में पुरुष भी गोपियाँ ही माने जाते थे और गोपी होकर भक्ति करें तो ही कल्याण होता है। इसी तरह, राधा शब्द ‘राध’ से आया है। तद्रूप होने का प्रयत्न उसे राध कहते हैं, जिसका अर्थ होता है आराधना। जहाँ प्रभु की आराधना होती है, यानी कि ‘राधा’ हो, वहाँ ‘कृष्ण’ होते ही हैं! राधा के साथ श्री कृष्ण भगवान का संबंध, भक्त की प्रभु के प्रति आराधना का प्रतीक है।

भावी तीर्थंकर

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श्री कृष्ण भगवान खुद नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो थे ही। इतना ही नहीं, उन्हें सभी ब्रह्मचारियों और त्यागियों के प्रति बहुत अहोभाव था! उन्होंने नेमिनाथ भगवान से कहा था कि मैं दीक्षाधर्म अंगीकार करने में समर्थ नहीं हूँ, लेकिन मेरे राज्य में जिन्हें भी दीक्षा लेनी हो, उन सभी को मैं दत्तक लेने के लिए तैयार हूँ। उनका पूरा जीवननिर्वाह, उनके और उनके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी और संरक्षण तक का सब कुछ मैं संभालूँगा। श्री कृष्ण भगवान की ऐसी ज़बरदस्त अनुमोदना थी। उनके कारण कई लोग निश्चिंत होकर नेमिनाथ भगवान से दीक्षा ग्रहण अंगीकार सके और आत्मकल्याण साध सके।

त्यागियों के प्रति उनको इतना अहोभाव था कि उन्होंने उत्कृष्ट भाव से असंख्य साधुओं को वंदन किया था! श्री कृष्ण भगवान को नेमिनाथ भगवान से ही क्षायक समकित प्राप्त हुआ था और उसी भव में उन्होंने तीर्थंकर गोत्र भी बाँधा! अर्थात् आने वाली चौबीसी में श्री कृष्ण भगवान तीर्थंकर भगवान होंगे!

सुदर्शन चक्र

सुदर्शन अर्थात् एक चक्र, जिसे आम तौर पर भगवान श्री कृष्ण के दाहिने हाथ की तर्जनी उँगली पर गोल घूमता हुआ हथियार माना जाता है। लेकिन यह चक्र वास्तव में क्या दर्शाता है?

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सुदर्शन चक्र कोई शस्त्र नहीं था। सुदर्शन अर्थात् सम्यक् दर्शन। नेमिनाथ भगवान यानी कि श्री कृष्ण भगवान के चचेरे भाई जो तीर्थंकर थे, उनसे ही श्री कृष्ण भगवान को सम्यक् दर्शन प्राप्त हुआ था। दर्शन यानी दृष्टि और सुदर्शन यानी सम्यक् दृष्टि। “मैं आत्मा हूँ” यह सम्यक् दृष्टि है। अज्ञानता के कारण जगत् के जीव यह नामधारी, देहधारी मैं हूँ ऐसी भ्रांति में जीते हैं। जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब अज्ञानता के आवरणों का भेदन होता है और ‘सुदर्शन’ अर्थात् सम्यक् समझ प्रकट होती है। सभी भ्रांत मान्यताएँ टूटने पर “मैं आत्मा हूँ” ऐसी राईट बिलीफ बैठती है, वही सम्यक् दर्शन।

इसी दृष्टि के कारण श्री कृष्ण भगवान भव्य राजपाट, हज़ारों रानियाँ और अपार समृद्धि होने के बावजूद संसार के सभी मायाजालों से निर्लेप रहते थे। श्री कृष्ण भगवान ने कुरुक्षेत्र के बीच अर्जुन को वही सम्यक् दर्शन प्रदान किया था।

भगवान श्री कृष्ण की जीवन लीलाएँ

कालियादमन

श्री कृष्ण भगवान की जीवन लीलाओं में सबसे प्रचलित लीला है कालिया नाग का दमन। कहा जाता है कि श्री कृष्ण भगवान बचपन में अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, तभी गेंद यमुना नदी में गिर गई। उस नदी में अत्यंत ज़हरीला कालिया नाग रहता था। श्री कृष्ण भगवान ने गेंद को निकालने के लिए नदी में डुबकी लगाई और उस नाग को वश करके उसके  फन के ऊपर नृत्य किया।

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परम पूज्य दादाश्री इस कथा के पीछे की वास्तविकता समझाते हैं। कालियादमन में नाग वह क्रोध का प्रतीक है। हम सभी के अंदर क्रोध रूपी नाग रहा हुआ है, जो सामने वाले व्यक्ति को फन मारकर रिश्तों में कड़वाहट रूपी ज़हर फैलाता है।

श्री कृष्ण भगवान ने क्रोधरूपी नाग को वश किया, इसलिए वे कृष्ण कहलाए। जो कर्मों को कृष करे, वही कृष्ण! बालजीवों को यह बात समझाने के आशय से, ऐसे रूपक के साथ कालियादमन की कथा कही गई। लेकिन समय के साथ मूल आशय विस्मृत हो गया!

एक उँगली पर गोवर्धन

श्री कृष्ण भगवान की एक प्रचलित लीला में कहा जाता है कि उन्होंने मूसलाधार बारिश में गाँव के लोगों और पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए कनिष्ठिका उँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया था। वास्तविकता में, गोवर्धन कोई पर्वत नहीं है। यहाँ गोवर्धन का सही अर्थ गो-वर्धन मतलब गायों का वर्धन है।

श्री कृष्ण भगवान के काल में हिंसा बहुत बढ़ गई थी। भारत में गायों को पवित्र माना जाता है, लेकिन उस समय गायों की हिंसा करके उनका मांस खाना शुरू हुआ था। इसलिए श्री कृष्ण भगवान ने क्या किया? गोवर्धन और गौरक्षा की शुरुआत करवाई। गौरक्षा से गायों की हिंसा रुकी और गोवर्धन से गायों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू हुए। श्री कृष्ण भगवान ने यह बहुत ऊँचा काम किया था।

समय के साथ, गोवर्धन पर्वत उँगली पर उठाया, यह शब्द स्थूल में रहा, लेकिन इसकी सूक्ष्म भाषा मिट गया। तार्किक प्रश्न यह उठता है कि गोवर्धन पर्वत उठाया, तो हिमालय क्यों नहीं? और इतने समर्थ भगवान थे, तो पैर में तीर लगने से मृत्यु क्यों हुई?

वास्तविकता में, श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन के प्रयोजन की ओर उँगली की थी। उनके नेतृत्व में जगह-जगह गौशालाएँ स्थापित की गई थीं, जहाँ हज़ारों गायों का पोषण हो सके ऐसी व्यवस्था की गई थी। गोवर्धन और गौरक्षा दोनों होने से जगह-जगह दूध और घी का उत्पादन बढ़ा था। इस प्रयोजन में उनके साथ गोवर्धन करने वाले गौ पालक गोप और गोपी कहलाए!

इस प्रकार, गोवर्धन श्री कृष्ण भगवान द्वारा की गई अहिंसा के प्रचार का प्रतीक है। उनके जीवन के इस प्रसंग से हमें यह सीखने को मिलता है कि मनुष्य के जीवन में हिंसक भाव होना ही नहीं चाहिए। हमारा जीवन अहिंसा के लिए खर्च हो जाए, वह अहिंसक भाव कहलाता है।

पुष्टिमार्ग

श्री कृष्ण भगवान हजारों वर्ष पहले हो चुके हैं। उनके वक़्त में वैष्णव नाम का कोई धर्म नहीं था। भगवान ने तो आत्मधर्म को स्वधर्म कहा था। श्री कृष्ण भगवान के जाने के बाद वैष्णव संप्रदाय की स्थापना हुई। जबकि पुष्टिमार्ग तो श्री वल्लभाचार्य द्वारा पाँच सौ सालों पहले ही स्थापित हुआ था।

पाँच सौ सालों पहले, मुस्लिम राजाओं का हिंदुस्तान में बहुत कहर था। स्त्रियों को घर से बाहर या मंदिर जाने में भी डर लगता था, इसलिए कोई भी घर से बाहर कदम नहीं रखता था। हिंदू धर्म खत्म होने की कगार पर था। तब श्री वल्लभाचार्य ने काल के अनुरूप ऐसे धर्म को पुष्टि दी, जिसमें घर बैठे भक्ति की जा सके ऐसा रास्ता दर्शाया। यह भक्तिमार्ग ही पुष्टिमार्ग कहलाया।

पुष्टिमार्ग में श्री कृष्ण भगवान के बाल स्वरूप यानी ठाकुर जी की पूजा, सेवा और भक्ति की जाती है। इसमें भक्त ठाकुर जी को नहलाते हैं, भोजन कराते हैं, सुलाते हैं, उनकी सभी सेवा करते हैं। पक्के वैष्णव खुद जहाँ भी जाते हैं, वहाँ ठाकुर जी को साथ ले जाते हैं और घर में केवल सात्त्विक आहार ही खाते हैं। पूरा दिन चित्त भगवान में ही लगा रहता है, इसी लिए यह भक्तिमार्ग एक ऊँचा मार्ग है। अब ज्ञानी पुरुष की उपस्थिति में आत्मधर्म प्रकाश में आया है!

श्री कृष्ण भगवान की सच्ची भक्ति

श्री कृष्ण भगवान पिछले अवतार में वणिक थे। तब उन्हें जहाँ-तहाँ से ज़बरदस्त तिरस्कार मिला था। फिर वे साधु बने थे और उन्होंने ज़बरदस्त तप-त्याग का आचार लिया। कठोर तप से बंधे हुए सारे पुण्य को खर्चने के लिए उन्होंने नियाणां किया था कि पूरा जगत् मुझे पूजे। नियाणां यानी पुण्य की सारी ही जमापूँजी किसी एक चीज़ प्राप्त करने में खर्च कर देना। इस नियाणे का परिणाम यह आया कि श्री कृष्ण भगवान के अवतार में तो उन्होंने पूज्य पद को प्राप्त किया लेकिन आज भी लोगों में श्री कृष्ण भगवान अत्यंत पूज्यनीय हैं!

श्री कृष्ण भगवान का सच्चा भक्त कैसा होता है? हम एक ओर कहते हैं कि, “जीव तुं शीद ने शोचना करे, कृष्ण ने करवुं होय ते करे।” और दूसरी ओर हम दिन-रात चिंता और दुःख में ही डूबे रहते हैं, तो यह श्री कृष्ण भगवान की सच्ची भक्ति कैसे कही जाएगी? एक बार “श्री कृष्णः शरणं मम” कहकर हमने श्री कृष्ण भगवान की शरण ली, तो फिर चिंता किस बात की? परम पूज्य दादाश्री श्री कृष्ण भगवान की सच्ची भक्ति की रीत बताते हुए कहते हैं, “आपको रोज़ सुबह पाँच बार कृष्ण भगवान की फोटो के सामने दोनों हाथ जोड़कर कहना चाहिए कि, ‘हे भगवान, आपने कहा है कि तू एक भी चिंता मत करना। क्योंकि करना-करवाना सब आपके हाथ में है, फिर भी मुझसे चिंता हो जाती है तो क्या करूँ? मेरी तो दृढ़ इच्छा है कि एक भी चिंता नहीं करूँ। इसलिए हे भगवान ऐसी कुछ कृपा कीजिए, ऐसी शक्ति दीजिए कि फिर से चिंता नहीं हो।’ इसके बावजूद यदि फिर से चिंता हो तो फिर से भगवान से ऐसे विनती करना। ऐसे करते ही जाओ, फिर कोई भी चिंता नहीं होगी, ऐसे हम लोगों ने कृष्ण भगवान से तार जोड़ा!”

श्री कृष्ण भगवान ने कहा था कि, “जगत् भौतिक में जागता है, वहाँ श्री कृष्ण सोते हैं और जहाँ जगत् सोता है, वहाँ कृष्ण भगवान जागते हैं।“ मतलब कि जगत् संसार में जागता है, जबकि श्री कृष्ण भगवान अध्यात्म में जागते हैं। अंत में अध्यात्म की जागृति में आना पड़ेगा। क्योंकि संसारी जागृति वह अहंकारी जागृति है और निर्‌अहंकारी जागृति से मोक्ष है।

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श्री कृष्ण भगवान का सच्चा स्वरूप पहचानकर उनकी भक्ति करें तो वह श्रेष्ठ भक्ति है। मूर्त स्वरूप की भक्ति में भक्त और भगवान अलग रहते हैं। सच्चे श्री कृष्ण भगवान का साक्षात्कार एक ज्ञानी पुरुष ही करवा सकते हैं। खुद के सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो, तब हमें अंदर ही आत्मा का साक्षात्कार होता है और वही सच्चे श्री कृष्ण हैं। खुद स्वरूप में रमणता करे बाद में “आत्मवत् सर्वभूतेषु” अर्थात् जीव मात्र आत्म स्वरूप से दिखे। तब भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।

‘गीता’ का सार

कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर अर्जुन अपने सगे-संबंधियों और बड़ों के खिलाफ युद्ध लड़ने के विचार से विषाद में डूब गए थे। तब अर्जुन का मोह दूर हो जाए और वे युद्ध करने के लिए तैयार हो जाएँ, उस प्रयोजन से श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया था, वह भगवद् गीता के रूप में जाना गया।

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महाभारत के महायुद्ध से पहले श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन से कहा कि तुम मेरे सच्चे स्वरूप को पहचान नहीं पाए हो। यह देह मैं नहीं हूँ, मैं तो आत्मा स्वरूप हूँ। शस्त्र मुझे भेद नहीं सकते, अग्नि मुझे जला नहीं सकती, पानी मुझे भिगो नहीं सकता, मैं ऐसा शुद्ध आत्मा हूँ। हे अर्जुन! तुम भी वही आत्मा स्वरूप हो। जिनके साथ तुम युद्ध करने से मना कर रहे हो, वे सभी आत्मा स्वरूप हैं। आत्मा जन्म भी नहीं लेता और मरता भी नहीं। इस घड़ी युद्ध करना तुम्हारा क्षत्रिय धर्म है, तुम इसे निभाओ। श्री कृष्ण भगवान से प्राप्त हुए आत्मज्ञान से अर्जुन का विषाद दूर हुआ। महाभारत का भीषण युद्ध करने के बावजूद अर्जुन का एक भी कर्म नहीं बंधा और अंत में श्री नेमिनाथ प्रभु की शरण में जाकर उन्होंने मोक्ष भी प्राप्त किया।

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया था, वही ज्ञान अक्रम विज्ञान के माध्यम से ज्ञानी पुरुष हमें प्राप्त कराते हैं। जिससे संसार की सभी ज़िम्मेदारियों को निभाने के बावजूद एक भी कर्म न बंधे ऐसी दृष्टि प्राप्त होती है।

भगवद् गीता की विस्तृत समझ भगवद् गीता की यथार्थ समझ पर उपलब्ध है।

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