
आत्मा का अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत शक्ति आज भी उसी रूप में है। आत्मा कभी भी पापी हुआ ही नहीं। आत्मा संपूर्ण शुद्ध ही है।
परम पूज्य दादा भगवानपुण्य के आधार पर आपका पुरुषार्थ मुनाफा लाता है और पुण्य खत्म हो जाए तो वही पुरुषार्थ नुकसान लाता है।
परम पूज्य दादा भगवानस्वार्थ से करे तब पाप कर्म बंधते हैं और निःस्वार्थता से करे तब पुण्य कर्म बंधते हैं। लेकिन दोनों ही कर्म हैं न? पुण्य कर्म का फल है सोने की बेड़ी और पाप कर्म का फल है लोहे की बेड़ी। लेकिन दोनों बेडि़याँ ही हैं न?
परम पूज्य दादा भगवानचोर को निमित्त कैसे मिलता है? चोर को चोरी की इच्छा हो और यदि उसका पुण्य जाग्रत हो और हमारे हिसाब में (पैसे) जाने वाले हों तो जेब कट जाती है। चोर तो निमित्त बन जाता है। यदि चोर का पाप जाग्रत हो तो चार आना भी नहीं मिलता। निमित्त बनना भी पाप-पुण्य के हिसाब से होता है।
परम पूज्य दादा भगवानजहाँ पुण्य और पाप हैं, वहाँ सच्चा धर्म ही नहीं है। सच्चा धर्म पुण्य-पाप से रहित है। जहाँ पुण्य-पाप को हेय माना जाता है और उपादेय को निज स्वरूप माना जाता है, वहाँ सच्चा धर्म है!
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