
आत्मा खुद ही परमात्मा है। वह तप स्वरूप नहीं है, जप स्वरूप भी नहीं है। बाकी की ये सारी कल्पनाएँ हैं। ‘स्वरूप का भान’ होने के बाद ही ये अन्य सारे संयोग बंद हो जाते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानजहाँ जो वस्तु नहीं है, वहाँ पर उस वस्तु की कल्पना की जाए, उसी को माया कहते हैं।
परम पूज्य दादा भगवानयह संसार निरा फँसााव है। लेकिन जाए कहाँ? अरे! कीचड़ में फँस गए तो बाहर नहीं निकल पाते, जितना प्रयत्न करता है उतना ही कीचड़ में और भी गहरे उतरता जाता है। तो फिर अगर इन कल्पनाओं में फँस गए तो कैसे छूट पाएँगे?
परम पूज्य दादा भगवानयह सारी कल्पना ही है। फिर कल्पना में ऐसा नहीं होता कि यह सही और यह गलत है।
परम पूज्य दादा भगवानभगवान महावीर ‘समय विचारी’ कहलाते हैं फिर भी तदाकार नहीं रहते थे। ‘समय-समय’ पर विचार पलटते हैं। लोग तो दस-दस, पंद्रह-पंद्रह मिनट तक एक ही विचार में खो जाते हैं! कई तो एक-एक घंटे तक खोए रहते हैं! एक घंटे में तो नई दुनिया रची जा सकती है! जबकि खुद न जाने किसमें पड़ा रहता है! मनपसंद विषय में।
परम पूज्य दादा भगवानअज्ञाशक्ति, आत्मा की कल्पना है, विकल्प है। जैसा कल्पे वैसा ही शरीर बन जाता है। उसे कुछ भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। फिर ‘इगोइज़म’ तो साथ में ही होता है। पुराना ‘इगोइज़म’ खत्म नहीं हुआ, उससे पहले तो वहाँ नया ‘इगोइज़म’ शुरू हो जाता है।
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