धर्मध्यान पालन करने का फल है, सम्यकï दर्शन।
औरों के लिए जो कुछ भी किया जाता है, वह धर्मध्यान है।
धर्म की शुरुआत ही ‘ऑब्लाइज़िंग नेचर’ से होती है।
जहाँ कोई भी क्लेश है वहाँ भगवान भी नहीं हैं और धर्म भी नहीं है।
संसार में जो दु:ख आते हैं वे अपने द्वारा धर्म की विराधना होने से आते हैं।
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