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अहंकार क्या है ? मैं वास्तव में कौन हूँ ?

'मैं चन्दूलाल हूँ' यह अहंकार है। क्योंकि जहाँ 'मैं' नहीं, वहाँ 'मैं' का आरोपण किया, उसका नाम अहंकार।

प्रश्नकर्ता : 'मैं चन्दूलाल हूँ' कहें, उसमें अहंकार कहाँ आया ? 'मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ' ऐसा करे वह अलग बात है, पर सहज रूप से कहें, उसमें अहंकार कहाँ आया ?

दादाश्री : सहज भाव से बोले तो भी अहंकार क्या चला जाता है॒? 'मेरा नाम चन्दूलाल है' ऐसा सहज बोलने पर भी वह अहंकार ही है। क्योंकि आप 'जो हैं' यह जानते नहीं हैं और 'जो नहीं हैं' उसका आरोपण करते हैं, वह सब अहंकार ही है न !

'आप चन्दूलाल हैं' वह ड्रामेटिक वस्तु है। अर्थात 'मैं चन्दूलाल हूँ' ऐसा बोलने में हर्ज नहीं पर 'मैं चन्दूलाल हूँ' यह बिली़फ नहीं होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : हाँ, वर्ना 'मैं' पद आ गया।

दादाश्री : 'मैं' 'मैं' की जगह पर बैठे तो अहंकार नहीं है। पर 'मैं' मूल जगह पर नहीं है, आरोपित जगह पर है इसलिए अहंकार। आरोपित जगह से 'मैं' हट जाये और मूल जगह पर बैठ जाये तो अहंकार गया समझो। अर्थात 'मैं' निकालना नहीं है, 'मैं' को उसके एक्ज़ैक्ट प्लेस (यथार्थ स्थान) पर रखना है।

* चन्दूलाल = जब भी दादाश्री 'चन्दूलाल' या फिर किसी व्यक्ति के नाम का प्रयोग करते हैं, तब वाचक, यथार्थ समझ के लिए, अपने नाम को वहाँ पर डाल दें।

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