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आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद, क्या हमारा जीवन पॉज़िटिव हो जाता है?

जागृति वही, जो दिखाए खुद के दोष

प्रश्नकर्ता: ज्ञान मिलने के बाद जागृति आ जाती है उससे फिर धीरे-धीरे पूरे जीवन में बदलाव आता रहता है।

दादाश्री: हाँ, बदलाव आता है।

प्रश्नकर्ता: वही आत्मा का अनुभव है।

दादाश्री: बस, वही, वही।

प्रश्नकर्ता: ऐसा बदलाव आता है, वह पॉज़िटिव होता जाता है।

दादाश्री: खुद के दोष दिखने लगते हैं। जगत् में सब लोगों को अपने दोष नहीं दिखते, लेकिन सामनेवाले का दोष दिखाना हो तो सभी दिखा देते हैं, जबकि यहाँ तो खुद के दोष दिखते हैं।

प्रश्नकर्ता: हाँ, खुद के दोष दिखते हैं!

दादाश्री: सबकुछ दिखता है, सब।

प्रश्नकर्ता: अगर कुछ बुरा-भला, अच्छा-बुरा पता चले तो उसे अनुभव कहते हैं न?

दादाश्री: खुद को सब पता चल जाए, खुद की समझ में आ जाए वही आत्मा है।

Reference: Book Name: आप्तवाणी 14 (भाग 4) (Page #344)   

विज्ञान हाथ में आया है तो पूरा कर लो

ये तो अलौकिक विज्ञान है। ये कोई धर्म नहीं है, विज्ञान है। तुरन्त ही फल देनेवाला है। इसलिए कहते हैं कि अब काम निकाल लो।

अक्रम विज्ञान का कितना बड़ा आश्चर्य है कि व्यक्ति को पॉज़िटिव साइड (सकारात्मक दिशा) में रख देता है! पॉज़िटिव साइड में आते-आते तो मनुष्य के करोड़ों जन्म हो जाते हैं। ये नेगेटिव धीरे-धीरे निकालते, निकालते, निकालते, कब अंत आएगा!

प्रश्नकर्ता: जितने समय के लिए नेगेटिव भरते रहे हो, उतना ही समय लगता है।

दादाश्री: इतना सारा समय, बस उसमें ही जाता है। और दोस्त भी नेगेटिववाले मिल जाते हैं। रिश्तेदार, दोस्त, सारे उल्टे संयोग, सभी नेगेटिववाले मिल जाते हैं।

प्रश्नकर्ता: सारा नेगेटिव में।

दादाश्री: अक्रम विज्ञान से पूरा नेगेटिव पोर्सन (नकारात्मक भाग) ही उड़ गया। ये कोई ऐसी-वैसी वस्तु है? जब तक देहाध्यास हो, तब तक नेगेटिव साइड ही होती है। अब पूरा नेगेटिव चला गया। एक व्यक्ति के लिए ज़रा-सा खराब विचार आना, वो भी नेगेटिव है। हमें गाली देता हो, उसके लिए खराब विचार आए, वो भी नेगेटिव कहलाता है। वो भी फिर उस व्यक्ति पर नहीं पहुँचता, भगवान पर पहुँचता है। उसके अंदर भी भगवान तो हैं ही न? इतनी ज़्यादा जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। इसलिए कहते हैं कि ये (विज्ञान) हाथ में आ गया है तो पूरा कर लो और काम निकाल लो। चाय पीते हैं उसमें हर्ज नहीं है। स्टेशन पर पकोड़े खाते हो उसमें भी हर्ज नहीं है। किन्तु इतना ध्यान में, लक्ष्य में रखना कि ये जो सामान है वो पूरा काम निकाल लेने जैसा है। और फिर वो हमारे अनुभव में आया है कि ये नेगेटिव की ओर नहीं जाता।

Reference: दादावाणी - May 2012 (Page #24 - Paragraph #7 to #12, Page 25 - Paragraph #1)

जीवन में धारणा के अनुसार नहीं होने पर, अपमान होने पर, सम्मान की रक्षा नहीं होने पर, मोह-अपेक्षा अनुसार नहीं मिलने पर, किसी के द्वारा नुकसान होने पर नेगेटिव भाव खड़े हो जाते हैं। किंतु जो छूटना चाहते हैं, वे नेगेटिव के कारणों की खोज करके पॉजिटिव से उसका भाग करके उस नेगेटिव को उड़ा दें। ज्ञान से नेगेटिव का भाग करने पर ही कर्तापन, मान, मोह, लोभ की गाँठ छूटेगी और जीवन में शांति होगी, तभी मोक्षमार्ग में प्रगति हो सकेगी।

एक सिक्के के दो पहलू की तरह हमारे दैनिक जीवन व्यवहार के साथ ‘पॉजिटिव’ और ‘नेगेटिव’ जुड़े हुए हैं। पॉजिटिव भगवानपक्षीय है जबकि नेगेटिव शैतानपक्षीय है। नेगेटिव से दु:ख और पॉजिटिव से सुख की प्राप्ति होती है। आत्मा का पक्ष पॉजिटिव है, बुद्धि का पक्ष नेगेटिव है। जिसका मन सदा के लिए पॉजिटिव हो गया, वही भगवान। नेगेटिव, संसारी बातों में समय गँवाए, सुख नहीं आने दे और संसार से बाहर नहीं निकलने दे। सांसारिक व्यवहार में नेगेटिव मिटाने में जितना समय व्यर्थ गँवाते हैं, उसके बजाय उतना समय पॉजिटिव में रहे तो नेगेटिव अपने आप मिट जाएगा। दादाश्री कहते हैं कि व्यवहार में पॉजिटिव रहना, नेगेटिव मत होना। पॉजिटिव रहने पर संसार की कोई अड़चन आपको नहीं छुएगी।

पॉजिटिव-नेगेटिव के बारे में सही समझ, दादाश्री के श्रीमुख से निकले सत्संग में से प्राप्त होती है। जो हमें जीवन में आशा-निराशा या सुख-दु:ख के समय नोर्मालिटी में रहकर सच्चा समाधान प्राप्त कराती है और नेगेटिव से मुक्ति दिलाकर पॉजिटिव को ग्रहण करवाकर सही मानों में जीवन को जीने लायक बनाती है। सैद्धांतिक समझ प्रदान करते हुए दादाश्री कहते हैं कि, ‘जीवन में एक प्रिन्सिपल (सिद्धांत) रखना। हमेशा पॉजिटिव रहना, नेगेटिव के पक्ष में कभी भी मत बैठना। सामने से नेगेटिव आए वहाँ मौन हो जाना।’

Reference: दादावाणी - Sep 2009 (Page #1 - Paragraph #2 to #4)

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