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माता–पिता और बच्चों के बीच का संबंध कैसे मज़बूत करें?

जो व्यक्ति माता-पिता के दोष देखता है, उसमें कभी भी बऱकत नहीं हो सकती। संभव है पैसेवाला हो, लेकिन उसकी आध्यात्मिक उन्नति कभी भी नहीं होती। माता-पिता के दोष नहीं देखने चाहिए। उनका उपकार तो भूल ही कैसे सकते हैं? किसी ने चाय पिलायी हो तो भी उसका उपकार नहीं भूलते, तो फिर हम माता-पिता का उपकार कैसे भुला सकते हैं?

तू समझ गया? हाँ, अर्थात् तुझे उनका उपकार मानना चाहिए, माता-पिता की बहुत सेवा करनी चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें तो ध्यान पर नहीं लेना चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें लेकिन वे बड़े हैं न! क्या तुझे भी उल्टा-सीधा बोलना चाहिए?

प्रश्नकर्ता: नहीं बोलना चाहिए। लेकिन बोल देते हैं उसका क्या? मिस्टेक हो जाए तो क्या करें?

दादाश्री: हाँ, क्यों फिसल नहीं जाता? क्योंकि वहाँ जागृत रहता है और अगर फिसल गया तो पिताजी भी समझ जाएँगे कि यह बेचारा फिसल गया। यह तो जान-बूझकर तू ऐसा करने जाए तो, ‘तू यहाँ क्यों फिसल गया?’ उसका मैं जवाब माँग रहा हूँ। सही है या गलत? जब तक संभव हो तब तक ऐसा नहीं होना चाहिए, फिर भी यदि तुझसे ऐसा कुछ हो जाए, तब सभी समझ जाएँगे कि ‘यह ऐसा नहीं कर सकता।’
माता-पिता को खुश रखना। वे तुझे खुश रखने के प्रयत्न करते हैं या नहीं? क्या उन्हें तुझे खुश रखने की इच्छा नहीं है?

प्रश्नकर्ता: हाँ, किन्तु दादाजी, हमें ऐसा लगता है कि उन्हें किच-किच करने की आदत हो गई है।

दादाश्री: हाँ, लेकिन उसमें तेरी भूल है, इसलिए माता-पिता को जो दु:ख हुआ, उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। उन्हें दु:ख नहीं होना चाहिए, ‘मैं सुख देने आई हूँ’ ऐसा आपके मन में होना चाहिए। ‘मेरी ऐसी क्या भूल हुई की माता-पिता को दु:ख हुआ’ उन्हें ऐसा लगना चाहिए।

पिताजी बुरे नहीं लगते? ऐसे लगेंगे तब क्या करेगी? सच में बुरे जैसा इस दुनिया में कुछ है ही नहीं। जो कुछ भी हमें मिला, वे सभी अच्छी चीज़ें होती हैं क्योंकि हमारे प्रारब्ध से मिली हैं। माँ मिली, वह भी अच्छी। कैसी भी काली-कलूटी हो, फिर भी अपनी माँ ही अच्छी। क्योंकि हमें प्रारब्ध से हमें जो मिली वह अच्छी। क्या बदलकर दूसरी ला सकते हैं?

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