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क्या भगवान ब्रह्मांड के मालिक हैं? हम जीवन में बंधन मुक्त कैसे हो सकते हैं? हमें मोक्ष कैसे मिलेगा?

ब्रह्मांड का मालिक कौन?

इस ब्रह्मांड का, हर एक जीव ब्रह्मांड का मालिक है। केवल खुद का भान नहीं है, इसीलिए जीव की तरह रहता है। खुद की देह की मालिकी का जिसे दावा नहीं है, वह पूरे ब्रह्मांड का मालिक बन गया। यह जगत् अपनी मालिकी का है, ऐसा समझ में आ जाए, वही मोक्ष! अभी तक क्यों ऐसा समझ में नहीं आया है? क्योंकि अपनी ही भूलों ने बाँधा हुआ है, इसलिए। पूरा जगत् अपनी ही मालिकी का है। कोई हमें गाली दे तो वह इसलिए कि खाते में कुछ बाकी होगा, तो उसे जमा कर लेना। अब फिर से कौन व्यापार शुरू करे? जमा कर लेंगे तो व्यापार बंद होता जाएगा और उसके बाद फिर अच्छा माल आएगा।

यह आँख हाथ से दब जाए तो एक चीज़ हो, तो दो दिखाई देने लगती हैं। आँख, आत्मा का रियल स्वरूप नहीं है। वह तो रिलेटिव स्वरूप है। फिर भी, एक भूल होने से एक के बदले दो दिखने लगती हैं न? ये काँच के टुकड़े जमीन पर पड़े हों तो कितनी सारी आँखें दिखती हैं? इस आँख की ज़रा सी भूल से कितनी सारी आँखें दिखती हैं? वैसे ही यह आत्मा खुद नहीं दबता, लेकिन संयोगों के प्रेशर (दबाव) से एक के अनंत रूप दिखते हैं। यह पूरा जगत् भगवत् स्वरूप है। इस पेड़ को काटने का मात्र भाव ही करें तो भी कर्म चिपकें ऐसा है। सामनेवाले के बारे में ज़रा सा भी खराब सोचा तो पाप लगता है और अच्छा भाव करे, तो पुण्य मिलता है। मन में भाव बिगड़ें, वह भी खुद की भूल। यहाँ सत्संग में आएँ और यहाँ लोग खड़े हों, तो अगर लगे कि ये सब क्यों खड़े हैं? उससे मन में भाव बिगड़ा। उस भूल के लिए, उसका तुरंत ही प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।

पहले ‘क्रमिक’ मार्ग में आप तप-त्याग करते थे, फिर भी खुद की भूलें नहीं दिखती थीं। अब यह ‘अक्रम’ मार्ग प्राप्त किया है तो काम निकाल लो। यह तो साहब के पास जाता है और कहता है, ‘साहब मुझे छुड़वाइए, साहब मुझे छुड़वाइए।’ लेकिन साहब खुद ही बंधा हुआ है वह कैसे तुझे छुड़वाएगा? आजकल तो ये जो ट्रिकें करते हैं, कपट करते हैं, कपट से बंधा हुआ, वह कब छूटेगा? कोई बाप भी बाँधनेवाला नहीं है। होता तो भक्ति से गिड़गिड़ाए, मा़फी माँगे, तो भी साहब छोड़ देंगे, लेकिन नहीं, ऐसा नहीं है, वह तो ‘खुद’ की भूल से ही ‘खुद’ बंधा हुआ है। ‘ज्ञानीपुरुष’ अँगुलीनिर्देश करते हैं कि ऐसा करो तो भूल मिटेगी, या फिर ‘ज्ञानीपुरुष’ की आज्ञा का पालन करे तो काम हो जाए!

भगवान ने क्या कहा था कि, ‘खुद किससे बंधा हुआ है? मात्र चले आ रहे बैर से बंधा हुआ है।’ उसी से जगत् चला आ रहा है। कन्टिन्युअस (लगातार) बैर से ही गुत्थियाँ डाली हैं। यह तो वापस बैर का पक्ष लेता है, वही फिर अगले जन्म में आता है और गुत्थियाँ सुलझाने के बजाय उस समय दूसरी पाँच नई डालता जाता है!

लोग मानते हैं कि भगवान ऊपरी हैं, इसलिए उनकी भक्ति करेंगे तो छूट जाएँगे। लेकिन नहीं, कोई बाप भीऊपरीनहीं है। तू ही तेराऊपरी, तेरा रक्षक भी तू ही है और तेरा भक्षक भी तू ही है। यू आर होल एन्ड सोल रिस्पोन्सिबल फोर योरसेल्फ। खुद ही खुद काऊपरीहै। इसमें और कोई बाप भी द़खल नहीं करता है। हमारा बॉस है वह भी अपनी भूल के कारण और अन्डरहैन्ड है वह भी अपनी भूल के कारण ही है। इसलिए भूल मिटानी पड़ेगी न?

खुद की ही भूल है, ऐसा यदि समझ में नहीं आए तो अगले जन्म का बीज पड़ता है। यह तो हम टोकते हैं, फिर भी यदि नहीं चेते तो क्या हो? और अपनी भूल नहीं हो तो अंदर ज़रा सा भी बखेड़ा नहीं होता। हम निर्मल दृष्टि से देखें तो जगत् निर्मल दिखता है और हम टेढ़ा देखें तो जगत् टेढ़ा दिखता है। इसलिए पहले खुद की दृष्टि निर्मल करो।

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