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क्या भगवान ने ये दुनिया बनाई हैं?

संसार सर्जन

दादाश्री: इस संसार का सर्जन किस ने किया होगा?

प्रश्नकर्ता: (सोचता है)....

दादाश्री: तेरी कल्पना में जो है सो बता दे। हम यहाँ कहाँ किसी को फेल करने बैठे हैं?

प्रश्नकर्ता: भगवान ने बनाया होगा।

दादाश्री: भगवान के बच्चे कहाँ कुँवारे रह गए थे, जो उन्हें यह सब बनाना पड़ा? वे शादीशुदा है या कुँवारे? उनका पता क्या है?

मोक्ष होता होगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता: मोक्ष तो है ही न?

दादाश्री: यदि भगवान बनानेवाले हों और मोक्ष हो, तो वह संपूर्ण विरोधाभास है।

प्रश्नकर्ता: दादाजी, यह विरोधाभास कैसे?

दादाश्री: यदि भगवान ऊपरी होते और यदि वे ही मोक्ष में ले जानेवाले होते, तो जब वे कहें कि उठ यहाँ से, तो आपको तुरंत उठना पडे़गा। वह मोक्ष कैसे कहलाएगा? मोक्ष अर्थात संपूर्ण स्वतंत्रता। कोईऊपरीनहीं और कोई अन्डरहैन्ड भी नहीं।

संसार एक पहेली

यदि तुझे फैक्ट जानना है, तो मैं तुझे वह बताऊँ। जो ३६० डिग्रीयों का स्वीकार करे, उसे ज्ञान कहते हैं। हम सभी ३६० डिग्रियों को मान्य करते हैं, इसलिए हम ज्ञानी हैं। क्योंकि हम सेन्टर में बैठे हैं और इस कारण से हम फैक्ट बता सकते हैं। फैक्ट यह है कि गॉड इज नॉट एट ऑल क्रिएटर ऑफ दिस वर्ल्ड। यह संसार किसी ने बनाया ही नहीं है। तो बना कैसे? ‘दी वर्ल्ड इज़ द पज़ल इटसेल्फ’ (संसार अपने आप में एक पहेली है।) पज़लसम हो गया है इसलिए पज़ल कहना पड़ता है। बाकी तो संसार अपने आप बना है। और यह हमने अपने ज्ञान में खुद देखा है। इस संसार का एक भी परमाणु ऐसा नहीं है कि जिसमें मैं विचरा नहीं हूँ। संसार में रहकर और उसके बाहर रहकर मैं यह कह रहा हूँ।

यह पज़ल (पहेली) जो सॉल्व (हल) करे, उसे परमात्मा पद की डिग्री मिलती है और जो सॉल्व नहीं कर पाते, वे पज़ल में डिज़ोल्व हो चुके हैं। हम यह पज़ल सॉल्व करके बैठे हैं तथा परमात्मा पद की डिग्री प्राप्त की है। हमें यह चेतन और अचेतन दोनों भिन्न दिखते हैं। जिसे भिन्न नहीं दिखते वह खुद ही उसमें डिज़ोल्व हो चुका है।

क्रिएटर भगवान है नहीं, था नहीं और होगा नहीं। क्रिएटर का अर्थ क्या होता है? क्रिएटर का अर्थ कुम्हार होता है, उसे तो मेहनत करनी पड़ती है। भगवान क्या कोई मेहनती होंगे? अहमदाबाद के ये सेठ लोग बिना मेहनत के चार-चार मिलों के मालिक बने फिरते हैं, फिर भगवान तो मेहनत करते होंगे? मेहनती यानी मजदूर। भगवान वैसा नहीं है। यदि भगवान सबको गढ़ने बैठता, तो सभी के चेहरे एक समान होने चाहिए। जैसे एक ही डाई से बने हों, लेकिन ऐसा नहीं है। यदि भगवान को निष्पक्ष कहें, तो फिर एक इंसान जन्म से ही फुटपाथ पर और दूसरा महल में क्यों?

फिर यह सब किस प्रकार चल रहा है, इसका मैं आपको एक वाक्य में उत्तर देता हूँ, आप विस्तार से खोज लेना। यह संसार साइंटिफिक सरकमस्टेन्शियल एविडन्स से चल रहा है। जिसे हम ‘व्यवस्थित शक्ति’ कहते हैं, जो सभी को व्यवस्थित ही रखती है! चलानेवाला कोई बाप भी ऊपर नहीं बैठा है। सबेरे आप जागते हो या जागना हो जाता है?

प्रश्नकर्ता: वह तो मैं ही उठता हूँ न?

दादाश्री: कभी ऐसा नहीं होता कि सोना है फिर भी सो नहीं पाते? सुबह चार बजे जागना हो तब अलार्म क्यों लगाते हो? निश्चय किया हो कि पाँच बजकर दस मिनट पर उठना हो, तो ठीक समय पर उठ ही जाना चाहिए। ऐसा होता है क्या?

‘व्यवस्थित’शक्ति

खुद जहाँ नहीं करता है, वहाँ पर आरोपण करता है कि ‘मैंने किया’। इसे सिद्धांत कैसे कहेंगे? यह तो विरोधाभास है। तो जगाता कौन है आपको? ‘व्यवस्थित’ नाम की शक्ति आपको जगाती है। ये सूर्य, चंद्र, तारे सभी ‘व्यवस्थित’ के नियम के आधार पर चलते हैं। ये सारी मिलें धुएँ के बादल छोड़ती ही रहती हैं और ‘व्यवस्थित शक्ति’ उन्हें बिखराकर वातावरण को स्वच्छ कर देती है और सबकुछ ‘व्यवस्थित’ कर देती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो अहमदाबाद के लोग कब से ही घुटकर मर चुके होते। यह जो बरसात होती है, तो वहाँ ऊपर पानी बनाने कौन जाता है? वह तो नैचुरल एडजस्टमेन्ट (कुदरती प्रकिया) से होता है। दो ‘H’ (हाईड्रोजन) और एक ‘O (ऑक्सीजन)’ के परमाणु इकट्ठे होते हैं और दूसरे कितने ही संयोग जैसे कि हवा आदि के मेल से पानी बनता है और बरसात के रूप में बरसता है। वैज्ञानिक क्या कहता है? ‘देख, मैं पानी का मेकर (बनानेवाला) हूँ।’ अरे! मैं तुझे दो ‘H’ के परमाणु के बजाय एक ही ‘H’ का परमाणु देता हूँ, अब बना पानी। तब वह कहेगा, ‘नहीं, वैसे तो कैसे बन पाएगा?’ अरे! तू भी इनमें से एक एविडेन्स है। तू कैसा मेकर? इस संसार में कोई ‘मेकर’ है ही नहीं, कोई कर्ता है ही नहीं, निमित्त हैं। भगवान भी कर्ता नहीं हैं। कर्ता बने, तो भोक्ता बनना पड़ेगा न! भगवान तो ज्ञाता-दृष्टा और परमानंदी हैं। खुद के अपार सुख में ही मगन रहते हैं।

 

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