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आत्महत्या का विचार क्यों पैदा होता है? आत्महत्या का मूल कारण क्या है?

विकल्प बिना जीया नहीं जाता

प्रश्नकर्ता: आत्महत्या के विचार क्यों आते होंगे?

दादाश्री: वह तो भीतर विकल्प खतम हो जाते हैं इसलिए। यह तो विकल्प के आधार पर जीया जाता है। विकल्प समाप्त हो जाएँ, फिर अब क्या करना, उसका कोई दर्शन दिखता नहीं है, इसलिए फिर आत्महत्या करने की सोचता है। इसलिए ये विकल्प भी काम के ही हैं।

सहज विचार बंद हो जाएँ, तब ये सब उलटे विचार आते हैं। विकल्प बंद हों इसलिए जो सहज विचार आते हों, वे भी बंद हो जाते हैं। अँधेरा घोर हो जाता है। फिर कुछ दिखता नहीं है! संकल्प अर्थात् ‘मेरा’ और विकल्प अर्थात् ‘मैं’। वे दोनों बंद हो जाएँ, तब मर जाने के विचार आते हैं।

आत्महत्या के कारण

प्रश्नकर्ता: वह जो उसे वृत्ति हुई, आत्महत्या करने की उसका रूट (मूल) क्या है?

दादाश्री: आत्महत्या का रूट तो ऐसा होता है कि उसने किसी जन्म में आत्महत्या की हो तो उसके प्रतिघोष सात जन्मों तक रहा करते हैं। जैसे एक गेंद डालें न हम, तीन फीट ऊपर से डालें, तो अपने आप दूसरी बार ढाई फीट उछलकर वापस गिरेगी। फिर एक फुट उछलकर गिरे वापस, ऐसा होता है कि नहीं? तीन फीट पूरा नही उछलती, पर अपने स्वभाव से ढाई फीट उछलकर वापस गिरती है, तीसरी बार दो फीट उछलकर वापस गिरती है, चौथी बार डेढ़ फीट उछलकर वापिस गीरती है। फिर एक फुट उछलकर गिरती है। ऐसा उसका गति का नियम होता है। ऐसे कुदरत के भी नियम होते हैं। वह ये आत्महत्या करें, तो सात जन्म तक आत्महत्या करनी ही पड़ती है। अब उसमें कम-ज्यादा परिणाम से आत्महत्या हमें पूर्ण ही दिखती है, मगर परिणाम कम तीव्रतावाले होते हैं और कम होते-होते, परिणाम खतम हो जाते हैं।

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