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क्या ज्ञान प्राप्ति का आनंद इसी जन्म तक सीमित है?

प्रश्नकर्ता : मात्र यह सनातन शांति प्राप्त करे तो वह इस जन्म के लिए ही होती है या जन्मों जन्म की होती है?

दादाश्री : नहीं। वह तो परमानेन्ट हो गई, वह तो। फिर कर्त्ता ही नहीं रहा, इसलिए कर्म बंधते नहीं। एकाध अवतार में या दो अवतारों में मोक्ष होता ही है, छुटकारा ही नहीं है, चलता ही नहीं है। जिसे मोक्ष में नहीं जाना हो, उसे यह धंधा ही करना नहीं चाहिए। यह लाइन में पड़ना ही नहीं। जिसे मोक्ष नहीं पसंद हो, तो इस लाइन में पड़ना ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : यह सब 'ज्ञान' है, वह दूसरे जन्म में जाए, तब याद रहता है क्या?

दादाश्री : सब उसी रूप में होगा। बदलेगा ही नहीं। क्योंकि कर्म बंधते नहीं, इसलिए फिर उलझनें ही खड़ी नहीं होतीं न!

प्रश्नकर्ता : तो इसका अर्थ ऐसा हुआ कि हमारे गत जन्म के ऐसे कर्म होते हैं, जिन्हें लेकर गुत्थियाँ ही चलती रहती हैं?

दादाश्री : पिछले अवतार में अज्ञानता से कर्म बंधे, उन कर्मों का यह इफेक्ट है अब। इफेक्ट भोगने पड़ते हैं। इफेक्ट भोगते-भोगते, फिर यदि ज्ञानी मिले नहीं, तो फिर से नये कॉज़ेज़ और परिणाम स्वरूप नये इफेक्ट खड़े होते रहते हैं। इफेक्ट में से फिर कॉज़ेज़ उत्पन्न होते ही रहेंगे और वे कॉज़ेज़ फिर अगले जन्म में इफेक्ट होंगे। कॉज़ेज़ एन्ड इफेक्ट, इफेक्ट एन्ड कॉज़ेज़, कॉज़ेज़ एन्ड इफेक्ट, इफेक्ट एन्ड कॉज़ेज़, कॉज़ेज़ एन्ड इफेक्ट वह चलता ही रहता है। इसलिए ज्ञानी पुरुष जब कॉज़ेज़ बंद कर देते हैं, तब सिर्फ इफेक्ट ही भुगतने का रहा। इसलिए कर्म बंधने बंद हो गए।

इसलिए, सब 'ज्ञान' सब याद रहता ही है, इतना ही नहीं, लेकिन खुद वह स्वरूप ही हो जाता है। फिर तो मरने का भी भय नहीं लगता। किसी का भय नहीं लगता, निर्भयता होती है।

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