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पुष्टिमार्ग का उद्देश्य क्या है? श्री कृष्ण भगवान को नैष्ठिक ब्रह्मचारी क्यों कहा गया है?

पुष्टिमार्ग क्या है?

वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग निकाला। पाँच सौ सालों पहले जब मुसलमानों का बहुत कहर था, अपने यहाँ की स्त्रियाँ मंदिर में या बाहर कहीं भी नहीं निकल सकती थीं, हिन्दू धर्म खत्म होने की कगार पर आ गया था, तब वल्लभाचार्य ने काल के अनुरूप धर्म को पुष्टि दी, तो घर बैठे भक्ति की जा सके ऐसा मार्ग दिया, लेकिन वह धर्म तो उस काल के लिए ही था इसलए पाँच सौ साल तक ही रहेगा वे खुद ही ऐसा कहकर गए, और आज वे पूरे हो रहे हैं। अब आत्मधर्म प्रकाश में आएगा।

कविराज ने गाया है कि,

‘मुरलीना पडघे झूमी जमुना बोली,

श्री कृष्णना प्रकाशक आवी गया छे।’

कृष्ण तो गज़ब के पुरुष हो चुके हैं, वासुदेव थे और अगली चौबीसी में तीर्थंकर बनेंगे। कृष्ण तो नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे।

प्रश्नकर्ता: नैष्ठिक ब्रह्मचारी मतलब क्या?

दादाश्री: जिनके भाव में निरंतर ब्रह्मचर्य की ही निष्ठा है, वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाते हैं! डिस्चार्ज हो रहा अब्रह्मचर्य है और चार्ज हो रहा है अखंड ब्रह्मचर्य! कृष्ण भगवान की सोलह हजार रानियाँ थीं, फिर भी वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। ऐसा कैसे हैं, वह आपको समझाता हूँ। एक व्यक्ति चोरी करता है, लेकिन अंदर उसके भाव में निरंतर ऐसा रहा करता है कि, ‘चोरी नहीं करनी है,’ तो वह नैष्ठिक अचौर्य कहलाता है। ‘क्या चार्ज हो रहा है?’ वही उसका हिसाब है! एक व्यक्ति दान देता है और मन में रहता है कि, ‘कैसे इन लोगों से छीन लूँ,’ तो वह दान नहीं माना जाएगा। इन इन्द्रियों से जो प्रत्यक्ष दिखता है, नया बाँधने के लिए उसे नहीं माना जाता, लेकिन अंदर नया हिसाब क्या बाँध रहा है, जो चार्ज हो रहा है, वह माना जाता है!

प्रश्नकर्ता: तो फिर कृष्ण भगवान को चारित्रवान क्यों कहा है?

दादाश्री: वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। बल्कि, उनके चारित्र को दुष्चारित्र कहने से निंदा हुई है। कृष्ण तो वासुदेव थे। वासुदेव मतलब क्या? कि जो सभी चीज़ों के भोक्ता, लेकिन मोक्ष के अधिकारी होते हैं, गज़ब के पुरुष होते हैं!

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