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जीव-जंतु और जानवरों का भय कैसे दूर करें?

ज़्यादातर लोगों को जीव-जंतु जैसे कि, छिपकली, तिलचट्टा, बिच्छू या साँप से डर लगता है। अगर दीवार पर छिपकली चल रही हो, तो "छिपकली मेरे ऊपर गिरेगी तो?", "तिलचट्टा उड़कर मेरे पास आएगा तो?" ऐसा डर हमेशा बना रहता है। खेतों या झाड़ियों में से गुजरना हो या जंगल में कैंपिंग करनी हो, तो वहाँ साँप या बिच्छू आ जाएँगे ऐसा डर लगता है। कुछ जीव-जंतु जहरीले होते हैं और उनके डंक मारने से मृत्यु हो सकती है, इस समझ से उनके प्रति भय होना स्वाभाविक है। लेकिन कई बार बिच्छू या साँप को फ़ोटो में या टेलीविज़न में देखने से भी डर लगता है। इसी तरह, बाघ और शेर जैसे हिंसक जानवरों का डर भी हर एक को होता ही है। ऐसे भय को कैसे दूर करें, इसकी समझ यहाँ स्पष्ट होती है।

परम पूज्य दादा भगवान कहते हैं, "जिसका तिरस्कार करोगे, उससे भय लगेगा। साँप के, बाघ के प्रति तिरस्कार है इसलिए उनसे भय लगता है। साँप से चिढ़ है, छिपकली से चिढ़ है। यदि छिपकली पर चिढ़ चढ़ी हो न तो भय लगेगा और चिढ़ न चढ़ी हो, तो भय नहीं लगेगा।"

भय के पीछे चिढ़, द्वेष और तिरस्कार छुपे हुए हैं, यह मौलिक बात परम पूज्य दादा भगवान से ही हमें मिलती है। ऐसे भय के पीछे सचमुच मूल में क्या काम करता है इसका कारण वे हमें यहाँ स्पष्ट करते हैं।

प्रश्नकर्ता: तिलचट्टे का भय बहुत लगता है सभी को।

दादाश्री: हाँ, तिलचट्टे का भय लगे इतना ही नहीं, ये बाघ-शेर सभी का भय लगता है। "ये मुझे नुकसान पहुँचा रहे हैं और मार मार डालेंगे," ऐसा भय घुस गया है, लेकिन ऐसा भय रखने की कोई ज़रूरत नहीं है।

कोई खराब है, ऐसा माना तभी से भय बैठा। कई लोग तो, ‘अरे, छिपकली आई, छिपकली आई’ करें, तो उन्हें इससे डर लगता है। इसलिए, वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ उन्हें छिपकली ही दिखती है। अरे, वह में क्या बुराई थी? छिपकली तो अच्छी थी। ऐसा बेवजह का भय किस काम का? एक व्यक्ति तो आधे घंटे तक टॉयलेट ही नहीं गया। मैंने कहा, ‘क्यों आप बैठे हुए हैं?’ बाद में, टॉयलेट में जाकर वापस आए तो पूछा,  तब उसने कहा, “अंदर छिपकली है, वह खिसक नहीं रही है।” अब, यह सब मैंने पार किया है। मैं इन सभी भय को पार करते-करते आगे बढ़ा हूँ।

भय का कारण चिढ़ और तिरस्कार है। इस कारण का ही निवारण हो जाए, तो भय भी दूर हो जाता है। चिढ़ को कैसे समाप्त करें, उसका उपाय भी हमें परम पूज्य दादाश्री बताते हैं। किसी के प्रति निरंतर "बहुत खराब है, खराब है", ऐसे भाव करते रहें, तो उसके प्रति चिढ़ उत्पन्न होती है। फिर उसी जगह "बहुत अच्छा है, अच्छा है।" ऐसा करें तो चिढ़ समाप्त हो जाती है। इस चाबी का व्यावहारिक रूप से उपयोग करके, हमें भय के दूर होने का अनुभव हो सकता है।

मनुष्य भय के कारण तिलचट्टे, छिपकली, बिच्छू, साँप आदि जीव-जंतुओं को मार डालते हैं। कुछ तो साँप को देखते ही घबराहट के कारण बेहोश हो जाते हैं। लेकिन सच में देखने जाएँ, तो दुनिया में ९५ से ९८ प्रतिशत साँप जहरीले नहीं होते हैं। इसलिए बेवजह के डर से प्रेरित होकर उन्हें मारना नहीं चाहिए। बल्कि, उन्हें संभाल कर कहीं और छोड़ देना चाहिए। सच्चा नियम यह है, कि हम जीव-जंतुओं को मार डालने का भाव करेंगे, तो वे हमें नुकसान पहुँचाएँगे। हरएक जीव में आखिरकार आत्मा तो है ही। हम जानवरों या जीव-जंतुओं के भीतर विराजमान आत्मा से, भगवान से प्रार्थना करके कहें, "हे भगवान! आप सुख-शांति में रहें। मुझे आपको दुःख नहीं देना है। मुझे किसी की हिंसा नहीं करनी है।" ऐसे भाव होंगे तो हमें भी कोई कठिनाई नहीं आएगी।

कुछ लोगों को कुत्ते भौंकते हों, उस गली से गुजरने में डर लगता है। रास्ते में गुजरते हुए लोगों पर कुत्तों के भौंकने का कारण यह है, कि उन्हें खुद को ऐसा भय लगता है कि 'ये मनुष्य लोग हमें नुकसान पहुँचाएँगे’। ऐसे समय में कुत्तों के सामने कोई प्रतिक्रिया करने जाओ, तो वह अपने बचाव के लिए हमें काट लेते हैं। अन्यथा, अधिकतर कुत्ते अंदर-अंदर दूसरे कुत्तों पर ही भौंकते रहते हैं। तब हमें डरना नहीं चाहिए, कोई भी प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए और शांति से वहाँ से चले जाना चाहिए। कुत्ते को आत्मा रूप से देखें, तो वे भी समझ जाते हैं कि ये लोग प्रेमवाले हैं और भौंकना बंद कर देतें हैं।

जानवरों को आत्मा रूप में देखने की यथार्थ दृष्टि अगर विकसित हो जाएँ, तो भय तो दूर होता ही है, बल्कि इसका कितना अद्भुत परिणाम आ सकता है, यह हमें यहाँ परम पूज्य दादा भगवान की वाणी से जानने को मिलता है।

प्रश्नकर्ता: आप्तसूत्र में है न कि ‘यदि आप बाघ का प्रतिक्रमण करते हो तो बाघ भी उसका हिंसक भाव भूल जाता है’, तो वह क्या है?

दादाश्री: हाँ, बाघ अपना हिंसक भाव भूल जाता है यानी यहाँ पर अपना भय छूट जाता है।

प्रश्नकर्ता: अपना भय छूट जाता है वह ठीक है, लेकिन उसके आत्मा को कुछ होता है या नहीं?

दादाश्री: कुछ भी नहीं होता। अपना भय छूटा कि वह छूट गया।

प्रश्नकर्ता: लेकिन उसका हिंसक भाव चला जाता है, ऐसा आपने कहा न?

दादाश्री: हिंसक भाव चला जाता है।

प्रश्नकर्ता: वह कैसे जाता है?

दादाश्री: अपना भय छूट गया कि हिंसक भाव चला जाता है।

प्रश्नकर्ता: तो उसका अर्थ यह हुआ न, कि उसके आत्मा को असर पहुँचा?

दादाश्री: आत्मा को सीधा असर होता है। आत्मा को तो असर होता ही है। असर पहुँचता है सारा।

यदि बाघ के प्रतिक्रमण करेंगे तो बाघ भी अपने कहे अनुसार काम करेगा। बाघ में और मनुष्य में कुछ फर्क नहीं है। फर्क आपके स्पंदनों का है। जिसका उसे असर होता है। जब तक ऐसा आपके मन में ध्यान रहे बाघ हिंसक है तब तक वह हिंसक ही रहेगा और यदि ऐसा ध्यान रहे कि बाघ शुद्धात्मा है तो वह शुद्धात्मा ही है और अहिंसक हो जाएगा। सब हो सकता है।

(यहाँ प्रतिक्रमण अर्थात् किसी भी दोष के लिए सामने वाले के अंदर विराजमान भगवान के सामने अपनी गलती स्वीकार करके उसकी माफी माँगना और वह गलती दोबारा न हो ऐसा निश्चय करना।)

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