हम रात में कोई हॉरर मूवी (भूत की मूवी) देखकर या भूत की कहानी सुनकर सो गए हों। ऊपर से उस रात हम घर में अकेले हों, बाकी सब बाहर गए हों। ऐसे में रसोई में कुछ खड़खड़ाने की आवाज आए, तो हमारे मन में क्या विचार आता है? “कोई भूत आया होगा!” और फिर पूरी रात डर बना रहता है। डर के मारे लेटे रहना पड़ता है, उठने की भी हिम्मत नहीं होती। फिर सुबह उठकर जब रसोई में जाते है, तो पता चलता है कि वहाँ तो किसी चूहे ने कप गिरा दिया है। तब सारा भय चला जाता है। इसलिए, ये सभी डर हमारी कल्पना के होते हैं, वास्तविकता में भूत नहीं होता।
कुछ लोगों को अँधेरे से डर लगता है या रात में भूत आ जाएगा तो? इसलिए, वे सिर ढककर सोते हैं। अरे, लेकिन क्या सिर ढकने से भूत होगा, तो आने से रुक जाएगा? कुछ लोग कहते हैं कि रास्ते में डायन देखी थी, इसलिए अब मैं उस रास्ते से कभी नहीं गुजरूँगा। कई लोगों को रात में अकेले रास्ते में चलते हुए भय लगता है कि कोई भूत पीछे से आएगा और गला दबा देगा तो? लेकिन अगर वास्तव में विचार करें, तो क्या कोई अब तक आया है? यह बस मन में भय की ग्रंथि ही बंध गई है। ये सब कल्पनाएँ हैं, सत्य नहीं है। अगर एक बार हमारी कल्पना के अनुसार न हुआ हो, कुछ हुआ ही न हो, तो फिर हमेशा के लिए मान लेना चाहिए कि कुछ होने वाला नहीं है। हक़ीक़त में भूत नहीं होते हैं। लेकिन अगर एक बार भी शंका हो जाए कि "कुछ होगा तो?" फिर भय लगता रहता है। कल्पना के भय को वास्तविकता से तोड़ देना चाहिए या अपने विचारों की दिशा बदल देनी चाहिए। फिर भी, कल्पना का बहुत भय लगे तो जिस भगवान में श्रद्धा हो उन्हें याद करके कहना, कि मेरे साथ में ही रहना।
वास्तविकता में, देवगति के कुछ जीव हैं, जिनका नाम भूत है। वे मनुष्यों को परेशान करने कभी भी नहीं आते, बल्कि उल्टा मनुष्यों की मदद करें, ऐसे हैं। उनकी किसी के साथ दुश्मनी, पक्षपात या भेदभाव नहीं होता। परम पूज्य दादा भगवान लौकिक मान्यता से अलग ही समझ देते हुए कहते हैं, “भूत बनना कुछ आसान नहीं है। भूत तो देवगति का अवतार है, वह आसान चीज़ नहीं है। भूत तो यहाँ पर कठोर तप किए हों, अज्ञान तप किए हों, तब भूत होता है, जब कि प्रेत अलग चीज़ हैं।“ इसलिए चलते-फिरते भूत आ जाएगा, ऐसा भय रखने की कोई ज़रूरत नहीं है।
समाज में भूत-प्रेत, डायन, पिशाच, चुड़ैल, काली विद्या, तांत्रिक आदि के विषय में घर-घर बातें होती रहती हैं। लेकिन ये सब बिल्कुल समझे बगैर की गई बातें हैं। हमने पहले बात की उसके अनुसार भूत तो व्यंतर देव कहलाते हैं, वे बेवजह किसी को परेशान नहीं करते। जबकि प्रेत, पिशाच ये सभी अवगति वाले जीव हैं। अवगति वाले जीव अर्थात् जिसे मृत्यु के बाद तुरंत दूसरा शरीर नहीं मिलता और उसे कुछ वर्षों तक बिना शरीर के रहना पड़ता है। प्रेत के अस्तित्व की बात गलत नहीं है, लेकिन समाज में इसकी अतिशयोक्ति होने से भय व्याप्त हो गया है।
ऐसा नियम है, कि जब जीव शरीर छोड़कर जाता है तब स्थूल देह की मृत्यु हो जाती है और आत्मा शरीर से निकलती है। जैसे साँप एक बिल से निकलकर दूसरे बिल में प्रवेश करता है, उसी प्रकार आत्मा एक शरीर से निकलकर तुरंत ही माता के रज और पिता के वीर्य के मिलन के समय गर्भ में प्रवेश करती है। वीर्य के जीवों का आयुष्यकाल बहुत छोटा होता है। इसमें कभी-कभी ऐसा होता है कि मृत्यु के समय यदि व्यक्ति का चित्त कहीं जकड़ा हुआ हो, जीव कहीं अटक गया हो, तो दूसरे शरीर में जाने का यह समय वह चूक जाता है। लेकिन, इस तरफ स्थूल देह की तो मृत्यु हो चुकी होती है, इसलिए उसमें वापस नहीं जाया जा सकता। इसलिए, उस जीव को कुछ समय बिना शरीर के रहना पड़ता है। तब उसे अवगति वाले जीव, भटकती आत्मा या प्रेतात्मा कहा जाता है। प्रेत का स्थूल शरीर नहीं होता, वह खा-पी नहीं सकता, इसलिए जिसके साथ हिसाब बंधा हो, उस व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करने के बाद वह भोजन लेता है, जिनमें से कुछ तो पचास-पचास लड्डू और पूरियाँ सब कुछ खा जाते हैं। लेकिन ऐसा लाखों में एक बार ही होता है। इसके अलावा, अवगति वाला जीव बिना शरीर के दस या बारह वर्षों से अधिक नहीं रह सकता। यह सब वास्तविकता नहीं जानने से दुनिया में लोग जगह-जगह प्रेतात्मा या भटकती आत्मा के होने का अनुमान लगाकर भयभीत होते हैं। प्रेत के साए से घबराने की कोई वजह नहीं है।
परम पूज्य दादा भगवान यहाँ प्रेत के भय से मुक्त होने की समझ प्रदान करते हैं।
प्रश्नकर्ता: ये अवगति वाले जीव दूसरे में जाते हैं और खुद की इच्छा पूरी करते हैं वह क्या है?
दादाश्री: ऐसा है, ये भूत परेशान नहीं करते। भूत तो देवयोनि वाले होते हैं। उनके साथ आपका अच्छा ऋणानुबंध हो तो फायदा कर देते हैं, और उल्टा हो तो परेशान कर देते हैं। और जिन जीवों को मृत्यु के बाद तुरन्त ही दूसरी स्थूल देह नहीं मिलती, उन्हें फिर भटकते रहना पड़ता है। जब तक दूसरी देह नहीं मिले तब तक प्रेतयोनि कहलाती है। अब खुराक के बिना तो चलता नहीं, इसलिए उसे किसी और के देह में घुसकर खुराक लेनी पड़ती है।
प्रश्नकर्ता: कोई जप-तप, माला ऐसा-वैसा करते हों, फिर भी उन्हें भूत लग सकते हैं?
दादाश्री: ऐसा नियम नहीं है, परन्तु आपका हिसाब हो, आपने किसीको परेशान किया हो और वही जीव अवगति वाला हो जाए तो वह आपसे बदला लिए बगैर रहेगा ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: कोई हनुमान चालीसा, गायत्री या दूसरा कोई जप कर रहा हो, तो उसका क्या असर होता है उस पर?
दादाश्री: हाँ, उससे फायदा होता है। उससे वे दूर रहते हैं। यह नवकार मंत्र भी यदि पद्धतिपूर्वक बोले तो भी वे हट जाएँगे।
लाखों में कोई एक ही प्रेतात्मा होती है, बाकी ज्यादातर केस में प्रेत की तुलना में साइकोलॉजिकल (मानसिक) असर अधिक होता है, और उनमें से कई लोग तो मनोचिकित्सक के पास जाकर ठीक भी हो जाते हैं। सभी प्रेत नुकसान पहुँचाने वाले भी नहीं होते। जैसा कि परम पूज्य दादाश्री ने कहा, जहाँ उनका बहुत राग का हिसाब हो, वहाँ सुख देकर जाते हैं और जहाँ बहुत द्वेष का हिसाब हो, वहाँ दुःख देकर जाते हैं। हमारे राग-द्वेष का हिसाब हो, तो ही प्रेत योनी के जीव हमें सुख या दुःख दे सकते हैं। यदि हमारा कोई अपराध न हो, तो उनकी स्वतंत्र शक्ति नहीं है कि वे हमें दुःख दे सकें। इसलिए, जिन जीवों को हमने सताया हो, जिनके साथ राग-द्वेष किया हो, उन सभी के पश्चाताप करके माफी माँग लें, तो उनके वैर से मुक्त हुआ जा सकता है।
समाज में ऐसी मान्यताएँ प्रचलित हैं कि जब माताजी शरीर में प्रवेश करती हैं, तब व्यक्ति झूमने लगता है। बाद में ओझा और तांत्रिकों के यहाँ धक्के खाकर हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद भी माताजी का आना बंद नहीं होता। लेकिन हकीकत तो यह है, कि अंबा माताजी, बहुचरा माताजी, दुर्गा माता, महाकाली माता ये सभी अत्यंत उच्च कोटि की सात्विक देवियाँ हैं। वे ऐसे किसी साधारण मनुष्य के शरीर में नहीं आते। हाँ, किसी व्यक्ति की पूर्वजन्म की साधना हो, मन-वचन-काया के एकात्म योग से भावनाएँ की हों, तो उनको माताजी आकर कोई संदेश दे जाती हैं। लेकिन उसमें बहुत अलौकिक बातें होती हैं, लौकिक बातें नहीं होती।
तार्किक रूप से हम खुद ही जाँच करें कि जिस महिला या स्त्री, जिनके शरीर में माताजी आती हैं, क्या वह औरत कभी अपने पति या बच्चों के साथ झगड़ा करती हैं? क्या घर में उनका सास, बहू या जेठानी के साथ झगड़ा और कलह होता है? अब इतनी ऊँची गति के माताजी, जो वीतराग भगवान की शासन देवी हैं, वे ऐसे कलह करने वाले मनुष्य के शरीर में कैसे आ सकती हैं? माताजी इस प्रकार किसी के शरीर में प्रवेश करती ही नहीं और यदि आएँ तो झूमती नहीं। माताजी तो जगत् को मोक्षमार्ग में, प्रगति में कोई अंतराय आते हों तो, दूर कर देती हैं, ऐसी शक्ति रखती हैं। वे ऐसे झूमें या कुमकुम डालें ऐसा हो सकता है? इन सभी मान्यताओं के आधार पर समाज में जो कुछ भी चल रहा है, उसका विरोध करने जैसा नहीं है, लेकिन हमें उसका भय रखने जैसा भी नहीं है।
फिर इन सभी भय के कारण मनुष्य ज्योतिष, ओझा, तांत्रिक, मांत्रिक, दानें दिखाना, ज्योतिष के पास जप करवाने जैसे उपाय करते हैं। ज्योतिष शास्त्र सच्चा और सटीक है। लेकिन आजकल इस ज्योतिष विद्या का उपयोग करके लोगों ने जो व्यापार शुरू किया है, वह ठीक नहीं है। ज्योतिषियों की गणना के अनुसार, रामचंद्रजी का सुबह राजतिलक होना था। सभी तैयारियाँ हो चुकी थीं। लेकिन रानी कैकेयी के कहने से, राज सिंघासन के बदले भगवान राम को चौदह वर्षों का वनवास मिल गया। ज्योतिष और मुहूर्त दोनों गलत साबित हुए। यदि सतयुग में भगवान राम के साथ ऐसा हो सकता है, तो अभी तो कलियुग है। थोड़ा विचार करें, कि क्या कोई ज्योतिष कभी यह कहता है कि "आपके ग्रह में कोई खराबी नहीं है, घर जाकर मज़े करो!" नहीं, क्योंकि अब ज्योतिष विद्या के नाम पर जप-तप, विधियाँ करवाने और अंगूठियाँ बनाने का व्यापार शुरू हो गया है। अब कोई दूसरा व्यक्ति लाखों बार जाप करे और उसका फल हमें मिले, ऐसा कैसे हो सकता है? वास्तव में तो हमारी मान्यता ही हमें फल देती है।
वास्तव में, मनुष्य को जो दुःख आता है, वो उसे सहन नहीं होता, इसलिए आश्वासन पाने के लिए इन सभी साधनों को ढूंढता है। कहते हैं न, "लालची को धोखेबाज मिल ही जाते हैं।" इसलिए, ऐसे सहारे लेने के बजाय, जो कर्म भोगने के लिए आए हैं, उनमें हिम्मत रखें। जिस भगवान में श्रद्धा हो, उनसे प्रार्थना करें और शक्ति माँगें कि “मुझे, मेरे इन कर्मों से छूटने की शक्ति दीजिए।“ मन की शांति के लिए मंदिर जाएँ, धार्मिक शास्त्र पढ़ें। कुछ नहीं तो संत पुरुष या ज्ञानी पुरुष के पास जाकर समाधान पाएँ, तो शांति मिलेगी। क्योंकि, कोई ग्रह या अपशकुन हमें बाधक नहीं। हमारी अंधश्रद्धा ही हमें बाधक है। हमारे कर्मों को कोई बदल नहीं सकता।
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