
रहस्य ज्ञान का जगत् को पता ही नहीं है। जिससे भटकते रहना पड़े उस अज्ञान-ज्ञान का सभी को पता है। जेब कट जाए, उसमें भूल किसकी? इसकी जेब नहीं कटी और तेरी ही क्यों कटी? तुम दोनों में से अभी भुगत कौन रहा है? ‘भुगते उसकी भूल!’
परम पूज्य दादा भगवानइस जगत् के न्यायाधीश तो जगह-जगह बैठे होते हैं। लेकिन कर्म के न्यायाधीश तो एक ही हैं। ‘भुगते उसकी भूल’! यही एक ऐसा न्याय है, जिससे पूरा जगत् चल रहा है और भ्रांति के न्याय से पूरा ही संसार खड़ा है!
परम पूज्य दादा भगवानयदि जगत् भगवान ने बनाया है तो फिर भगवान को किसने बनाया? और फिर उसे किसने बनाया?...
परम पूज्य दादा भगवानजगत क्रोधी के बजाय क्रोध नहीं करनेवाले से ज़्यादा घबराता है! क्यों? कुदरत का नियम ऐसा है कि क्रोध बंद होने पर प्रताप उत्पन्न होता है! वर्ना क्रोध नहीं करनेवाले का रक्षण करनेवाला ही नहीं मिलता न! अज्ञानता में क्रोध रक्षण करता है!
परम पूज्य दादा भगवानजगत् का माना हुआ आत्मा, वह ‘मशीनरी’ आत्मा है, और फिर वह चंचल है। मूल आत्मा तो अचल है। यदि इतना समझ लिया होता तब भी मोक्ष हो जाता!
परम पूज्य दादा भगवानजगत् क्या कहता है? आत्मा की इच्छा से यह सब उत्पन्न हो गया है। यदि आत्मा इच्छार्थक होता तो उसकी इच्छा कभी भी अस्त नहीं होती।
परम पूज्य दादा भगवानयह पूरा जगत् विज्ञान ही है और भगवान उसमें विचरते रहते हैं। जैसे कोई वैज्ञानिक हो रहे प्रयोग को देखता रहता है, वैसा ही भगवान का है।
परम पूज्य दादा भगवानजिस तरह यह ‘बैटरी’ पावर से चलती है उसी तरह यह जगत् ‘पावर’ से चल रहा है। अगर वह पावर खत्म हो जाएगा तो बंद हो जाएगा लेकिन (पावर) खत्म होने से पहले नया ‘पावर’ भर जाता है। ‘चार्ज’ होता है और ‘डिस्चार्ज’ होता है!
परम पूज्य दादा भगवानइस जगत् को सत्य मानना और उसी में रमणता करना, वह अशुद्ध चित्त है, और इस जगत् का जो ज्ञान व दर्शन है, उसे यथार्थ नहीं मानना और यथार्थ वस्तु में रमणता रखना, वह शुद्ध चित्त है। शुद्ध चित्त ही शुद्धात्मा है।
परम पूज्य दादा भगवानजगत् अवलंबन के बगैर जी ही नहीं सकता। कुछ न कुछ अवलंबन चाहिए। मन को खुराक चाहिए। जो अवलंबन रहित हो गया वह मुक्त हो गया।
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