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जीवन का लक्ष्य क्या है ?

प्रश्नकर्ता : मनुष्य का ध्येय क्या होना चाहिए ?

दादाश्री : मोक्ष में जाने का ही! यही ध्येय होना चाहिए। आपको भी मोक्ष में ही जाना है न ? कहाँ तक भटकना ? अनंत जन्मों से भटक भटक... भटकने में कुछ बाकी ही नहीं छोड़ा है न! तिर्यंच (जानवर) गति में, मनुष्यगति में, देवगति में, सभी जगह भटकता ही रहा है। किस लिए भटकना हुआ ? क्योंकि 'मैं कौन हूँ' यही नहीं जाना। खुद का स्वरूप ही नहीं पहचाना। खुद का स्वरूप पहचानना चाहिए। 'खुद कौन है' इसकी पहचान नहीं करनी चाहिए? इतना घूमें फिर भी नहीं जाना आपने॒? केवल पैसे कमाने के पीछे पड़े हैं? मोक्ष के लिए भी थोड़ा-बहुत करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए ?

प्रश्नकर्ता : करना चाहिए।

दादाश्री : अर्थात स्वतंत्र होने की ज़रूरत है न ? ऐसे परवश कब तक रहना ? 

प्रश्नकर्ता : स्वतंत्र होने की ज़रूरत नहीं है मगर स्वतंत्र होने की समझ की ज़रूरत है, ऐसी मेरी मान्यता है।

दादाश्री : हाँ, उसी समझ की ही ज़रूरत है। उस समझ को हम जान लें तो बहुत हो गया, भले ही स्वतंत्र नहीं हो पायें। स्वतंत्र हो पायें कि नहीं हो पायें वह उसके बाद की बात है, लेकिन उस समझ की जरूरत तो है न ? पहले समझ प्राप्त हो गई, तो बहुत हो गया।

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