अहिंसा और आध्यात्मिक जागृति

अहिंसा अर्थात् ऐसी जागृति रखना कि अपने मन-वचन-काया से किसी भी जीव को किंचित् मात्र भी दुःख न हो। जब यह सिद्धांत आपके निश्चय और जागृति में दृढ हो जाएगा, तभी आप अध्यात्म में प्रगति कर सकेंगे।

अगर हम यह पूर्ण रूप से नहीं समझ पाएँगे कि स्थूल से लेकर सूक्ष्मतम तक के जीवों के प्रति अहिंसा का अर्थ क्या है, भावहिंसा और भावमरण क्या है, तो हमारे द्वारा की गई सारी अहिंसा बेकार जाएगी। वह सिर्फ शब्दों और स्थूल क्रियाओं तक ही सीमित रहेगी।

ज्ञानीपुरुष की वाणी में स्थूल से सूक्ष्मतम तक की अहिंसा के बारे में और अधिक जानिए।

जो अहिंसा को जीवन में उतरना चाहते हैं, उनके लिए यह एक गाईड का काम करेगी।

Non-Violence

The simplest way of achieving peace and happiness in life is to heartily pray god every day, 'I don't want to hurt anybody in this world, by my mind, speech or action.'

Spiritual Quotes

  1. अहिंसा मतलब 'मन-वचन-काया से किसी भी जीव को  किंचितमात्र दुःख न हो' उस जानपने में रहना चाहिए, श्रद्धा में रहना चाहिए, तब वह हो सकता है।
  2. भगवान महावीर क्या कहते हैं कि हिंसा के सामने अहिंसा रखो। सामनेवाला मनुष्य हिंसा का हथियार काम में ले तो हम अहिंसा का हथियार काम में लें, तो सुख आएगा। नहीं तो हिंसा से हिंसा कभी भी बंद होनेवाली नहीं है। अहिंसा से हिंसा बंद होगी।
  3. ऐसे तो  लोग भगवान का नाम लेते हैं और जिनमें भगवान रहते हैं, उन्हें मारते रहते हैं।
  4. किसी को मानसिक दुःख देना, किसी को धोखा देना, विश्वासघात करना, चोरी करनी वह सब रौद्रध्यान में जाता है। और रौद्रध्यान का फल नर्कगति है।
  5. दूसरी झूठी अहिंसा मानें, उसका अर्थ क्या है फिर? अहिंसा मतलब किसी के लिए खराब विचार भी न आए। वह अहिंसा कहलाता है। दुश्मन के लिए भी खराब विचार न आए। दुश्मन के लिए भी कैसे उसका कल्याण हो, ऐसा विचार आए।
  6. भगवान ने तो क्या कहा था कि पहले, खुद को कषाय नहीं हो ऐसा करना। क्योंकि ये कषाय, वे सबसे बड़ी हिंसा हैं। वह आत्महिंसा कहलाती है, भावहिंसा कहलाती है।
  7. मनुष्य के साथ कषाय करना, उसके जैसी बड़े से बड़ी हिंसा इस जगत् में कोई नहीं है। ऐसा एक ढूँढकर लाओ कि जो नहीं करता हो। घर में कषाय न करे, हिंसा न करे ऐसा
  8. निश्चित किया हो कि 'मुझे नहीं ही मारने', तो उसके भाग्य में कोई मरने नहीं आता।
  9. अभयदान तो सबसे बड़ा दान है।
  10. हिंसा के यथार्थ स्वरूप का दर्शन तो जो हिंसा को संपूर्ण पार करके संपूर्ण अहिंसक पद में बैठे है, वे ही कर और करवा सकते है। 'खुद' 'आत्मस्वरुप' में स्थित हों. तब वह एक ही एसा स्थान है जहा संपूर्ण अहिंसा बरतती है ! और वहाँ तो तीर्थंकरों और ज्ञानियों की ही वर्तना !!! 

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