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देवी सरस्वती क्या दर्शाती हैं?

सरस्वती

प्रश्नकर्ता: सरस्वती देवी के नियम क्या हैं?

दादाश्री: सरस्वती अर्थात् वाणी से संबंधित जो-जो नियम लागू होते हैं, उनका पालन करें तो सरस्वती देवी खुश रहती है। वाणी का दुरुपयोग करें, झूठ बोलें, प्रपंच करें तो फिर सरस्वती देवी कैसे राज़ी होंगी? जो भीतर है वह नहीं बोलो, तो तुझ पर सरस्वती देवी किस तरह राज़ी होंगी? आज किसी का भी वचनबल किसलिए नहीं रहा? क्योंकि वाणी के नियमों का पालन नहीं किया है। मनुष्य में आने के बाद दो प्रकार के बलों की ज़रूरत है - वचनबल और मनोबल। देहबल, वह पाशवता में जाता है। वचनबल और मनोबल की शक्ति रिलेटिव आत्मा को बलवान करती है। अभी वचनबल तो लुप्त हो गया है और मन तो फ्रेक्चर हो गया है। आजकल वचनबल कैसे होते हैं? बाप बेटे से कहे कि, ‘भाई, ज़रा खड़ा हो तो।’ तब बेटा आड़ा होकर सो जाता है! खुद का बेटा ही नहीं मानता! यह वचनबल किस तरह चला गया? वाणी का गलत, उल्टा उपयोग किया, उससे। वाणी का किसी भी प्रकार का अपव्यय नहीं हो, वाणी को किसी भी विभाविक स्वरूप में नहीं ले जाए तो वचनबल उत्पन्न होगा।

झूठ बोले, प्रपंच करे, वह सब वाणी का अपव्यय कहलाता है। वाणी के दुर्व्यय और अपव्यय में बहुत फर्क है। अपव्यय मतलब सभी प्रकार से नालायक, सभी प्रकार से दुरुपयोग करते हैं। वकील दो रुपये के लिए झूठ बोलते हैं कि, ‘हाँ, मैं इन्हें पहचानता हूँ,’ वह अपव्यय कहलाता है।

वाणी से कितनों को डराया, कुत्तों को डराया, झूठ बोले, प्रपंच किए, वह वाणी का दुरुपयोग किया कहलाता है। उससे वचनबल टूट जाता है। सिर्फ सत्य ही बोलो और फिर सत्य का आग्रह पकड़कर नहीं रखो तो वचनबल फिर से उत्पन्न हो जाता है। यदि चीज़ का दुरुपयोग होता है तो उसका वचनबल उतर जाता है। झूठ बोलकर, खुद का स्व-बचाव करे, उससे तो मन, वाणी सबकुछ फ्रेक्चर हो जाता है। सत्य बोले लेकिन उसके पीछे भावना कैसी ज़बरदस्त होनी चाहिए? इन ‘दादा’ जैसा वचनबल होना चाहिए। ‘उठो’ कहे तो उठ जाए। हमारा वचनबल तो गज़ब का है! हमारे शब्द कैसे होते हैं? ये शास्त्रों के शब्द नहीं हैं। शास्त्रों के शब्द तो जड़ और चोट लगे वैसे होते हैं और हमारे प्रत्यक्ष चेतन शब्द से तो भीतर ‘ज्ञान’ हाज़िर हो ही जाता है! आत्मा ही प्रकट हो जाता है! और फिर ज़रा सी भी चोट नहीं लगती। ‘हमारी’ वाणी से बिल्कुल भी अजीर्ण नहीं होता है। ‘यह’ तो पूरा ‘ज्ञानार्क’ है! यह पच जाता है और अजीर्ण नहीं होता! ‘ज्ञानीपुरुष’ का एक भी वचन वृथा नहीं जाता! गज़ब का, ज़बरदस्त वचनबल होता है! उनके एक-एक वचन पर जगत् आफरीन होगा! उनका एक ही वचन ठेठ मोक्ष तक ले जाएगा। हमारे एक-एक शब्द में चेतन है। वाणी रिकॉर्ड स्वरूप है, जड़ है। लेकिन हमारी वाणी भीतर गज़ब के प्रकट हो चुके परमात्मा को स्पर्श करके निकलती है, इसलिए निश्चेतन को चेतन बना दे, ऐसी चेतनवाणी है! सामनेवाले की भावना होनी चाहिए। हम बोलें कि, ‘एय, कूद,’ तो सामनेवाला दस फुट का गड्ढा भी कूद जाए! तब कुछ कहते हैं कि, ‘आप शक्तिपात करते हैं।’ ना, हमारे वचन में ही ऐसा बल है! कोई बहुत डिप्रेस हो चुका हो तो हम उसे आँखों से प्रेम का पान करवाते हैं। ‘ज्ञानीपुरुष’ तो किसी भी तरह से शक्ति प्रकट करवा दें। गज़ब का वचनबल होता है।

कवि क्या गाते हैं:

‘जगत् उदय अवतार,देशना ते श्रुतज्ञान,

स्यादवाद ज्ञान-दान,सर्वमान्य परमाण।’

जगत् का उदय अच्छा हो, तो ‘ज्ञानीपुरुष’ प्रकट हो जाते हैं और उनकी ‘देशना’ ही ‘श्रुतज्ञान’ है। उनके एक ही वाक्य में सभी शास्त्र पूर्णरूप से आ जाते हैं!

शास्त्रों में लिखा है कि ‘सत्य बोलो।’ तब लोग कहते हैं कि, ‘हमसे सत्य नहीं बोला जाता। इसलिए अब कोई कलियुगी शास्त्र दो तब काम होगा।’ कलियुग का असर नहीं हो पाए और मोक्ष में ले जाए ऐसे शास्त्र अब लिखे जाएँगे। यह सत्य बोलो, दया रखो, शांति रखो, उन शास्त्रों की बातें तो पुरानी दवाई हो चुकी है! अब तो नयी दवाई की आवश्यकता पड़ेगी। हमारा निश्चय तो सच बोलने का होना चाहिए। फिर भूल हो जाए तो हमें चंदूलाल से प्रतिक्रमण करवाना पड़ेगा। ‘हमारे’ शब्द आवरण तोड़नेवाले हैं। आपको अंदर पूरा स्पष्टीकरण दे दें, ऐसा ज्ञानी का वचनबल है। हमारे पास यहाँ आप बैठते हो, तब जगत् विस्मृत रहता है और उसी को मोक्ष कहा है!

हमारी वाणी तो प्रत्यक्ष सरस्वती कहलाती है। फोटो की सरस्वती, शास्त्रों की या पुस्तकों की सरस्वती, वह परोक्ष सरस्वती है। प्रत्यक्ष सरस्वती के दर्शन करने हों तो वह यहाँ हमारी वाणी सुने, तब हो जाते हैं!

यह सब बोला जा रहा है, लेकिन उसमें एक अक्षर भी ‘मैं’ नहीं बोलता हूँ, आपका पुण्य इन शब्दों को बुलवाता है। ‘यह’ जो वाणी निकलती है, उसके द्वारा ‘हम’ जान जाते हैं कि सामनेवाले का कैसा पुण्य है। ‘हमारी’ वाणी भी रिकॉर्ड है। इससे हमें क्या लेना-देना? फिर भी ‘हमारी’ रिकॉर्ड कैसी होती है? संपूर्ण स्यादवाद! किसी जीव को किंचित् मात्र भी दुःख नहीं हो, हर एक का प्रमाण (मान्यता, श्रद्धा) जिसे स्वीकार करे, ऐसी है ‘यह’ स्यादवाद वाणी।

सरस्वती की आराधना यानी क्या? वाणी का किसी भी तरह से अपव्यय नहीं हो और वाणी को उसके विभाविक स्वरूप में नहीं ले जाएँ, वह। यदि झूठ बोला तो वह कितना बड़ा विभाव है!

क्षत्रियों का वचन यानी वचन ही, वे अपना वचन नहीं बदलते। अभी मुंबई शहर में है ही नहीं न कोई! अरे! वचन का तो कहाँ गया, लेकिन यह दस्तावेज लिखा हुआ, हस्ताक्षर किया हुआ हो तब भी कहता है कि, ‘हस्ताक्षर मेरे नहीं हैं’ और सच्चा क्षत्रिय तो वचन बोला यानी कि बोला।

ये चारण लोग फोटोवाली सरस्वती की भजना करते हैं, फिर भी उनकी वाणी कितनी ज़्यादा मीठी होती है!

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