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लक्ष्मीजी कहाँ रहती हैं? उनके क्या कायदे हैं?

लक्ष्मीजी कहाँ बसती हैं?

लक्ष्मीजी क्या कहती हैं? जो एक सौ लोगों को सिन्सियर रहता है, वहाँ मेरा वास है। वास यानी जिस प्रकार समुद्र में उफान आता है उसी प्रकार से लक्ष्मी आने लगती है। जबकि और सब जगह, मेहनत के अनुसार ही फल मिलता रहता है। सिन्सियर कैसे कहलाएगा? सिन्सियर किसे कहते हैं? तब कहे, मन को पहचान लो। उसकी सिन्सियरिटी कैसी है, उसका विस्तार कैसा है वह पहचान लो।

मेहनत से नहीं कमाते हो। ये तो बड़े मनवाले कमाते हैं। ये जो सेठ लोग होते हैं, वे क्या मेहनत करते हैं? नहीं, वे तो राजर्षि मनवाले होते हैं। मेहनत तो उनका मुनीम ही करता रहता है और सेठ लोग तो मज़े उड़ाते रहते हैं।

मन तो दैवीय होना चाहिए। दैवीय मन यानी अपकार पर उपकार करे वह। सामनेवाला हमारा हजम कर गया हो और ऊपर से हमें मूर्ख कहता हो, लेकिन जब वह संयोगों का शिकार हो जाए तब दैवी मनवाला ही उसकी मदद करता है। दैवी मनवाला देवगति बाँधता है।

Reference: Book Excerpt: आप्तवाणी १ (Page #81, Paragraph #5 & #6, Page #82, Paragraph #1 to #5)

लक्ष्मी जी

प्रश्नकर्ता: लक्ष्मी जी के नियम क्या हैं?

दादाश्री: लक्ष्मी जी गलत तरह से नहीं लेनी चाहिए, यह नियम है। इस नियम को यदि तोड़ें, तब फिर लक्ष्मी जी कहाँ से राज़ी रहेंगी? फिर तू लाख लक्ष्मी जी को धो न! सभी धोते हैं। वहाँ विलायत में क्या लोग लक्ष्मी जी को धोते हैं?

प्रश्नकर्ता: ना दादा, वहाँ तो कोई लक्ष्मी जी को नहीं धोता।

दादाश्री: फिर भी उन फॉरेनर्स के पास लक्ष्मी जी आती हैं या नहीं! ऐसे क्या लक्ष्मी जी धोने से आती होंगी? दही में भी धोते हैं यहाँ हिन्दुस्तान में। लक्ष्मी जी को सभी धोते रहते हैं, और कोई भी कच्चा नहीं है। मुझे भी लोग कहने आते हैं कि, ‘आपने लक्ष्मी जी को धोया या नहीं?’ मैंने कहा, ‘किसलिए? ये लक्ष्मी जी जब मिलती हैं, तब हम कह देते हैं कि, बड़ौदा में, मामा की पोल में, और छठा घर, जब अनुकूल आए तब पधारिएगा और जब जाना हो तब जाइएगा। आपका ही घर है। पधारिएगा,’ इतना हम कहते हैं। हम विनय नहीं चूकते। हम वहाँ पर ऐसा नहीं कहते कि, ‘हमें इसकी ज़रूरत नहीं है।’

लक्ष्मी जी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। कुछ साधु-महाराज वगैरह लक्ष्मी जी को देखकर ‘नहीं-नहीं,’ करते हैं। उससे उनके कितने ही जन्म लक्ष्मी के बिना भटक मरेंगे। तो मुए, लक्ष्मी जी का ऐसे तिरस्कार मत करना, नहीं तो छूने को भी नहीं मिलेंगी। तिरस्कार नहीं करते। किसी भी चीज़ का तिरस्कार किया जाए, ऐसा नहीं है। नहीं तो अगले जन्म में लक्ष्मी जी के दर्शन भी करने को नहीं मिलेंगे। यह जो लक्ष्मी जी का तिरस्कार करते हैं, वह तो व्यवहार को धक्का मारने जैसा है। यह तो व्यवहार है। इसलिए हम तो लक्ष्मी जी को आते हुए भी ‘जय सच्चिदानंद’ और जाते हुए भी ‘जय सच्चिदानंद’ करते हैं। ‘यह घर आपका है, जब अनुकूल आए तब पधारिएगा,’ ऐसी विनती करनी चाहिए। लक्ष्मी जी कहती हैं, ‘ये सेठ लोग हमारे पीछे पड़े हैं, उससे उनके पैर छिल गए हैं। वे पीछे पड़ते हैं, तब दो-चार बार गिर जाते हैं, तब वापस मन में ऐसा भाव करते हैं कि अरे इसमें तो घुटने छिल जाते हैं, और इतने में तो हम फिर से इशारा करते हैं और फिर वह सेठ खड़ा होकर दौड़ने लगता है। यानी हमें उन्हें मारते रहना है। उन्हें सब तरफ से छीलकर लहू-लुहान कर देना है। उन्हें सूजन चढ़ी है, फिर भी समझ नहीं खुलती!’ बहुत पक्की हैं लक्ष्मी जी तो!

Reference: Book Name: आप्तवाणी २ (Page #88 - Paragraph #6 to #8, Page #89 - Paragraph #1 to #2)

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