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क्या ब्रह्मा विष्णु महेश ने मिलकर ये दुनिया बनाई हैं?

बह्मा, विष्णु और महेश

दादाश्री: यह जगत् किसने बनाया होगा?

प्रश्नकर्ता: ब्रह्मा, विष्णु और महेश - इन तीनों ने मिलकर। क्रियेटर ब्रह्मा हैं, एडमिनिस्ट्रेटर विष्णु हैं और डेस्ट्रोयर महेश हैं।

दादाश्री: तो उन ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माँ-बाप कौन हैं?

प्रश्नकर्ता: शंकर खुद ही फादर हैं।

दादाश्री: तो फिर मदर कौन है?

प्रश्नकर्ता: ही हिमसेल्फ इज़ द मदर।

दादाश्री: तो फिर तीन ही क्यों आए? पाँच क्यों नहीं आए?

प्रश्नकर्ता: तीन गुण हैं, इसलिए तीन हैं।

दादाश्री: ये बह्मा, विष्णु और महेश नाम का कोई है ही नहीं। ये तो तीन गुणों को नाम दिए हैं। उन तीन गुणों की बात अच्छी तरह समझाने गए लेकिन उसका दुरुपयोग हुआ और मूर्तियाँ बनाईं! वे क्या कहना चाहते थे कि प्रकृति के इन तीन गुणों को निकालकर निर्मल हो जाएगा, तब तू परमात्मा बन जाएगा!

प्रश्नकर्ता: इन तीन गुणों को निकालकर?

दादाश्री: हाँ, इन बह्मा, विष्णु और महेश के रूपक-गुणों को निकालकर। सुख तो आपके पास ही है, लेकिन क्यों नहीं मिल पाता? तो इसलिए कि, ‘अंतराय हैं’। तो वे किसने खड़े किए? भगवान ने खड़े किए? नहीं, तेरे ही खुद के डाले हुए हैं। अंतराय ऐसी चीज़ है कि प्राप्त हो जाए, फिर भी फेंक देता है। नहीं तो आप खुद ही परमात्मा हो। लेकिन आपके खुद के ही अंतराय हैं, उसमें किसी का द़खल नहीं है। यह तो अपना ही खड़ा किया हुआ तू़फान है। यदि कोई यह सब खड़ा करनेवाला होता तब तो ये लोग कम नहीं हैं, उसे पकड़कर उसका कब का ही साग बना डाला होता!

Reference: Book Name: आप्तवाणी २ (Page #4 – Paragraph #4 to #10, Page #5 – Paragraph #1 to #4) 

वे हैं रूपक

प्रश्नकर्ता: ये जो गोड को G-O-D जनरेटर, ओपरेटर और डिस्ट्रोयर इस तरह कहते हैं वह और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश, उनमें से एक को पालक कहते हैं, एक को सर्जक कहते हैं और एक को संहारक कहते हैं, तो इन दोनों में कोई समानता है क्या? इन बातों में?

दादाश्री: मूल वस्तु आत्मा है। अब, उसके अपने जो मूल गुण हैं, उनके अलावा जो पर्याय हैं उनका उत्पन्न होना, विनाश होना और आत्मा खुद स्वभाव से ध्रुव है, अतः इन तीन चीज़ों को इस तरह रखा गया है। यह जोपुद्गल(जो पूरण और गलन होता है) है, वहपुद्गलउत्पन्न हुआ, विनाश हुआ। जड़ वस्तु भी स्वभाव से ध्रुव है। अतः इस आधार पर सब सेटिंग की गई है।

ये ब्रह्मा-विष्णु-महेश क्या हैं? उत्पन्न होनेवाली जो स्थिति है वहाँ लोगो ने ब्रह्मा को रखा, जहाँ सर्जन होता है वहाँ। फिर विसर्जन होना, विनाश होना, वहाँ लोगों ने महेश को रखा। और ध्रुवता रहे वहाँ लोगों ने विष्णु को रखा। ब्रह्मा, विष्णु और महेश। तब उनकी मूर्तियाँ स्थापित कीं और फिर लोग यहाँ तक ले आए कि इन मूर्तियों की पूजा करना की हमारे अंदर जो तीन गुण कहे हैं, पित्त, वायु और कफ (अनुक्रम से यही सत्व, रज और तमो गुण हैं)। बहुत साइन्टिफिकली रखे गए हैं। ये यों ही नहीं है, यह बहुत गहरी सेटिंग की गई है। 

बाद में सब उलझा दिया! ब्रह्मा को ढूँढने जाएँ तो वे कहीं मिलेंगे? दुनिया में किसी भी जगह पर मिलेंगे ब्रह्मा? विष्णु को ढूँढ लाओ; तो विष्णु मिलेंगे? और महेश्वर! आप पूछो उनका धंधा क्या है? व्यापार क्या है? तब कहते हैं, ‘ब्रह्मा सर्जन करते हैं, विष्णु ये सब चलाते हैं, पोषण करते हैं और वे हैं मारनेवाले, महेश संहार करते हैं। अरे भाई, संहार करनेवाले के क्या कहीं पैर छूए जाते होंगे?’

प्रश्नकर्ता: लेकिन दादाजी, ऐसी कैसी कल्पना करके रख दी कि कई वर्षों से यह कल्पना चली आ रही है?

दादाश्री: मूल वस्तु मिलती नहीं थी। इसिलए फिर मैंने खोज निकाला फिर अब लोगों के सामने उसे रखना शुरू किया। 

ऐसा है, इस दुनिया के जो छः तत्व हैं न, उनमें जो उत्पन्न और विनाश है, वह अवस्था से है और ध्रुवता स्वभाव से है। यह स्वभाव ही है, उसी का तो लोगों ने एक रूपक स्थापित किया जो कि अच्छी खोज-बीन थी। वैसे अच्छा करने गए लेकिन बहुत दिनों के बाद तो फिर उल्टा (गलत) ही हो जाएगा न, नहीं हो जाएगा? तो सही बात कौन बताएगा?

दो तत्वों के नज़दीक आने से विशेष भाव हुआ, और यह जगत् खड़ा हो गया। ब्रह्मा हैं ही नहीं, किसी ने बनाया भी नहीं है और किसी को बनाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी! कितना सब उल्टा चला है? लेकिन लोग मूल बात से काफी दूर निकल आए हैं। इसलिए (अध्यात्म के) कॉलेज में आते ही तत्वदर्शन की शुरूआत होती है कि हकीकत क्या है, वास्तविक्ता क्या है इस जगत् की? पहले की किताबों को छोड़ना पड़ेगा, तब फिर राह पर आ जाएगा।

ज़रूरत है, लोग ऐसा माँग रहे हैं। कुछ नवीतना माँग रहे हैं। पुस्तकें गलत नहीं हैं। पुस्तकों को समझने में लोगों को कठिनाई आ गई और चली नहीं। लेकिन इतना अच्छा हुआ कि यह पीढ़ी नई तरह की (आई) है, इसलिए पूरा बीज, पूरी श्रद्धा ही हटा दी कि यह सब अंधश्रद्धा ही है, ऐसा गलत है। इसमें तो पूरा काट डालना ही अच्छा है,  यहाँ से सड़ने लगे तो यहाँ से काट दें न तो आगे बढ़ने से रूक जाएगा। 

मोक्ष में जाना हो तो तत्व और गुणों को जानना और समझना पड़ेगा। वर्ना अगर इस संसार में रहना हो तो तत्वों के धर्म, पर्याय और अवस्थाओं को जानना और समझना पड़ेगा।

Reference: Book Name: आप्तवाणी १४ - भाग १ (Page #246 - Paragraph #4 to #7, Entire Page #247, Page #248 - Paragraph #1)

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