त्रिमंत्र : सभी संसारिक विघ्नों को दूर करनेवाला शुभ मंत्र

परम पूज्य दादाश्री ने त्रिमंत्र का मूल अर्थ समझाया है। त्रिमंत्र एक ऐसा मंत्र या प्रार्थना है जिसमें सभी परेशानियों और जीवन के विघ्नों को कम करने की शक्ति है और जिससे शांति का अनुभव होता है।

यह मंत्र उच्चतम आध्यात्मिक जागृति में रहनेवाले सभी भगवंतों को नमस्कार है, यानी भगवान महावीर, भगवान कृष्ण, भगवान राम, भगवान शिव, सीमंधर स्वामी वगैरह। यह मंत्र किसी एक धर्म या संप्रदाय का नहीं है।

सभी सांसारिक परेशानियाँ और मुश्किलें इस शक्तिशाली मंत्र के उच्चारण से दूर हो जाती हैं। वास्तव में यह बहुत फलदाई मंत्र है!

परम पूज्य दादाश्री बताते हैं कि जो लोग इस मंत्र का उच्चारण करते हैं, यह मंत्र उनकी किस प्रकार से मदद करता है। संपूर्ण जागृति में रहकर रोज़ सुबह और शाम को इस मंत्र का पाँच बार उच्चारण करने से आपको खुद अनुभव होगा कि आपकी परेशानियाँ कम होती जा रही हैं।

Auspicious Trimantra

This video features the auspicious Trimantra being sung at a satsang program in Germany.

Spiritual Quotes

  1. यह जगत शब्द से ही खड़ा हुआ है। अच्छे मनुष्य का शब्द बोलने पर आपका कल्याण हो जायेगा और बुरे मनुष्य का शब्द बोलने पर उलटा हो जायेगा। इसलिए ही यह सब समझना है।
  2. यह नवकार मंत्र किसलिए भजना? ये पंच परमेष्टि भगवंत ही मोक्ष का साधन हैं। ये पाँचों सर्वश्रेष्ठ पद हैं। यही आपका ध्येय रखना।
  3. यह त्रिमंत्र तो ऐसा है न कि नासमझ बोले तो भी फायदा होगा और समझदार बोले तो भी फायदा होगा। पर समझदार को अधिक फायदा होगा और नासमझ को मुँह से बोला उतना ही फायदा होगा। एक केवल यह टेपरेकर्ड (मशीन) बोलता है न, उसे फायदा नहीं होगा। पर जिसमें आत्मा है, वह बोलेगा तो उसे फायदा होगा ही।
  4. वर्तमान तीर्थंकर सीमंधर स्वामी को अरिहंत मानें, तभी नमस्कार मंत्र पूर्ण होगा। चौबीस तीर्थंकर तो सिद्ध हो गये, वे सभी 'नमो सिद्धाणं' में आ जाते हैं। जैसे कोई कलेक्टर हो और उनके गवर्नर होने के पश्चात् हम उन्हें कहें कि, 'अय, कलेक्टर यहाँ आइए।' तो कितना बुरा लगेगा, नहीं?
  5. प्रश्नकर्ता : श्रीकृष्ण, महावीर स्वामी वे सभी क्या हैं? 
    दादाश्री :
    वे देहधारी रूप में भगवान कहलाते हैं। वे भगवान क्यों कहलाते हैं कि भीतर संपूर्ण भगवान प्रकट हुए हैं।
  6. यह त्रिमंत्र है उसमें पहले जैनों का मंत्र है, बाद में वासुदेव का और शिव का मंत्र है। और यह सच्चिदानंद में तो हिन्दू, मुस्लिम, विदेशी सभी लोगों के मंत्र आ गये।
  7. दुनिया में जो कल्याण स्वरूप हुए हों और जो जीवित हों, जिनका अहंकार खतम हो गया हो, वे सभी शिव कहलाते हैं। शिव नाम का कोई मनुष्य नहीं है। शिव तो खुद कल्याण स्वरूप ही हैं।
  8. लोग दो हेतु से मंत्र बोलते हैं। जो भावपूजावाले हैं वे ऊपर चढ़ने के लिए बोलते हैं और दूसरे इस संसार की जो अड़चनें हैं उन्हें कम करने के लिए बोलते हैं। अर्थात् जो सांसारिक अड़चनोंवाले हैं उन सभी को देवलोगों की कृपा चाहिए।
  9. संसार के स्वाद के खातिर साधना करें वे साधु नहीं हैं। स्वाद के खातिर, मान के खातिर, कीर्ति के खातिर, वे सभी साधनाएँ अलग होती हैं और आत्मा की साधना में यह सब नहीं होता।
  10. भगवान के शास्त्र तो हैं सारे, मगर शास्त्र समझ में आने चाहिए न? अनुभवी ज्ञानीपुरुष के बिना वह समझ में आते ही नहीं और उलटे गलत मार्ग पर चले जाते हैं।

 

 

 

 

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