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आत्महत्या के परिणाम क्या हैं?

उससे पहले करना ‘मुझे’ याद

प्रश्नकर्ता: दादाजी ऐसा सुना है कि आत्महत्या के बाद इस प्रकार के सात जन्म होते हैं, यह बात सच है?

दादाश्री: जो संस्कार पड़ते हैं, वे सात-आठ जन्म के बाद जाते हैं। इसलिए ये कोई बुरे संस्कार पड़ने मत देना। बुरे संस्कारों से दूर भागना। हाँ, यहाँ चाहे जैसा दु:ख हो तो वह सहन करना, पर गोली मत मारना, आत्महत्या मत करना। इसलिए बड़ौदा शहर में आज से कुछ साल पहले सबसे कह दिया था कि आत्महत्या का विचार आए, तब मुझे याद करना और मेरे पास आ जाना। ऐसे मनुष्य हों न, जोखिमवाले मनुष्य, उन्हें कहकर रखता था। वह फिर मेरे पास आए, तब उसे समझा दूँ। दूसरे दिन आत्महत्या करना बंद हो जाए। १९५१ के बाद सबको खबर कर दी थी कि जिस किसी को आत्महत्या करनी हो तो वह मुझसे मिले, और फिर करे। कोई आए कि मुझे आत्महत्या करनी है तो उसे मैं समझाऊँ। आसपास के ‘कॉज़ेज़’ (कारण), सर्कल, आत्महत्या करने जैसी हैं या नहीं करने जैसी, सब उसे समझा दूँ और उसे वापिस मोड़ लूँ।

आत्महत्या का फल

प्रश्नकर्ता: कोई मनुष्य यदि आत्महत्या करे तो उसकी क्या गति होती है? भूत-प्रेत बनता है?

दादाश्री: आत्महत्या करने से तो प्रेत बनता है और प्रेत बनकर भटकना पड़ता है। इसलिए आत्महत्या करके उलटे उपाधियाँ मोल लेता है। एकबार आत्महत्या करे, उसके बाद कितने ही जन्मों तक उसका प्रतिघोष गूँजता रहता है! और यह जो आत्महत्या करता है, वह कोई नया नहीं कर रहा है। वह तो पिछले जन्म में आत्महत्या की थी, उसके प्रतिघोष से करता है। यह जो आत्महत्या करता है, वह तो पिछले किए हुए आत्मघात कर्म का फल आता है। इसलिए अपने आप ही आत्महत्या करता है। वे ऐसे प्रतिघोष पड़े होते हैं कि वह वैसा का वैसा ही करता आया होता है। इसलिए अपने आप आत्महत्या करता है और आत्महत्या होने के बाद फिर अवगतिवाला जीव बन जाता है। अवगति अर्थात् देह के बिना भटकता है। भूत बनना कुछ आसान नहीं है। भूत तो देवगति का अवतार है, वह आसान चीज़ नहीं है। भूत तो यहाँ पर कठोर तप किए हों, अज्ञान तप किए हों, तब भूत होता है, जब कि प्रेत अलग वस्तु हैं।

Reference: Book Name: मृत्यु (Page #21 – Paragraph #4, Page #22 - Paragraph #1 & #4, Page #23 - Paragraph #1)

… तब भी आत्महत्या नहीं ही करना चाहिए!

अभी अगर इन लोगों को व्यापर में घाटा हुआ, बच्चों के वजह से दुःख आया, ऐसा कुछ हुआ , तो आत्महत्या हि कर लेंगे! वह मुझे कहते हे, “दादाजी, जब कभी कोई मुश्केली नहीं थी, तब दुःख बच्चों के तरफ से आता था.” उनके मन में भी थोडा ऐसा था की, अभी वह बच्चा हैं, वह स्थाईक हो जाएगा, मगर उस के बाद परेशानिया शुरू हुई| इसलिए फिर दुःख में ही दुःखी हो कर, इंसान आत्महत्या कर लेता हैं|

प्रश्नकर्ता: कोई आत्महत्या करके मर जाए तो क्या होता है?

दादाश्री: भले ही आत्महत्या करके मर जाए, लेकिन वापस फिर यहीं पर कर्ज चुकाने आना पड़ेगा। इंसान है तो उसके सिर पर दुःख तो आएँगे ही, लेकिन उसके लिए कहीं आत्महत्या करते हैं? आत्महत्या के फल बहुत कड़वे हैं। भगवान ने उसके लिए मना किया है, बहुत खराब फल आते हैं। आत्महत्या करने का तो विचार भी नहीं करना चाहिए। ऐसा जो कुछ भी कज़र् हो तो वह वापस दे देने की भावना करनी चाहिए, लेकिन आत्महत्या नहीं करनी चाहिए।

दुःख तो रामचंद्र जी को था। उनके चौदह साल के वनवास के एक दिन का दुःख, वह इस चिडि़याँ(कमज़ोर इंसानों) की पूरी ज़िंदगी के दुःख के बराबर है! लेकिन अभागे ‘चें-चें’ करके सारा दिन दुःख गाते रहते हैं।

Reference: Book Name: आप्तवाणी 2 (Page #185 - Paragraph #5 & #6, Page #186 - Paragraph #1 & #2)

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